
Karṇa-kuṇḍala-kavaca-jijñāsā; Kuntibhoja’s hospitality and Pṛthā’s appointment (कर्णकुण्डलकवचजिज्ञासा)
Upa-parva: Kuntī–Sūrya–Karna Upākhyāna (Account of Kuntī’s boon and Karṇa’s birth-marks)
Janamejaya questions Vaiśaṃpāyana about the concealed matter concerning Karṇa—specifically, what his kuṇḍalas and kavaca were like and from where they originated. Vaiśaṃpāyana agrees to disclose the secret and begins by narrating an earlier court episode: a formidable, radiant brāhmaṇa ascetic arrives before King Kuntibhoja, requesting permission to reside and take alms-food in the king’s house under conditions of non-interference, freedom of movement, and respectful treatment regarding bed and seat. Kuntibhoja consents and then introduces his virtuous daughter Pṛthā (Kuntī), instructing her to serve and honor the guest without contempt and to grant whatever the ascetic asks, emphasizing the high spiritual power of brāhmaṇas and the dangers of provoking them. He further frames Pṛthā’s lineage and upbringing, urging humility and careful conduct so that pleasing the boon-giving ascetic will yield welfare for the household and avert ruin. The chapter thus sets the ritual-ethical and interpersonal preconditions for the later revelation about Karṇa’s divine paternity and birth-marks.
Chapter Arc: मार्कण्डेय युधिष्ठिर से कहते हैं—जब वानर-सेना शिविर में प्रवेश ही कर रही थी, तभी रावणानुगा राक्षसों की टुकड़ियाँ अचानक धावा बोल देती हैं, मानो अँधेरे से निकली हुई विपत्ति। → राक्षस अन्तर्धान-विद्या से अदृश्य होकर वार करते हैं; विभीषण उनकी चाल पहचानकर ‘अन्तर्धान-वध’ का उपाय करता है। उधर दोनों सेनाओं में जो-जिसे अपने योग्य प्रतिद्वन्द्वी समझता है, वही उससे भिड़ जाता है—युद्ध एक-एक युगल-द्वन्द्व में बँटकर और भी उग्र हो उठता है। → रावण स्वयं राम पर शक्ति-शूल-खड्ग की वर्षा करता है और राम भी रावण पर तीक्ष्ण आयस बाणों से प्रत्याघात करते हैं; साथ ही विभीषण और प्रहस्त के बीच पंखयुक्त बाणों की घोर वर्षा होती है। महास्त्रों का ऐसा समागम होता है कि त्रिलोकी तक कम्पित-सी प्रतीत होती है। → युद्ध का वेग देवासुर-संग्राम जैसा भयावह बनकर स्थिर हो जाता है—कोई पक्ष निर्णायक रूप से टूटता नहीं, पर दोनों ओर की शक्ति और संकल्प की पराकाष्ठा प्रकट हो जाती है। → राम-रावण का द्वन्द्व और महास्त्रों की टक्कर अगले क्षण किस ओर झुकेगी—यह अनिर्णीत रहकर कथा को आगे धकेल देती है।
Verse 1
हि आय न (0) हि २ 7 पज्चाशीर्त्याधिकद्विशततमो< ध्याय: श्रीराम और रावणकी सेनाओंका दन्डयुद्ध मार्कण्डेय उवाच ततो निविशमानांस्तान् सैनिकान् रावणानुगा: । अभिजममुर्गणानेके पिशाचक्षुद्ररक्षसाम्
মার্কণ্ডেয় বললেন— যুধিষ্ঠির! যখন সেই সৈন্যরা শিবিরে প্রবেশ করে বসতি স্থাপন করছিল, তখন রাবণের অনুগামী পিশাচ ও ক্ষুদ্র রাক্ষসদের বহু দল এসে তাদের ওপর ঝাঁপিয়ে পড়ল।
Verse 2
पर्वण: पतनो जम्भ: खर: क्रोधवशो हरि: । प्ररुजश्चारुजश्चैव प्रघसश्चैवमादय:
মার্কণ্ডেয় বললেন—হে যুধিষ্ঠির! বানরসেনা যখন শিবিরে প্রবেশ করতে উদ্যত, তখন রাবণের সেনার অন্তর্গত পর্বণ, পতন, জম্ভ, খর, ক্রোধবশ, হরি, প্ররুজ, অরুজ, প্রঘস প্রভৃতি পিশাচ ও অধম রাক্ষসদের বহু দল ছুটে এসে তাদের উপর আকস্মিক আক্রমণ চালাল।
Verse 3
ततो$भिपततां तेषामदृश्यानां दुरात्मनाम् । अन्तर्धानवधं तज्ज्ञक्षकार स विभीषण:
তারপর সেই দুরাত্মা নিশাচররা অন্তর্ধান-বিদ্যায় অদৃশ্য হয়ে আক্রমণ করতে লাগল। রাজন! বিভীষণ সেই বিদ্যার পারদর্শী ছিলেন; তাই তিনি তাদের অন্তর্ধান-শক্তি বিনষ্ট করে দিলেন।
Verse 4
ते दृश्यमाना हरिभिव॑लिभिर्दूरपातिभि: । निहता: सर्वशो राजन् महीं जग्मुर्गतासव:
তখন সেই রাক্ষসরা বানরদের দৃষ্টিগোচর হল। রাজন! দূরলম্ফে সক্ষম বলবান বানরযোদ্ধারা চারদিক থেকে লাফিয়ে লাফিয়ে আঘাত করে তাদের নিধন করল; আর সেই রাক্ষসরা প্রাণহীন হয়ে ভূমিতে লুটিয়ে পড়ল।
Verse 5
अमृष्यमाण: सबलो रावणो निर्ययावथ । राक्षसानां बलैघोंरै: पिशाचानां च संवृतः,रावणके लिये यह बात असह्ाय हो उठी। वह पिशाचों तथा राक्षसोंकी भयंकर सेनासे घिरा हुआ दल-बलके साथ लंकासे बाहर निकला
এ কথা রাবণের অসহ্য হল। সে সৈন্যবলসহ লঙ্কা থেকে বেরিয়ে এল, ভয়ংকর রাক্ষস-সেনা ও পিশাচদের দল দ্বারা পরিবেষ্টিত হয়ে।
Verse 6
युद्धशास्त्रविधानज्ञ उशना इव चापर: । व्यूह्ू चौशनसं व्यूहं हरीनभ्यवहारयत्
সে যেন আরেক উশনা (শুক্রাচার্য)—যুদ্ধশাস্ত্রের বিধানে পারদর্শী। উশনার মতানুসারে ব্যূহ রচনা করে সে বানরদের চারদিক থেকে ঘিরে ফেলল।
Verse 7
राघवस्तु विनिर्यान्तं व्यूडानीकं दशाननम् | बा्हस्पत्यं विधिं कृत्वा प्रत्यव्यूहन्निशाचरम्
রাঘব (শ্রীরাম) যখন দেখলেন যে দশানন রাবণ নগর থেকে বেরিয়ে যুদ্ধবিন্যাসে সৈন্য সাজিয়ে অগ্রসর হচ্ছে, তখন তিনিও বৃহস্পতির নির্দেশিত বিধি অনুসারে সেই নিশাচরের বিরুদ্ধে প্রতিব্যূহ রচনা করলেন।
Verse 8
समेत्य युयुधे तत्र ततो रामेण रावण: । युयुधे लक्ष्मणश्नापि तथैवेन्द्रजिता सह
তারপর সেখানে মুখোমুখি হয়ে রাবণ রামের সঙ্গে যুদ্ধ করতে লাগল; আর একই সময়ে লক্ষ্মণও ইন্দ্রজিতের সঙ্গে তেমনই যুদ্ধে প্রবৃত্ত হলেন।
Verse 9
विरूपाक्षेण सुग्रीवस्तारेण च निखर्वट: । तुण्डेन च नलस्तत्र पटुश: पनसेन च
সেখানে সুগ্রীব বিরূপাক্ষের সঙ্গে যুদ্ধ করলেন; নিখার্বট নামের রাক্ষস তারা নামের বানরের সঙ্গে সংঘর্ষে জড়াল; নল নিশাচর তুণ্ডের মোকাবিলা করল; আর পটুś নামের রাক্ষস পনস বানরের সঙ্গে যুদ্ধ করতে লাগল।
Verse 10
विषहां यं हि यो मेने स स तेन समेयिवान् । युयुधे युद्धवेलायां स्वबाहुबलमाश्रित:,जो जिसे अपने जोड़का समझता था, उसीके साथ उसकी भिड़न्त हुई। सबलोग युद्धके समय अपने बाहुबलका आश्रय ले शत्रुका सामना करते थे
যে যাকে নিজের সমান বীর্যবান মনে করত, সে-ই তার সঙ্গে গিয়ে মল্লযুদ্ধে জড়াত। যুদ্ধের সময় সবাই নিজের বাহুবলের উপর নির্ভর করে শত্রুর মুখোমুখি লড়াই করত।
Verse 11
स सम्प्रहारो ववृधे भीरूणां भयवर्धन: । लोमसंहर्षणो घोर: पुरा देवासुरे यथा
সেই সংঘর্ষ ক্রমে বেড়ে উঠল—ভীরুদের ভয় বাড়ায়, রোমহর্ষক ও ভয়ংকর; যেমন প্রাচীন কালে দেবতা ও অসুরদের মধ্যে ভীষণ যুদ্ধ হয়েছিল।
Verse 12
रावणो राममानर्छच्छक्तिशूलासिवृष्टिभि: । निशितैरायसैस्तीक्ष्ण रावणं चापि राघव:
মার্কণ্ডেয় বললেন—রাবণ শক্তি, শূল ও খড়্গের বর্ষণে রামকে প্রবল যন্ত্রণা দিল; কিন্তু যুদ্ধে অচঞ্চল রাঘবও তীক্ষ্ণ লৌহশরে রাবণকে তেমনি ব্যথিত করলেন।
Verse 13
तथैवेन्द्रजितं यत्तं लक्ष्मणो मर्मभेदिभि: । इन्द्रजिच्चापि सौमित्रिं बिभेद बहुभि: शरै:
মার্কণ্ডেয় বললেন—তেমনি যুদ্ধোন্মুখ ইন্দ্রজিতকে লক্ষ্মণ মর্মভেদী শরে আঘাত করলেন; আর ইন্দ্রজিতও বহু শরে সৌমিত্রি লক্ষ্মণকে বিদ্ধ করল।
Verse 14
विभीषण: प्रहस्तं च प्रहस्तश्न विभीषणम् । खगपत्रै: शरैस्तीक्ष्णैरभ्यवर्षद् गतव्यथ:
মার্কণ্ডেয় বললেন—বিভীষণ প্রহস্তের উপর, আর প্রহস্ত বিভীষণের উপর, পালকযুক্ত তীক্ষ্ণ শরের বর্ষণ করল; তবু তাদের কেউই ব্যথা বা বিচলন প্রকাশ করল না।
Verse 15
तेषां बलवतामासीन्महास्त्राणां समागम: | विव्यथु: सकला येन त्रयो लोकाश्चराचरा:
মার্কণ্ডেয় বললেন—সেই বলবান বীরদের মহাস্ত্রসমূহের এমন ভয়ংকর সংঘাত ঘটল যে তাতে তিন লোকের সমস্ত স্থাবর-জঙ্গম প্রাণীই কেঁপে উঠল ও ব্যথিত হল।
Verse 285
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि रामोपाख्यानपर्वणि रामरावणद्वन्ड्युद्धे पज्चाशीत्यधिकद्वधिशततमो< ध्याय:
এইভাবে শ্রীমহাভারতের বনপর্বের অন্তর্গত রামোপাখ্যানপর্বে রাম-রাবণ দ্বন্দ্বযুদ্ধ-বর্ণনাকারী দুই শত পঁচাশি-তম অধ্যায় সমাপ্ত হল।
The court must balance sovereign control of the household with unconditional guest-rights: granting an ascetic freedom and fulfilling requests without resentment, despite the potential risk such power introduces to domestic and political order.
Sustained humility, careful speech, and consistent service toward a boon-bearing guest are presented as practical dharma—protecting the family and enabling auspicious outcomes through disciplined hospitality.
No formal phalaśruti is stated; the chapter instead provides consequential framing—asserting that offense to a powerful brāhmaṇa can destroy a lineage, while proper honor secures welfare—thereby functioning as implicit moral commentary.
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