Mahabharata Adhyaya 22
Vana ParvaAdhyaya 2254 Versesमाया-आधारित आक्रमण का पूर्ण विनाश; कृष्ण-पक्ष की निर्णायक विजय

Adhyaya 22

Adhyāya 22: Śālva’s Weapon-Shower, Dāruka’s Wounding, and the Māyā-Report of Vasudeva’s Father

Upa-parva: Saubha-vadha Upākhyāna (Episode of the Destruction of Saubha)

Vāsudeva recounts an intense phase of engagement with Śālva, who repeatedly attacks using heavy weapons and volleys, including a mass discharge of arrows that wounds the charioteer Dāruka, the horses, and the chariot. Dāruka, overwhelmed and injured, reports difficulty maintaining control; Vāsudeva observes the extent of the wounding and steadies the situation. A man from Dvārakā then approaches as a messenger, conveying an alarming statement attributed to Āhuka: that Śālva has struck down the son of Śūra while Kṛṣṇa is engaged elsewhere, urging Kṛṣṇa to withdraw and protect Dvārakā. The report induces grief and cognitive instability in Vāsudeva, who internally assesses the improbability of such a defeat while allies like Baladeva and others live; he concludes that if the report is true, it implies catastrophic loss. Amid renewed fighting, he perceives a vision of his aged father falling from Saubha, which triggers a brief collapse and the dropping of the Śārṅga bow; the army reacts in alarm. Regaining composure, Vāsudeva recognizes the episode as māyā (deceptive illusion), reorients to the engagement, and resumes action with renewed volleys, marking the chapter’s thematic pivot from emotional shock to discriminative clarity.

Chapter Arc: सौभविमान-वध की गाथा के धुएँ और तेज के बीच कथा खुलती है—शाल्व पर छोड़े गए सर्प-सदृश विषबाण, और फिर मायावी सौभ का अचानक अदृश्य हो जाना, जिससे वीर भी क्षणभर को विस्मित रह जाए। → माया-आवरण के कारण लक्ष्य लुप्त है; रथ-घोड़े पर्वत-भार से दबे, प्राण-क्षीण और लड़खड़ाते दिखते हैं। सारथि दारुक तात्कालिक सलाह देता है, और कृष्ण क्षण-भर ठहरने का आदेश देकर दिव्य, अभेद्य प्रतिरोध के बीच निर्णायक प्रहार का अवसर साधते हैं। → सुदर्शन-चक्र की अचूक शक्ति से सौभविमान त्रिपुर के समान चूर होकर द्विधा गिरता है; उसी तेजस्वी वेग में गदा घुमाते शाल्व को भी चक्र सहसा दो भागों में कर देता है—युद्ध का मायावी शिखर एक क्षण में कट जाता है। → उपाख्यान का परिणाम स्पष्ट है—माया पर धर्म-तेज की विजय। इसके बाद दृश्य बदलता है: काम्यक वन में युधिष्ठिर के राज्य/आश्रय से जुड़े ब्राह्मण-वैश्य पाण्डवों को छोड़ने को तैयार नहीं; अंततः युधिष्ठिर उनकी अनुमति लेकर सेवकों को रथ जोतने का आदेश देते हैं। → काम्यक वन का वह ‘अद्भुत समवाय’ समाप्ति की ओर है—रथ जुड़ रहे हैं; पाण्डवों की अगली गति और वन-यात्रा का अगला मोड़ सामने खड़ा है।

Shlokas

Verse 1

इस प्रकार श्रीमह्याभारत वनपर्वके अन्तर्गत अ्जुनाभिगमनपर्वमें सौभवधोपाख्यानविषयक इक्कीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ २९ ॥। हि >> मय ० | है 7 द्ाविशोद्ध्याय: शाल्ववधोपाख्यानकी समाप्ति और युधिष्ठिरकी आज्ञा लेकर श्रीकृष्ण

বায়ু বললেন—তখন, হে ভরতশ্রেষ্ঠ! আমি আমার মনোহর ধনুক ধারণ করে শরবৃষ্টি দ্বারা সৌভ-নগরী থেকে দেবদ্বেষী দানবদের মস্তক ছেদন করে নীচে নিক্ষেপ করতে লাগলাম; দেববিরোধী আক্রমণকারীদের বিরুদ্ধে বলপ্রয়োগে দেবধর্ম রক্ষা পেল।

Verse 2

शरांश्षाशीविषाकारानूर्ध्वगांस्तिग्मतेजस: । प्रैषयं शाल्वराजाय शार्ज्रमुक्तानू सुवासस:

তারপর শার্ঙ্গ ধনুক থেকে নিক্ষিপ্ত, বিষধর সাপের ন্যায় প্রতীয়মান, সুন্দর পালকে শোভিত, তীক্ষ্ণ তেজস্বী ও ঊর্ধ্বগামী বহু শর আমি রাজা শাল্বর দিকে প্রেরণ করলাম।

Verse 3

ततो नादृश्यत तदा सौभं कुरुकुलोद्वह । अन्तहितं माययाभूत्‌ ततो5हं विस्मितो5$भवम्‌

হে কুরুকুল-উদ্বহ! তখন সৌভ-নগরী আর দেখা গেল না; মায়ার দ্বারা তা অন্তর্হিত হয়ে গেল। তাতে আমি বিস্ময়ে অভিভূত হলাম।

Verse 4

अथ दानवसडूघास्ते विकृताननमूर्धजा: । उदक्रोशन्‌ महाराज विछिते मयि भारत

হে মহারাজ, হে ভারতবংশীয়! তারপর বিকৃত মুখ ও এলোমেলো কেশধারী সেই দানবদল, যখন আমি অচঞ্চল ও নির্ভয়ে স্থির থেকে তাদের উপর অস্ত্রাঘাত করতে লাগলাম, তখন উচ্চস্বরে চিৎকার করতে শুরু করল।

Verse 5

ततोअस्त्रं शब्दसाहं वै त्वरमाणो महारणे । अयोजयं तद्गभधाय तत: शब्द उपारमत्‌,तब मैंने उनके वधके लिये उस महान्‌ संग्राममें बड़ी उतावलीके साथ शब्दवेधी बाणका संधान किया। यह देख उनका कोलाहल शान्त हो गया

তখন সেই মহাসমরে তাদের বধের জন্য আমি ত্বরিত শব্দভেদী অস্ত্র সংযোজন করলাম; তা লক্ষ্যভেদ করতেই তাদের কোলাহল থেমে গেল, নীরবতা নেমে এল।

Verse 6

हतास्ते दानवा: सर्वे यै: स शब्द उदीरित: । शरैरादित्यसंकाशैज्वलितै: शब्दसाधनै:,जिन दानवोंने पहले कोलाहल किया था, वे सब सूर्यके समान तेजस्वी शब्दवेधी बाणोंद्वारा मारे गये

যে দানবরা আগে সেই কোলাহল তুলেছিল, তারা সকলেই সূর্যসম দীপ্ত, জ্বলন্ত শব্দভেদী বাণে নিহত হল।

Verse 7

तस्मिन्नुपरते शब्दे पुनरेवान्यतो5भवत्‌ | शब्दो5परो महाराज तत्रापि प्राहरं शरै:,महाराज! वह कोलाहल शान्त होनेपर फिर दूसरी ओर उनका शब्द सुनायी दिया। तब मैंने उधर भी बाणोंका प्रहार किया

মহারাজ! সেই কোলাহল থেমে গেলে আবার অন্য দিক থেকে আরেকটি শব্দ উঠল; তা শুনে আমি সেদিকেও বাণ নিক্ষেপ করলাম।

Verse 8

एवं दश दिश: सर्वास्तिर्यगूर्ध्य च भारत । नादयामासुरसुरास्ते चापि निहता मया,भारत! इस तरह वे असुर इधर-उधर ऊपर-नीचे दसों दिशाओंमें कोलाहल करते और मेरे हाथसे मारे जाते थे

হে ভারত! এভাবে সেই অসুররা এদিক-ওদিক, উপর-নীচে—দশ দিক জুড়ে কোলাহল তুলত, আর আমার হাতেই নিহত হত।

Verse 9

ततः प्राग्ज्योतिषं गत्वा पुनरेव व्यदृश्यत । सौभं कामगमं वीर मोहयन्मम चक्षुषी,तदनन्तर इच्छानुसार चलनेवाला सौभविमान प्राग्ज्योतिषपुरके निकट जाकर मेरे नेत्रोंको भ्रममें डालता हुआ फिर दिखायी दिया

তারপর ইচ্ছামতো চলতে সক্ষম সৌভ-বিমান প্রাগ্জ্যোতিষপুরের দিকে গিয়ে আবার দেখা দিল, হে বীর; তা আমার চোখকে বিভ্রান্ত করল।

Verse 10

ततो लोकान्तकरणो दानवो दारुणाकृति: । शिलावर्षेण महता सहसा मां समावृणोत्‌,तत्पश्चात्‌ लोकान्तकारी भयंकर आकृतिवाले दानवने आकर सहसा पत्थरोंकी भारी वर्षकि द्वारा मुझे आवृत कर दिया

তারপর লোকান্তকারী, ভয়ংকর আকৃতির এক দানব এসে হঠাৎই বিশাল পাথরবৃষ্টিতে আমাকে আচ্ছন্ন করল।

Verse 11

सो<हं पर्वतवर्षेण वध्यमान: पुन: पुनः । वल्मीक इव राजेन्द्र पर्वतोपचितो5भवम्‌,राजेन्द्र! शिलाखण्डोंकी उस निरन्तर वृष्टिसे बार-बार आहत होकर मैं पर्वतोंसे आच्छादित बाँबी-सा प्रतीत होने लगा

রাজেন্দ্র! শিলাখণ্ডের সেই অবিরাম বর্ষণে বারবার আঘাতপ্রাপ্ত হয়ে আমি যেন পর্বতস্তূপে চাপা পড়া ঢিবির মতোই প্রতীয়মান হলাম।

Verse 12

ततोऊहं पर्वतचित: सहय: सहसारथि: । अप्रख्यातिमियां राजन सर्वतः पर्वतैश्चित:,राजन! मेरे चारों ओर शिलाखण्ड जमा हो गये थे। मैं घोड़ों और सारथिसहित प्रस्तरखण्डोंसे चुना-सा गया था, जिससे दिखायी नहीं देता था

রাজন! আমার চারদিকে শিলাখণ্ড জমে উঠেছিল। ঘোড়া ও সারথিসহ আমি পাথরের স্তূপে এমনভাবে ঢেকে গিয়েছিলাম যে আর চেনাই যেত না, দেখা দিতাম না।

Verse 13

ततो वृष्णिप्रवीरा ये ममासन्‌ सैनिकास्तदा । ते भयार्ता दिश: सर्वे सहसा वित्रदुद्रुवु:,यह देख वृष्णिकुलके श्रेष्ठ वीर जो मेरे सैनिक थे, भयसे आर्त हो सहसा चारों दिशाओंमें भाग चले

এ দৃশ্য দেখে, তখন আমার সৈনিকরূপে থাকা বৃষ্ণিকুলের শ্রেষ্ঠ বীরেরা ভয়ে কাতর হয়ে হঠাৎ চারদিকে ছুটে পালাল।

Verse 14

ततो हाहाकृतमभूत्‌ सर्व किल विशाम्पते । द्यौश्न भूमिश्व खं चैवादृश्यमाने तथा मयि,प्रजानाथ! मेरे अदृश्य हो जानेपर भूलोक, अन्तरिक्ष तथा स्वर्गलोक--सभी स्थानोंमें हाहाकार मच गया

হে প্রজাপতি! আমি অদৃশ্য হয়ে যেতেই ভূলোক, অন্তরীক্ষ ও স্বর্গ—সর্বত্রই হাহাকার উঠল।

Verse 15

ततो विषण्णमनसो मम राजन्‌ सुहृज्जना: । रुरुदुश्लुक्तुशुश्वेव द:खशोकसमन्विता:,राजन्‌! उस समय मेरे सभी सुहृद्‌ खिन्नचित्त हो दुःख-शोकमें डूबकर रोने-चिल्लाने लगे

রাজন! তখন আমার সকল সুহৃদ বিষণ্ণচিত্ত হয়ে দুঃখ-শোকে নিমগ্ন হয়ে কাঁদতে ও উচ্চস্বরে বিলাপ করতে লাগল।

Verse 16

द्विषतां च प्रहर्षो5 भूदार्ति श्वाद्धिषतामपि । एवं विजितवान्‌ वीर पश्चादश्रौषमच्युत

শত্রুদের মধ্যে উল্লাস জেগে উঠল, আর আমার সুহৃদদের মধ্যে বিষাদ। হে বীর, মর্যাদা থেকে অচ্যুত! এইভাবেই রাজা শাল্ব একবার আমাকে পরাভূত করেছিল—চেতনা ফিরে এলে পরে আমি সারথির মুখ থেকেই তা শুনেছিলাম।

Verse 17

ततो5हमिन्द्रदयितं सर्वपाषाण भेदनम्‌ । वज़मुद्यम्य तान्‌ सर्वान्‌ पर्वतान्‌ समशातयम्‌

তখন আমি ইন্দ্রের প্রিয় অস্ত্র—সব রকম শিলাকে বিদীর্ণ করতে সক্ষম বজ্র—উত্তোলন করে আঘাত করলাম, আর সেই সমস্ত পর্বতখণ্ডকে চূর্ণ-বিচূর্ণ করে দিলাম।

Verse 18

ततः पर्वतभारार्त्ता मन्दप्राणविचेष्टिता: । हया मम महाराज वेपमाना इवाभवन्‌,महाराज! उस समय पर्वतखण्डोंके भारसे पीड़ित हुए मेरे घोड़े कम्पित-से हो रहे थे। उनकी बलसाध्य चेष्टाएँ बहुत कम हो गयी थीं

মহারাজ! তখন পর্বতখণ্ডের ভারে পীড়িত আমার ঘোড়াগুলি যেন কাঁপছিল। তাদের চলন দুর্বল হয়ে পড়ল, আর প্রাণশক্তিও ক্ষীণ বলে মনে হল।

Verse 19

मेघजालमिवाकाशे विदार्यभ्युदितं रविम्‌ । दृष्टवा मां बान्धवा: सर्वे हर्षमाहारयन्‌ पुन:

যেমন আকাশে মেঘপুঞ্জ বিদীর্ণ করে সূর্য উদিত হয়, তেমনই শিলাখণ্ড সরে গিয়ে আমাকে প্রকাশিত দেখে আমার সকল আত্মীয়স্বজন আবার আনন্দে ভরে উঠল।

Verse 20

ततः पर्वतभारार्त्तान्‌ मन्दप्राणविचेष्टितान्‌ । हयान्‌ संदृश्य मां सूत: प्राह तात्कालिकं वच:

তখন শিলাখণ্ডের ভারে পীড়িত, ক্ষীণ শ্বাসে কষ্টসাধ্য চেষ্টায় থাকা ঘোড়াগুলিকে দেখে সারথি আমাকে সেই মুহূর্তের উপযুক্ত কথা বলল।

Verse 21

साधु सम्पश्य वार्ष्णेय शाल्वं सौभपतिं स्थितम्‌ । अलं कृष्णावमन्यैनं साधु यत्नं समाचर

হে বার্ষ্ণেয়, ভালো করে দেখো—সৌভপতি শাল্ব সেখানে দাঁড়িয়ে আছে। হে কৃষ্ণ, তাকে তুচ্ছ জ্ঞান কোরো না; অবজ্ঞায় কোনো ফল নেই। যথোচিত উপায়ে সতর্ক প্রচেষ্টা করো।

Verse 22

मार्दव॑ सखितां चैव शाल्वादद्य व्यपाहर । जहि शाल्वं महाबाहो मैनं जीवय केशव

মহাবাহু কেশব! এখন শাল্বের প্রতি কোমলতা ও মিত্রভাব ত্যাগ করো। শাল্বকে বধ করো; তাকে জীবিত রেখো না।

Verse 23

सर्वे: पराक्रमैर्वीर वध्य: शत्रुरमित्रहन्‌ | न शत्रुरवमन्तव्यो दुर्बलोडपि बलीयसा

হে বীর, শত্রুনাশক! সমস্ত পরাক্রম প্রয়োগ করে এই শত্রুকে বধ করা উচিত। কেউ যতই শক্তিমান হোক, দুর্বল বলে প্রতীয়মান শত্রুকেও তুচ্ছ করা উচিত নয়।

Verse 24

योडपि स्यात्‌ पीठग: ककश्रित्‌ कि पुनः समरे स्थित: । स त्वं पुरुषशार्दूल सर्वयत्नैरिमं प्रभो

যদি কোনো শত্রু ঘরে আসনে বসেও থাকে, তবু—যখন তার বিনাশ আবশ্যক—তাকে ছাড়া উচিত নয়; আর যে সমরে দাঁড়িয়ে আছে, তার কথা তো বলাই বাহুল্য। অতএব, হে পুরুষশার্দূল, হে প্রভু, সর্বপ্রকার প্রচেষ্টায় এই শত্রুকে বিনাশ করো।

Verse 25

जहि वृष्णिकुलश्रेष्ठ मा त्वां कालो<त्यगात्‌ पुन: । नैष मार्दवसाध्यो वै मतो नापि सखा तव

হে বৃষ্ণিকুলশ্রেষ্ঠ! তাকে বধ করো; যেন কাল আবার তোমাকে অতিক্রম না করে। সে কোমলতায় বশ হয় না, আর সে তোমার সত্য বন্ধু-ও নয়।

Verse 26

येन त्वं योधितो वीर द्वारका चावमर्दिता । एवमादि तु कौन्तेय श्रुत्वाहं सारथेवच:

বায়ু বললেন—হে বীর! এই শত্রুই তোমাকে যুদ্ধে আহ্বান করেছিল, আর এই শত্রুই দ্বারকাকে বিধ্বস্ত করেছিল। হে কুন্তীনন্দন! সারথির মুখে এই কথা শুনে—শত্রু যদি ঘরে নিশ্চিন্তে আসনে বসেও থাকে, তবু তাকে অবহেলা করা উচিত নয়; আর যে রণক্ষেত্রে যুদ্ধের জন্য দাঁড়িয়ে আছে, তার কথা তো বলাই বাহুল্য—আমি সেই উপদেশকে যথার্থ মনে করলাম। এইভাবে চিন্তা করে আমি যুদ্ধে মন স্থির করলাম—রাজা শাল্বকে বধ করতে এবং সৌভ বিমানদুর্গকে পতিত করতে।

Verse 27

तत्त्वमेतदिति ज्ञात्वा युद्धे मतिमधारयम्‌ । वधाय शाल्वराजस्य सौभस्य च निपातने

এটাই সত্য পথ জেনে আমি যুদ্ধে সংকল্প স্থির করলাম—রাজা শাল্বকে বধ করতে এবং সৌভকে পতিত করতে। উপদেশ ছিল স্পষ্ট: শত্রু যদি ঘরে নিশ্চিন্তে বসেও থাকে, তবু তাকে ছাড়তে নেই; আর যে রণক্ষেত্রে যুদ্ধের জন্য দাঁড়িয়ে আছে, তার কথা তো বলাই বাহুল্য। এই শত্রু কোমল উপায়ে বশ মানে না; সে মৈত্রী ভেঙে আমার সঙ্গে যুদ্ধ করেছে এবং দ্বারকাকে ধ্বংস করেছে। অতএব যুদ্ধে দ্রুত ও সিদ্ধান্তমূলক কর্মই ধর্মসম্মত রক্ষাকর্তব্য বলে প্রতীয়মান হল।

Verse 28

दारुकं चाब्रुवं वीर मुहूर्त स्थीयतामिति । ततो<प्रतिहतं दिव्यमभेद्यमतिवीर्यवत्‌

হে বীর! তখন আমি দারুককে বললাম—“সারথি, অল্পক্ষণ স্থির থাকো।” তারপর আমি এক দিব্য অস্ত্র সংযোজিত করলাম—যা কোথাও বাধাপ্রাপ্ত হয় না, ভেদ করা যায় না, এবং অপরিমেয় শক্তিসম্পন্ন। এই বিরতি দ্বিধা নয়; ধর্মসম্মত শৃঙ্খলা—বল প্রয়োগের আগে সংযম ও যথাযথ ক্রম রক্ষা।

Verse 29

आग्नेयमस्त्र दयितं सर्वसाहं महाप्रभम्‌ । योजयं तत्र धनुषा दानवान्तकरं रणे

বায়ু বললেন—তারপর আমি ধনুকে স্থাপন করলাম প্রিয়, সর্বসহ, মহাপ্রভা আগ্নেয়াস্ত্র—যা রণে দানববিনাশক বলে প্রসিদ্ধ। এরপর আমি দারুককে বললাম—“সারথি, আর মাত্র দু’দণ্ড স্থির থাকো; তারপর তোমার অভিলাষ পূর্ণ হবে।” তখন আমি সেই দিব্য, অভেদ্য, অতিশয় শক্তিশালী ও দীপ্তিমান আগ্নেয় অস্ত্র দৃঢ়ভাবে সংযোজিত করলাম।

Verse 30

यक्षाणां राक्षसानां च दानवानां च संयुगे । राज्ञां च प्रतिलोमानां भस्मान्तकरणं महत्‌,इतना ही नहीं, वह यक्षों, राक्षसों, दानवों तथा विपक्षी राजाओंको भी भस्म कर डालनेवाला और महान था

বায়ু বললেন—যুদ্ধে সেই অস্ত্র ছিল মহাশক্তিধর; যক্ষ, রাক্ষস, দানব—এদেরই নয়, বিরোধী শত্রু রাজাদেরও ভস্ম করে দিতে সক্ষম।

Verse 31

क्षुरान्तममलं चक्रं कालान्तकयमोपमम्‌ । अनुमन्त्रयाहमतुलं द्विषतां विनिबर्हणम्‌

বায়ু বললেন— আমি মন্ত্রবলে এক অতুল, নির্মল চক্রকে অভিমন্ত্রিত করলাম; তার প্রান্তে ক্ষুরধার ফলার মতো ধার, আর সে কাল, অন্তক ও যমের ন্যায় ভয়ংকর। সেই শত্রুনাশক অনুপম অস্ত্রকে সিদ্ধ করে আমি স্থির করলাম— নিজের বাহুবলে তাকে সৌভ আকাশনগর ও তাতে অবস্থানকারী আমার শত্রুদের বিনাশের জন্য প্রেরণ করব।

Verse 32

जहि सौभे स्ववीर्येण ये चात्र रिपवो मम । इत्युक्त्वा भुजवीर्येण तस्मै प्राहिणवं रुषा

বায়ু বললেন— “নিজ শক্তিতেই সৌভকে ধ্বংস কর, আর সেখানে যে আমার শত্রুরা আছে তাদেরও সংহার কর।” এ কথা বলে ক্রোধে, বাহুবলের ভরসায়, তিনি সেই অস্ত্রকে সেদিকে প্রেরণ করলেন।

Verse 33

रूप॑ सुदर्शनस्थासीदाकाशे पततस्तदा । द्वितीयस्येव सूर्यस्य युगान्ते प्रपतिष्यत:,आकाशमें जाते ही उस सुदर्शन चक्रका स्वरूप प्रलयकालमें उगनेवाले द्वितीय सूर्यके समान प्रकाशित हो उठा

আকাশে ধাবিত হতেই সেই সুদর্শন চক্রের রূপ ও দীপ্তি এমন জ্বলে উঠল, যেন যুগান্তে উদিত হতে চলা দ্বিতীয় সূর্য।

Verse 34

तत्‌ समासाद्य नगरं सौभं व्यपगतत्विषम्‌ । मध्येन पाटयामास क्रकचो दार्विवोच्छितम्‌

সে সৌভ নগরে পৌঁছে তার সমস্ত দীপ্তি কেড়ে নিল; তারপর যেমন করাত উঁচু কাঠের স্তূপ চিরে ফেলে, তেমনি সৌভ আকাশদুর্গকে মাঝখান দিয়ে বিদীর্ণ করল।

Verse 35

द्विधा कृतं ततः: सौभ॑ सुदर्शनबलाद्धतम्‌ । महेश्वरशरोद्धूतं पपात त्रिपुरं यथा

তখন সুদর্শনের শক্তিতে আঘাতপ্রাপ্ত হয়ে সৌভ আকাশনগর দ্বিখণ্ডিত হল; আর মহেশ্বরের শরবিদ্ধ হয়ে যেমন ত্রিপুর পতিত হয়েছিল, তেমনি তা ভূমিতে আছড়ে পড়ল।

Verse 36

तस्मिन्‌ निपतिते सौभे चक्रमागात्‌ करं मम | पुनश्चादाय वेगेन शाल्वायेत्यहमब्रुवम्‌

সৌভ-বিমান পতিত হতেই চক্রটি আবার আমার হাতে ফিরে এল। আমি তা পুনরায় বেগসহকারে ধারণ করে বললাম—“এবার শাল্বকে নিধন করবার জন্যই তোমাকে মুক্ত করলাম।”

Verse 37

ततः शाल्वं गदां गुर्वीमाविध्यन्तं महाहवे । द्विधा चकार सहसा प्रजज्वाल च तेजसा,तब उस चक्रने महासमरमें बड़ी भारी गदा घुमानेवाले शाल्वके सहसा दो टुकड़े कर दिये और वह तेजसे प्रज्वलित हो उठा

তখন মহাসমরে ভারী গদা ঘোরাতে থাকা শাল্বকে সেই চক্র মুহূর্তে দ্বিখণ্ডিত করল; আর নিজ তেজে দগ্ধ হয়ে জ্বলে উঠল।

Verse 38

तस्मिन्‌ विनिहते वीरे दानवास्त्रस्तचेतस: । हाहाभूता दिशो जम्मुरदिता मम सायकै:,वीर शाल्वके मारे जानेपर दानवोंके मनमें भय समा गया। वे मेरे बाणोंसे पीड़ित हो हाहाकार करते हुए सब दिशाओंमें भाग गये

সেই বীর শাল্ব নিহত হতেই দানবদের চিত্ত ভয়ে কাঁপল। আমার শরবিদ্ধ হয়ে তারা ‘হা হা’ ধ্বনি করতে করতে সকল দিকে পালিয়ে গেল।

Verse 39

ततो<5हं समवस्थाप्य रथं सौभसमीपत: । शड्खं प्रध्माप्य हर्षेण सुहृद: पर्यहर्षयम्‌,तब मैंने सौभविमानके समीप अपने रथको खड़ा करके प्रसन्नतापूर्वक शंख बजाकर सभी सुहृदोंको हर्षमें निमग्न कर दिया

তারপর আমি সৌভের নিকটে রথ স্থাপন করলাম। আনন্দে শঙ্খধ্বনি করে আমার সকল সুহৃদকে উল্লাসে ভরিয়ে দিলাম।

Verse 40

तन्मेरुशिखराकारं विध्वस्ताट्टालगोपुरम्‌ । दह्यूमानमभिप्रेक्ष्य स्त्रियस्ता: सम्प्रदुद्गरुवु:

মেরুশিখরের ন্যায় আকৃতিবিশিষ্ট সেই সৌভ-নগরের প্রাচীর-প্রাসাদ ও গোপুর সকলই বিধ্বস্ত হল। ধোঁয়া ও অগ্নিতে দগ্ধ হতে দেখে সেখানে বাসকারী নারীরা আতঙ্কে এদিক-ওদিক ছুটে পালাল।

Verse 41

एवं निहत्य समरे सौभ॑ शाल्व॑ निपात्य च । आनर्तान्‌ पुनरागम्य सुहृदां प्रीतिमावहम्‌

এভাবে যুদ্ধে সৌভ আকাশদুর্গ ধ্বংস করে এবং রাজা শাল্বকেও নিপাত করে আমি পুনরায় আনর্তদেশে (দ্বারকা) ফিরে এলাম এবং আমার সুহৃদদের আনন্দের কারণ হলাম, হে ধর্মরাজ।

Verse 42

तदेतत्‌ कारणं राजन्‌ यदहं नागसाह्नयम्‌ । नागमं परवीरघ्न न हि जीवेत्‌ सुयोधन:

হে রাজন, এই কারণেই সেই দিনগুলোতে আমি হস্তিনাপুরে আসতে পারিনি। হে পরবীরঘ্ন ধর্মরাজ, আমি এলে হয় পাশাখেলা আদৌ ঘটত না, নয়তো সুয়োধন (দুর্যোধন) জীবিত থাকত না।

Verse 43

मय्यागते<5थवा वीर द्यूतं न भविता तथा । अद्याहं कि करिष्यामि भिन्नसेतुरिवोदकम्‌

হে বীর, আমি সেখানে এলে পাশাখেলা তেমন করে ঘটত না—অথবা দুর্যোধন জীবিত থাকত না। কিন্তু আজ, হে রাজন, যখন সবই বিগড়ে গেছে, আমি কী করতে পারি? বাঁধ ভেঙে গেলে যেমন জলকে আর আটকানো যায় না, তেমনি ঘটনাও বন্ধন ছিঁড়ে অপ্রতিরোধ্য বেগে এগিয়ে চলে।

Verse 44

वैशम्पायन उवाच एवमुकक्‍्त्वा महाबाहु: कौरवं पुरुषोत्तम: । आमन्त्रय प्रययौ श्रीमान्‌ पाण्डवान्‌ मधुसूदन:

বৈশম্পায়ন বললেন—জনমেজয়! এ কথা বলে পুরুষশ্রেষ্ঠ, মহাবাহু, শ্রীমান মধুসূদন পাণ্ডবদের কাছে বিদায় নিলেন এবং কৌরবনন্দন (যুধিষ্ঠির)-এর অনুমতি পেয়ে দ্বারকার দিকে যাত্রা করলেন।

Verse 45

अभिवाद्य महाबाहुर्धर्मराजं युधिष्ठिरम्‌ । राज्ञा मूर्थन्युपाप्रातो भीमेन च महाभुज:

মহাবাহু শ্রীকৃষ্ণ ধর্মরাজ যুধিষ্ঠিরকে প্রণাম করলেন। তখন রাজা যুধিষ্ঠির ও ভীম স্নেহভরে সেই মহাভুজ শ্রীকৃষ্ণের মস্তক স্পর্শ করে তা শুঁকে স্নেহ-সম্মান প্রকাশ করলেন।

Verse 46

परिष्वक्तश्नार्जुनेन यमा भ्यां चाभिवादित: । सम्मानितश्च धौम्येन द्रौपद्या चार्चितो5श्रुभि:

অর্জুন তাঁকে বুকে জড়িয়ে ধরলেন, আর যমপুত্র যুগল নকুল-সহদেব শ্রদ্ধায় তাঁর চরণে প্রণাম করল। কুলপুরোহিত ধৌম্য যথোচিত সম্মান জানালেন, এবং দ্রৌপদী হৃদয়ভরা অশ্রু নিয়ে ভক্তিভরে তাঁকে আরাধনা করলেন।

Verse 47

सुभद्रामभिमन्युं च रथमारोप्य काउ्चनम्‌ | आरुरोह रथं कृष्ण: पाण्डवैरभिपूजित:,पाण्डवोंसे सम्मानित श्रीकृष्ण सुभद्रा और अभिमन्युको अपने सुवर्णमय रथपर बैठाकर स्वयं भी उसपर आरूढ़ हुए

পাণ্ডবদের দ্বারা যথোচিত সম্মানিত শ্রীকৃষ্ণ সুবদ্রা ও অভিমন্যুকে স্বর্ণময় রথে বসিয়ে, নিজেও সেই রথে আরোহণ করলেন।

Verse 48

शैब्यसुग्रीवयुक्तेन रथेनादित्यवर्चसा । द्वारकां प्रययौ कृष्ण: समाश्वास्य युधिष्ठिरम्‌

শৈব্য ও সুগ্রীব নামক অশ্বযোজিত, সূর্যসম দীপ্তিমান সেই রথে চড়ে শ্রীকৃষ্ণ যুধিষ্ঠিরকে সান্ত্বনা দিয়ে দ্বারকার দিকে যাত্রা করলেন।

Verse 49

ततः प्रयाते दाशाहें धृष्टद्युम्नोडपि पार्षत: । द्रौपदेयानुपादाय प्रययौ स्वपुरं तदा,श्रीकृष्णके चले जानेपर ट्रुपदपुत्र धृष्टद्युम्नने भी द्रौपदीकुमारोंको साथ ले अपनी राजधानीको प्रस्थान किया

দাশার্হ শ্রীকৃষ্ণ প্রস্থান করলে, পৃষতপুত্র ধৃষ্টদ্যুম্নও দ্রৌপদীর পুত্রদের সঙ্গে নিয়ে তখন নিজের নগরীর দিকে রওনা হলেন।

Verse 50

धृष्टकेतु: स्वसारं च समादायाथ चेदिराट्‌ । जगाम पाण्डवान्‌ दृष्टवा रम्यां शुक्तिमतीं पुरीम्‌

তখন চেদিরাজ ধৃষ্টকেতু নিজের ভগ্নীকে সঙ্গে নিয়ে পাণ্ডবদের সঙ্গে সাক্ষাৎ করে, মনোরম শুক্তিমতী নগরী দেখে সেদিকেই অগ্রসর হলেন।

Verse 51

केकयाश्षाप्यनुज्ञाता: कौन्तेयेनामितौजसा । आमन्त्र्य पाण्डवान्‌ सर्वान्‌ प्रययुस्तेषपि भारत

বৈশম্পায়ন বললেন—অমিততেজস্বী কুন্তীনন্দন যুধিষ্ঠিরের অনুমতি পেয়ে কেকয়রাজপুত্রেরা সকল পাণ্ডবকে বিদায় জানিয়ে নিজেদের নগরের দিকে যাত্রা করল।

Verse 52

ब्राह्मणाश्ष विशश्वैव तथा विषयवासिन: । विसृज्यमाना: सुभृशं न त्यजन्ति सम पाण्डवान्‌,युधिष्ठिरके राज्यमें रहनेवाले ब्राह्मण तथा वैश्य बारंबार विदा करनेपर भी पाण्डवोंको छोड़कर जाना नहीं चाहते थे

বৈশম্পায়ন বললেন—ব্রাহ্মণ, বৈশ্য এবং রাজ্যের অন্যান্য অধিবাসীরা বারবার বিদায় দেওয়া সত্ত্বেও পাণ্ডবদের ত্যাগ করতে চাইত না।

Verse 53

समवाय: स राजेन्द्र सुमहाद्भुतदर्शन: । आसीन्महात्मनां तेषां काम्यके भरतर्षभ,भरतवंशभूषण महाराज जनमेजय! उस समय काम्यकवनमें उन महात्माओंका बड़ा अद्भुत सम्मेलन जुटा था

বৈশম্পায়ন বললেন—হে রাজেন্দ্র, হে ভরতশ্রেষ্ঠ! সেই মহাত্মাদের সমাবেশ কাম্যক বনে ছিল মহৎ ও বিস্ময়কর দর্শনীয়।

Verse 54

युधिष्ठिरस्तु विप्रांस्ताननुमान्य महामना: । शशास पुरुषान्‌ काले रथान्‌ योजयतेति वै,तदनन्तर महामना युधिष्ठिरने सब ब्राह्मणोंकी अनुमतिसे अपने सेवकोंको समयपर आज्ञा दी--*रथोंको जोतकर तैयार करो”

তারপর মহামনা যুধিষ্ঠির সেই ব্রাহ্মণদের সম্মতি নিয়ে যথাসময়ে নিজের অনুচরদের আদেশ দিলেন—“রথগুলো জুড়ে প্রস্তুত করো।”

Frequently Asked Questions

The dilemma is divided duty under uncertain information: whether to disengage to protect Dvārakā based on a distressing report, or to maintain the present engagement—requiring discernment about truth, deception, and proportional response.

Perception is not equivalent to reality in moments of crisis; disciplined discrimination (viveka) and emotional regulation are necessary to prevent strategic and ethical failure when deceptive appearances target attachment and grief.

No explicit phalaśruti is stated in these verses; the chapter’s meta-function is implicit—illustrating how recognizing māyā preserves agency and dharmic action within the epic’s larger moral-psychological framework.

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