Mahabharata Adhyaya 210
Vana ParvaAdhyaya 21078 Verses

Adhyaya 210

पञ्चवर्णोत्पत्तिः — The Origin of the Five-Colored Fiery Being and Ritual-Disruptor Lineages

Upa-parva: Mārkaṇḍeya-ṛṣi Upākhyāna (Genealogical–Ritual Discourse on Tapas and Yajña)

Mārkaṇḍeya enumerates five ascetic figures—Kāśyapa, Vāsiṣṭha, Prāṇa (and Prāṇaputraka), Agni Āṅgirasa, and Cyavana Triṣuvarcaka—who undertake prolonged tapas seeking a righteous, renowned son. Through meditation on the five mahāvyāhṛtis, a luminous five-colored being arises, described with a fiery head and solar-like arms, with contrasting golden and dark features. The discourse identifies this entity as Pāñcajanya, known in Vedic tradition and characterized as a progenitor of “five lineages” (pañcavaṃśakara). After extended austerity, further emanations and named offspring are listed, organizing a genealogical register. The chapter then shifts to ritual theory: groups arranged in sets of five are said to appropriate or obstruct sacrificial offerings, harming sacrificial outcomes through rivalry, yet they avoid properly established fires and are subdued by mantra when the ritual is correctly conducted. The close reinforces that well-founded agnihotra and competent ritual performance on earth secure sacrificial integrity, and it notes specific fires/sons (e.g., Bhūmi-upāśrita, Rathantara) recognized by ritual specialists.

Chapter Arc: मार्कण्डेय ऋषि धर्म की सूक्ष्मता का द्वार खोलते हैं और धर्मव्याध के मुख से यह प्रतिज्ञा कराते हैं कि धर्म केवल नियम नहीं—विवेक की कठिन परीक्षा है। → धर्मव्याध ‘श्रुति-प्रमाण’ और ‘वृद्धानुशासन’ का सहारा लेकर बताता है कि धर्म की गति बहुशाखी और अनन्त है; फिर वह सत्य-असत्य के कठोर द्वन्द्व को उठाता है—कुछ स्थितियों में प्राणरक्षा, विवाह-रक्षा या महाविपत्ति में असत्य-वचन भी धर्म के निकट हो सकता है, क्योंकि परिणाम-धर्म (फल) और करुणा-धर्म (हित) भी साथ चलते हैं। → वह कर्म-फल की अपरिहार्यता और जीव की अवशता का निर्णायक कथन करता है—कोई भी ब्रह्मन्, अपने हाथ में आयी वस्तुओं/परिस्थितियों का पूर्ण स्वामी नहीं; मनुष्य अपने ही कृत दोषों से जन्म-मृत्यु-जरा-दुःख में पकता है, और इसी कर्म-चक्र से मुक्ति का उपाय भी कर्म-शुद्धि, शम-दम और वैराग्य है। → धर्मव्याध मोक्ष-मार्ग को क्रमबद्ध करता है: शुभ-अशुभ कर्मों की पहचान, पाप-त्याग, वैराग्य, शम-दम-तप, बन्धन-निवृत्ति और विशुद्धि—जिससे मनुष्य पहले सुकृत-लोकों को और अंततः परम मोक्ष को प्राप्त करता है, जहाँ जाकर शोक नहीं रहता। → धर्म की यह सूक्ष्म कसौटी सुनकर श्रोता के भीतर प्रश्न शेष रहता है—किस विशेष परिस्थिति में ‘हितकारी असत्य’ वास्तव में धर्म होगा, और कब वह केवल स्वार्थ का आवरण?

Shlokas

Verse 1

हि न (0) है 7 नवाधिकद्विशततमो< ध्याय: धर्मकी सूक्ष्मता

মার্কণ্ডেয় বললেন—হে যুধিষ্ঠির, ধর্মনিষ্ঠদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ! সূক্ষ্ম বিচারবুদ্ধিতে নিপুণ ধর্মব্যাধ আবার ব্রাহ্মণদের মধ্যে বৃষভসম কৌশিককে উদ্দেশ করে উপদেশ আরম্ভ করল।

Verse 2

व्याध उवाच श्रुतिप्रमाणो धर्मोड्यमिति वृद्धानुशासनम्‌ | सूक्ष्मा गतिहिं धर्मस्य बहुशाखा हानन्तिका

ব্যাধ বলল—বৃদ্ধদের উপদেশ এই যে, ‘ধর্মের প্রমাণ শ্রুতি—বেদই।’ তা সত্য; তবু ধর্মের গতি অতি সূক্ষ্ম—তার ভেদ অনন্ত, শাখা বহু।

Verse 3

प्राणान्तिके विवाहे च वक्तव्यमनृतं भवेत्‌ | अनृतेन भवेत्‌ सत्यं सत्येनैवानृतं भवेत्‌

ব্যাধ বলল—প্রাণসঙ্কট উপস্থিত হলে, আর বিবাহকার্য সম্পন্ন করার সময়ও, কখনও অসত্য বলতে হতে পারে। অসত্যের দ্বারা সত্যের ফল ঘটে, আর সত্যের দ্বারাই কখনও অসত্যের ফল ঘটে।

Verse 4

यद्‌ भूतहितमत्यन्तं तत्‌ सत्यमिति धारणा । विपर्ययकृतो<धर्म: पश्य धर्मस्य सूक्ष्मताम्‌

যা জীবসমূহের পরম মঙ্গল সাধন করে, তাকেই ‘সত্য’ বলে ধারণা করা উচিত। বিপরীতভাবে যা অমঙ্গল আনে, তা বাহ্যত সত্য হলেও অধর্ম হয়ে দাঁড়ায়—দেখো, ধর্ম কত সূক্ষ্ম।

Verse 5

यत्‌ करोत्यशुभं कर्म शुभं वा यदि सत्तम | अवश्यं तत्‌ समाप्रोति पुरुषो नात्र संशय:,सज्जनशिरोमणे! मनुष्य जो शुभ या अशुभ कार्य करता है, उसका फल उसे अवश्य भोगना पड़ता है, इसमें संशय नहीं है

হে সজ্জনশিরোমণি! মানুষ শুভ বা অশুভ যে কর্মই করুক, তার ফল তাকে অবশ্যম্ভাবীভাবে ভোগ করতে হয়—এতে কোনো সন্দেহ নেই।

Verse 6

विषमां च दशां प्राप्तो देवान्‌ गहति वै भृशम्‌ । आत्मन: कर्मदोषाणि न विजानात्यपण्डित:

মূর্খ মানুষ যখন কঠিন ও বিষম অবস্থায় পড়ে, তখন সে দেবতাদের প্রবলভাবে দোষারোপ করে ও নিন্দায় ভরিয়ে তোলে; কিন্তু বোঝে না—এ দুঃখ তার নিজের কর্মদোষেরই ফল।

Verse 7

मूढो नैकृतिकश्चापि चपलश्च द्विजोत्तम । सुखदुःखविपर्यासान्‌ सदा समुपपद्यते

হে দ্বিজোত্তম! যে মানুষ মোহগ্রস্ত, কপট ও চঞ্চল, সে সর্বদাই সুখ-দুঃখের উলটপালটে পড়ে থাকে।

Verse 8

योड्यमिच्छेद्‌ यथा काम त॑ तं कामं स आप्नुयात्‌

মানুষ যদি নিজের ইচ্ছামতো কোনো উদ্যোগ গ্রহণ করতে চায়, তবে সে সেই কাম্য বস্তুই লাভ করে।

Verse 9

संयताश्चापि दक्षाश्व॒ मतिमन्तश्व मानवा:

তারা সংযমীও বটে, দক্ষও বটে, এবং বিচক্ষণ মানব।

Verse 10

भूतानामपर: कश्रिद्धिंसायां सततोत्थित:

শিকারি বলল—প্রাণীদের মধ্যে আর-এক ধরনের মানুষ আছে, যে সর্বদা হিংসায়ই উদ্যত থাকে।

Verse 11

अचेष्टमपि चासीनं श्री: कंचिदुपतिछ्ठति

কেউ কোনো চেষ্টা না করেও কেবল বসে থাকলেও, শ্রী (লক্ষ্মী) তার কাছে এসে দাঁড়াতে পারেন। তাই জাগতিক সাফল্য সব সময় পুণ্য বা পরিশ্রমের সরাসরি মাপকাঠি নয়; বিচার হওয়া উচিত ধর্ম ও আচরণ দেখে, দৃশ্যমান ঐশ্বর্য দেখে নয়।

Verse 12

देवानिष्टवा तपस्तप्त्वा कृपणै: पुत्रगृद्धिभि:

দেবতাদের পূজা করে ও তপস্যা করেও, অনেকেই কৃপণচিত্তে তা করে—পুত্রলালসায় চালিত হয়ে।

Verse 13

अपरे धनधान्यैश्न भोगैश्व पितृसंचितै:

আর কেউ কেউ পিতৃপুরুষদের সঞ্চিত ধন-ধান্য ও ভোগবিলাসের উপরই জীবনযাপন করে।

Verse 14

कर्मजा हि मनुष्याणां रोगा नास्त्यत्र संशय:

শিকারি বলল—মানুষের রোগ তাদের নিজের কর্ম থেকেই জন্মায়; এতে কোনো সন্দেহ নেই।

Verse 15

ते चापि कुशलैरवद्यैर्निपुणै: सम्भूतौषधै:

তারাও দক্ষ, নির্দোষ ও নিপুণ বৈদ্যদের দ্বারা চিকিৎসিত হল—ভেষজ থেকে যথাবিধি প্রস্তুত ঔষধে—যাতে সেবাটি যেমন পারদর্শী, তেমনি ধর্মতঃ কলুষহীন রইল।

Verse 16

येषामस्ति च भोक्तव्यं ग्रहणीदोषपीडिता:

ব্যাধ বলল—“কিছু লোকের কাছে ভোজনযোগ্য আহার আছে, তবু তারা গ্রহণী-দোষে পীড়িত; তাই যা আছে, তা তারা না ঠিকমতো ভোগ করতে পারে, না যথাযথভাবে হজম-আত্মসাৎ করতে পারে।”

Verse 17

अपरे बाहुबलिन: क्लिश्यन्ते बहवो जना:

“আরও অনেকে, বাহুবলে বলীয়ান হয়েও, ক্লেশ ভোগ করে; বহু মানুষ দুঃখে অভিভূত থাকে।”

Verse 18

इति लोकमनाक्रन्दं मोहशोकपरिप्लुतम्‌

“এইরূপই লোক—সত্যিকারের আর্তনাদহীন, তবু মোহ ও শোকে সম্পূর্ণ প্লাবিত।”

Verse 19

न म्रियेयुर्न जीर्येयु: सर्वे स्यु: सार्वकामिका:

“কেউ মরবে না, কেউ জীর্ণ হবে না; সকলেই সর্বকাম-সম্পন্ন থাকবে।”

Verse 20

उपर्युपरि लोकस्य सर्वो गन्तुं समीहते । यतते च यथाशक्ति न च तद्‌ वर्तते तथा

সবাই জগতের ওপর উঠে যেতে চায়—সবার চেয়ে উচ্চ হতে চায়। প্রত্যেকে নিজের শক্তি অনুযায়ী চেষ্টা করে; কিন্তু ফল সব সময় তেমন হয় না।

Verse 21

बहव: सम्प्रदृश्यन्ते तुल्यनक्षत्रमड्रला: । महच्च फलवैषम्यं दृश्यते कर्मसंधिषु

অনেক মানুষকে দেখা যায় যাদের জন্ম একই নক্ষত্রে, এবং যাদের জন্য শুভকর্ম-অনুষ্ঠানও একইভাবে সম্পন্ন হয়েছে; তবু সঞ্চিত কর্মের ভিন্নতার কারণে তাদের প্রাপ্ত ফলের মধ্যে বড় বৈষম্য স্পষ্ট দেখা যায়।

Verse 22

न केचिदीशते ब्रह्मन्‌ स्वयंग्राह्म॒ुस्थ सत्तम । कर्मणा प्राक्‌ कृतानां वै इह सिद्धि: प्रदृश्यते

হে ব্রাহ্মণ, হে সৎপুরুষশ্রেষ্ঠ! কেউই নিজের হাতে আসা বিষয়ের উপরও সম্পূর্ণ কর্তৃত্ব রাখতে পারে না। এই জগতে পূর্বকৃত কর্মেরই সিদ্ধি—তারই ফল—দেখা যায়।

Verse 23

यथाश्रुतिरियं ब्रह्मन्‌ू जीव: किल सनातन: । शरीरमध्ृर॒वं लोके सर्वेषां प्राणिनामिह,विप्रवर! श्रुतिके अनुसार यह जीवात्मा निश्चय ही सनातन है और इस संसारमें समस्त प्राणियोंका शरीर नश्वर है

হে ব্রাহ্মণশ্রেষ্ঠ! শ্রুতির বচন অনুসারে এই জীব নিশ্চয়ই সনাতন; কিন্তু এই জগতে সকল প্রাণীর দেহ অধ্রুব—নশ্বর।

Verse 24

वध्यमाने शरीरे तु देहनाशो भवत्युत । जीव: सड्क्रमते<न्यत्र कर्मबन्धनिबन्धन:

দেহ নিহত হলে নাশ হয় কেবল দেহেরই। জীব তার কর্মবন্ধনের টানে অন্যত্র গমন করে।

Verse 25

शरीरपर आघात करनेसे उस शरीरका नाश तो हो जाता है; किंतु अविनाशी जीव नहीं मरता। वह कर्मोंके बन्धनमें बँधकर फिर दूसरे शरीरमें प्रवेश कर जाता है ।।

ব্রাহ্মণ বললেন—হে ধর্মজ্ঞদের শ্রেষ্ঠ, হে বক্তাদের অগ্রগণ্য! জীব কীভাবে শাশ্বত? আমি এ বিষয়টি তত্ত্বত জানতে চাই।

Verse 26

व्याध उवाच न जीवनाशो<स्ति हि देहभेदे मिथ्यैतदाहुर्ग्नियते किलेति । जीवस्तु देहान्तरित: प्रयाति दशार्धतैवास्यथ शरीरभेद:

ব্যাধ বলল—দেহ ভেঙে গেলেও জীবের বিনাশ হয় না; ‘এটি মরে’—মানুষের এ কথা মিথ্যা। জীব এই দেহ ত্যাগ করে অন্য দেহে গমন করে। দেহের ‘মৃত্যু’ বলতে বোঝায় কেবল তার পঞ্চভূতের বিচ্ছেদ ও নিজ নিজ মৌল তত্ত্বে প্রত্যাবর্তন।

Verse 27

अन्यो हि नाक्षाति कृतं हि कर्म मनुष्यलोके मनुजस्य कश्रित्‌ | यत्‌ तेन किंचिद्धि कृतं हि कर्म तदश्लुते नास्ति कृतस्य नाश:

ব্যাধ বলল—মানুষলোকের মধ্যে কৃত কর্মের ফল থেকে কেউই রক্ষা পায় না। মানুষ যা-ই করুক—অতি সামান্য হলেও—তার ফল অবশ্যই ভোগ করতে হয়; কৃত কর্মের বিনাশ নেই।

Verse 28

इस मानवलोकमें मनुष्यके किये हुए कर्मको (उस कतकि सिवा) दूसरा कोई नहीं भोगता है। उसके द्वारा जो कुछ ही कर्म किया गया है, उसे वह स्वयं ही भोगेगा। किये हुए कर्मोका कभी नाश नहीं होता ।।

এই মানবলোকে নিজের কৃত কর্মের ফল কর্তা নিজেই ভোগ করে, অন্য কেউ নয়। সে যা কিছুই করেছে, তার ফল তাকে অবশ্যই ভোগ করতে হয়; কৃত কর্মের বিনাশ নেই। যাঁরা সুকর্মে স্থিত, তাঁরা পুণ্য লাভ করেন; আর অধমেরা পাপে প্রবৃত্ত হয়ে পাপই অর্জন করে। মানুষ নিজের কর্মেরই অনুসরণে চলে, এবং সেই কর্মের দ্বারা গঠিত হয়ে বারবার অন্য জন্ম ধারণ করে।

Verse 29

ब्राह्मण उवाच कथं सम्भवते योनौ कथं वा पुण्यपापयो: । जाती: पुण्यास्त्वपुण्याश्ष कथं गच्छति सत्तम

ব্রাহ্মণ বললেন—হে সজ্জনদের শ্রেষ্ঠ! জীব কীভাবে কোনো বিশেষ যোনিতে জন্ম লাভ করে? পুণ্য ও পাপের সঙ্গে তার সম্পর্ক কীভাবে স্থাপিত হয়? আর সে কীভাবে পুণ্যযোনি ও অপুণ্যযোনি লাভ করে?

Verse 30

व्याध उवाच गर्भाधानसमायुक्तं कर्मेदं सम्प्रदृश्यते । समासेन तु ते क्षिप्रं प्रवक्ष्यामि द्विजोत्तम

ব্যাধ বলল—হে দ্বিজশ্রেষ্ঠ! গর্ভাধানাদি সংস্কার-সম্পর্কিত পরম্পরায় দেখা যায়, এ সমস্তই কর্মের অধীন। অতএব, হে ব্রাহ্মণোত্তম, আমি সংক্ষেপে শীঘ্রই বলছি—শোনো—কোন কর্মে জীব কোন অবস্থায় জন্ম লাভ করে।

Verse 31

यथा सम्भूतसम्भार: पुनरेव प्रजायते । शुभकृच्छुभयोनीषु पापकृत्‌ पापयोनिषु

যেমন জীব কর্মবীজের সমাহার সঞ্চয় করে পুনরায় জন্ম লাভ করে, তেমনই এখানে বলা হয়েছে। শুভকর্মকারী শুভ যোনিতে, আর পাপকর্মকারী পাপ যোনিতে জন্ম গ্রহণ করে।

Verse 32

शुभै: प्रयोगैर्देवत्वं व्यामिश्रैर्मानुषो भवेत्‌ मोहनीयैर्वियोनीषु त्वधोगामी च किल्बिषी

শুভ কর্মের প্রয়োগে জীব দেবত্ব লাভ করে। শুভ-অশুভ মিশ্র কর্মে মানবযোনি প্রাপ্ত হয়। মোহজনক তামস কর্মে সে পশু-পক্ষী প্রভৃতি নিম্ন যোনিতে পতিত হয়; আর যে কেবল পাপ সঞ্চয় করেছে, সে অধোগামী অপরাধী হয়ে নরকগামী হয়।

Verse 33

जातिमृत्युजरादु:खै: सततं समभिद्रुत: । संसारे पच्यमानश्न दोषैरात्मकृतैर्नर:,मनुष्य अपने ही किये हुए अपराधोंके कारण जन्म-मृत्यु और जरासम्बन्धी दु:खोंसे सदा पीडित हो बारंबार संसारमें पचता रहता है

মানুষ নিজেরই কৃত দোষের কারণে জন্ম, মৃত্যু ও জরার দুঃখে সর্বদা পীড়িত থাকে; আর সংসারচক্রে বারংবার দগ্ধ হতে থাকে।

Verse 34

तिर्यग्योनिसहस्राणि गत्वा नरकमेव च । जीवा: सम्परिवर्तन्ते कर्मबन्धनिबन्धना:,कर्मबन्धनमें बँधे हुए (पापी) जीव सहस्रों प्रकारकी तिर्यक्‌ योनियों तथा नरकॉंमें चक्कर लगाया करते हैं

কর্মবন্ধনে আবদ্ধ জীবেরা সহস্র সহস্র তির্যক্ যোনি এবং নরকেও গিয়ে বারবার আবর্তিত হয়।

Verse 35

जन्तुस्तु कर्मभिस्तैस्तै: स्वकृतैः प्रेत्य दु:खित: । तददुःखप्रतिघातार्थमपुण्यां योनिमाप्लुते

জীব নিজকৃত কর্মের ফলেই মৃত্যুর পরে দুঃখভোগ করে; সেই দুঃখের প্রতিঘাত (নিবারণ) সাধনের জন্য সে অপুণ্য যোনিতে প্রবেশ করে।

Verse 36

प्रत्येक जीव अपने किये हुए कममोसे ही मृत्युके पश्चात्‌ दुःख भोगता है और उस दुःखका भोग करनेके लिये ही वह (चाण्डालादि) पापयोनिमें जन्म लेता है ।।

শিকারি বলল—প্রত্যেক জীব মৃত্যুর পরে নিজেরই কৃত কর্মফলে দুঃখ ভোগ করে; আর সেই দুঃখভোগের জন্যই সে চাণ্ডাল প্রভৃতি পাপযোনিতে জন্ম নেয়। তারপর সে আবার বহু নতুন নতুন কর্ম গ্রহণ করে; এবং সেগুলির দ্বারাই বারবার দগ্ধ হয়—যেমন অপথ্য ভক্ষণকারী রোগী নানা রকম কষ্ট সহ্য করে।

Verse 37

अजसमेव दु:खार्तो5दु:ःखित: सुखसंज्ञित: । ततो<निवृत्तबन्धत्वात्‌ कर्मणामुदयादपि

মানুষ প্রকৃতপক্ষে দুঃখে পীড়িত হয়েও ‘দুঃখিত নয়’ ও ‘সুখী’ বলে গণ্য হয়—কারণ সে আসক্তি থেকে নিবৃত্ত হয়নি। কর্মফল উদিত হলেও, আসক্তি যতক্ষণ থাকে ততক্ষণ বন্ধনও থাকে।

Verse 38

स चेन्निवृत्तबन्धस्तु विशुद्धक्षापि कर्मभि:

শিকারি বলল—হে দ্বিজশ্রেষ্ঠ! যখন বন্ধনসৃষ্টিকারী কর্মের ফলভোগ ক্ষয় হয়ে যায় এবং সৎকর্মের দ্বারা মানুষ শুদ্ধ হয়, তখন তার বন্ধন নিবৃত্ত হয়; এরপর সে তপস্যা ও যোগের আরম্ভ করে। অতএব বহু শুভ কর্মের ফলস্বরূপ সে উত্তম লোকসমূহের ভোগ লাভ করে।

Verse 39

तपोयोगसमारम्भं कुरुते द्विजसत्तम | कर्मभिर्बहुभिश्चापि लोकानश्नाति मानव:

শিকারি বলল—হে দ্বিজসত্তম! মানুষ বহু কর্মে প্রবৃত্ত হয়ে তবেই তপস্যা ও যোগের আরম্ভ করে; এবং সেই বহু কর্মের ফলেই সে উত্তম লোকসমূহের ভোগ লাভ করে।

Verse 40

स चेन्निवृत्तबन्धस्तु विशुद्धश्नापि कर्मभि: । प्राप्नोति सुकृताललोकान्‌ यत्र गत्वा न शोचति

যদি মানুষ সত্যই সংসারবন্ধন থেকে নিবৃত্ত হয়ে অন্তরে শুদ্ধ হয়, তবে কর্ম করতে করতেও সে পুণ্যের ফলে পুণ্যলোক লাভ করে; সেখানে গিয়ে আর শোক থাকে না।

Verse 41

पापं कुर्वन्‌ पापवृत्त: पापस्यान्तं न गच्छति । तस्मात्‌ पुण्यं यतेत्‌ कर्तु वर्जयीत च पापकम्‌

পাপ করতে করতে মানুষ পাপবৃত্তিতে অভ্যস্ত হয়ে যায়, আর তার পাপের শেষ হয় না। তাই মানুষের উচিত পুণ্যকর্মে যত্নবান হওয়া এবং পাপকে সম্পূর্ণ বর্জন করা।

Verse 42

अनसूयु: कृतज्ञश्न कल्याणानि च सेवते । सुखानि धर्ममर्थ च स्वर्ग च लभते नर:

যে মানুষ দোষদৃষ্টি-রহিত, কৃতজ্ঞ এবং কল্যাণকর কর্মে রত, সে সুখ লাভ করে, ধর্ম ও অর্থ পায় এবং শেষে স্বর্গও প্রাপ্ত হয়।

Verse 43

संस्कृतस्य च दान्तस्य नियतस्य यतात्मन: । प्राज्ञस्यानन्तरा वृत्तिरिह लोके परत्र च

যে ব্যক্তি সংস্কারসম্পন্ন, ইন্দ্রিয়দমী, নিয়মানুবর্তী, আত্মসংযমী ও প্রাজ্ঞ—তার সৎবৃত্তি এ লোকেও এবং পরলোকেও অবিচ্ছিন্ন থাকে।

Verse 44

जो संस्कारसम्पन्न, जितेन्द्रिय, शौचाचारपरायण और मनको काबूमें रखनेवाला है, उस बुद्धिमान पुरुषको इहलोक और परलोकमें भी सुखकी प्राप्ति होती है ।।

হে ব্রাহ্মণ! মানুষের উচিত সজ্জনদের ধর্ম অনুসারে চলা, শিষ্টজনের মতো আচরণ করা, এবং জগতের কোনো প্রাণীকে কষ্ট না দিয়ে জীবিকা নির্বাহ হয়—এমন উপার্জন কামনা করা।

Verse 45

सन्ति हाागमविज्ञाना: शिष्टा: शास्त्रे विचक्षणा: । स्वथधर्मेण क्रिया लोके कर्मण: सो5प्यसंकर:

জগতে বহু বেদজ্ঞ ও শাস্ত্রবিচক্ষণ শিষ্ট পুরুষ আছেন। তাঁদের উপদেশ অনুসারে স্বধর্ম পালন করে প্রত্যেক কর্ম করা উচিত; তাতে কর্মের সংকর ঘটে না।

Verse 46

प्राज्ञो धर्मेण रमते धर्म चैवोपजीवति । तस्माद्‌ धर्मादवाप्तेन धनेन द्विजसत्तम

প্রাজ্ঞ ব্যক্তি ধর্মে আনন্দ পায় এবং ধর্ম দ্বারাই জীবনধারণ করে। অতএব, হে দ্বিজশ্রেষ্ঠ, সেই ধর্ম থেকে প্রাপ্ত ধনেই জীবিকা নির্বাহ করা উচিত।

Verse 47

धर्मात्मा भवति होवं चित्त चास्य प्रसीदति

ব্যাধ বলল: “এইভাবে আচরণ করলে মানুষ ধর্মাত্মা হয়, আর তার চিত্তও প্রশান্ত ও প্রসন্ন হয়।”

Verse 48

शब्द स्पर्श तथा रूप॑ गन्धानिष्टांश्ष सत्तम

ব্যাধ বলল: “হে নরশ্রেষ্ঠ, শব্দ, স্পর্শ, রূপ এবং মনোহর গন্ধ—এগুলোই ইন্দ্রিয়ের বিষয় বলে কথিত।”

Verse 49

धर्मस्य च फलं लब्ध्वा न तृप्पति महाद्विज

হে মহাদ্বিজ, ধর্মের ফল লাভ করেও মানুষ তৃপ্ত হয় না।

Verse 50

प्रज्ञाचक्षुर्नर इह दोषं नैवानुरुध्यते

যার দৃষ্টি সত্য-বিবেক দ্বারা পরিচালিত, সে এই জগতে দোষ বা অধর্মের অনুসরণ করে না—না তাকে প্রশ্রয় দেয়, না তাকে ন্যায্য বলে মানে, না তাকে নিজের আচরণের অধিপতি হতে দেয়।

Verse 51

विरज्यति यथाकामं न च धर्म विमुज्चति । इस जगत्‌में ज्ञानदृष्टिसे सम्पन्न पुरुष राग-द्वेष आदि दोषोंका अनुसरण नहीं करता। उसे यशथेष्ट वैराग्य होता है तथा वह कभी धर्मका त्याग नहीं करता है ।।

ব্যাধ বলল—যে পুরুষ সত্য-জ্ঞানের দৃষ্টি লাভ করেছে, সে ইচ্ছামতো বৈরাগ্য ধারণ করে, তবু ধর্ম ত্যাগ করে না। জগতকে ক্ষয়শীল স্বভাবের জেনে সে সর্বত্যাগের জন্য সাধনা করে এবং রাগ-দ্বেষ প্রভৃতি দোষের অনুসরণ করে না।

Verse 52

एवं निर्वेदमादत्ते पापं कर्म जहाति च

এইভাবে সে নির্বেদ (বৈরাগ্য) গ্রহণ করে এবং পাপময় কর্ম পরিত্যাগ করে।

Verse 53

तपो नि:श्रेयसं जन्तोस्तस्य मूलं शमो दम:

ব্যাধ বলল—তপস্যা জীবের পরম মঙ্গলসাধন; আর সেই তপস্যার মূল হলো শম (মনোনিগ্রহ) ও দম (ইন্দ্রিয়সংযম)।

Verse 54

तेन सर्वानिवाप्रोति कामान्‌ यान्‌ मनसेच्छति । जीवके कल्याणका साधन है तप और उसका मूल है शम (मनोनिग्रह) तथा दम (इन्द्रियसंयम)। मनुष्य मनके द्वारा जिन-जिन अभीष्ट पदार्थोंकी पाना चाहता है उन सबको वह उस तपके द्वारा प्राप्त कर लेता है ।।

সেই তপস্যার দ্বারা মানুষ মন দিয়ে যে-যে অভীষ্ট বস্তু কামনা করে, তা সবই লাভ করে। ইন্দ্রিয়নিগ্রহ, সত্য এবং দম (আত্মসংযম) দ্বারা, হে দ্বিজশ্রেষ্ঠ, সে ব্রহ্মের সেই পরম পদ লাভ করে।

Verse 55

द्विजश्रेष्ठ! इन्द्रियसंयम, सत्यभाषण और मनोनिग्रह--इनके द्वारा मनुष्य ब्रह्मके परमपदको प्राप्त कर लेता है ।।

ব্রাহ্মণ বললেন—হে দ্বিজশ্রেষ্ঠ! উত্তম ব্রতপালক ব্যাধ, যেগুলিকে ইন্দ্রিয় বলা হয় সেগুলি কোন কোনটি? তাদের সংযম কীভাবে করতে হয়, আর সেই সংযমের ফল কী?

Verse 56

कथं च फलमाप्रोति तेषां धर्मभूतां वर । एतदिच्छामि तत्त्वेन धर्म ज्ञातुं निबोध मे

ব্রাহ্মণ বললেন—ধর্মাত্মাদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ ব্যাধ! ইন্দ্রিয়সংযমরূপ এই ধর্মের ফল সত্যভাবে কীভাবে লাভ হয়? আমি এর তত্ত্ব জানতে চাই; আমাকে বুঝিয়ে দাও।

Verse 73

नैनं प्रज्ञा सुनीतं वा त्रायते नैव पौरुषम्‌ । द्विजश्रेष्ठ! मूर्ख

তাকে না প্রজ্ঞা রক্ষা করে, না সুনীতি, না-ই বা পুরুষকার। হে দ্বিজশ্রেষ্ঠ! মূর্খ, শঠ ও চঞ্চলচিত্ত মানুষ মোহবশে সর্বদা দুঃখে সুখবুদ্ধি আর সুখে দুঃখবুদ্ধি করে; তখন বুদ্ধি, সুনীতি ও ব্যক্তিগত প্রচেষ্টাও তাকে রক্ষা করতে পারে না।

Verse 86

यदि स्यादपराधीनं पौरुषस्य क्रियाफलम्‌ | यदि पुरुषार्थजनित कर्मका फल पराधीन न होता तो जिसकी जो इच्छा होती, उसीको वह प्राप्त कर लेता

ব্যাধ বলল—যদি মানুষের প্রচেষ্টা ও কর্মের ফল পরাধীন না হতো, তবে যে যা চাইত, ঠিক তাই সহজেই পেত।

Verse 96

दृश्यन्ते निष्फला: सन्त: प्रहीणा: सर्वकर्मभि: । किंतु बड़े-बड़े संयमी, कार्यकुशल और बुद्धिमान्‌ मनुष्य भी अपना काम करते-करते थक जाते हैं तो भी वे इच्छानुसार फलकी प्राप्तिसे वंचित ही देखे जाते हैं

দেখা যায়, সৎলোকেরা সর্বপ্রকার কর্মে নিযুক্ত হয়ে ক্লান্ত হলেও অনেক সময় ফলহীনই থেকে যায়। এমনকি মহান সংযমী, কর্মদক্ষ ও প্রজ্ঞাবানরাও কাজ করতে করতে অবসন্ন হয়, তবু ইচ্ছিত ফল থেকে বঞ্চিত বলেই দেখা যায়।

Verse 106

वज्चनायां च लोकस्य स सुखी जीवते सदा । तथा दूसरा मनुष्य, जो निरन्तर जीवोंकी हिंसाके लिये उद्यत रहता है और सदा लोगोंको ठगनेमें ही लगा रहता है, वह सुखपूर्वक जीवन बिताता देखा जाता है

ব্যাধ বলল—যে ব্যক্তি জগতকে প্রতারণা করে জীবনধারণ করে, তাকে সর্বদাই সুখী বলে দেখা যায়। তেমনি আর এক শ্রেণির মানুষ, যে নিরন্তর প্রাণিহিংসায় উদ্যত এবং সদা লোককে ঠকাতে ব্যস্ত, সেও আরামে জীবন কাটায় বলে প্রতীয়মান হয়।

Verse 113

वश्चित्‌ कर्माणि कुर्वन्‌ हि न प्राप्पमधिगच्छति । कोई बिना उद्योग किये चुपचाप बैठा रहता है और लक्ष्मी उसकी सेवामें उपस्थित हो जाती है और कोई सदा काम करते रहनेपर भी अपने उचित वेतनसे भी वज्चित रह जाता है (ऐसा देखा जाता है)

ব্যাধ বলল—কেউ কর্ম করে চললেও যথোচিত ফল পায় না। দেখা যায়, কেউ কোনো উদ্যোগ না করেই নীরবে বসে থাকে, আর লক্ষ্মী তার সেবায় এসে দাঁড়ায়; আবার কেউ নিরন্তর পরিশ্রম করেও নিজের ন্যায্য পারিশ্রমিক থেকেও বঞ্চিত হয়।

Verse 123

दशमासधूता गर्भ जायन्ते कुलपांसना: । कितने ही दीन मनुष्य पुत्रकी कामना रखकर देवताओंको पूजते और कठिन तपस्या करते हैं

ব্যাধ বলল—দশ মাস গর্ভে ধারণ ও পালন করা সত্ত্বেও কত সন্তান জন্মায় যারা বংশের কলঙ্ক হয়ে ওঠে। বহু দীন মানুষ পুত্রকামনায় দেবতাদের পূজা করে ও কঠোর তপস্যা করে; তবু তাদের দ্বারা গর্ভে প্রতিষ্ঠিত এবং দশ মাস মাতৃগর্ভে লালিত যে পুত্র জন্মায়, সেও বংশধ্বংসকারী হয়ে দাঁড়ায়।

Verse 136

विपुलैरभिजायन्ते लब्धास्तैरेव मड़लै: । और दूसरे बहुत-से ऐसे भी हैं जो अपने पिताके द्वारा जोड़कर रखे हुए धन-धान्य तथा भोग-विलासके प्रचुर साधनोंके साथ पैदा होते हैं और उनकी प्राप्ति भी उन्हीं मांगलिक कृत्योंके अनुष्ठानसे होती है

ব্যাধ বলল—কিছু লোক জন্ম থেকেই বিপুল সমৃদ্ধিসহ জন্মায়—যে সমৃদ্ধি সেই একই মঙ্গলময় কর্মের দ্বারা পূর্বেই অর্জিত। তেমনি অনেকেই পিতার সঞ্চিত ও রক্ষিত ধন-ধান্য এবং ভোগবিলাসের প্রাচুর্য নিয়ে জন্মায়; আর এ-সব প্রাপ্তিও সেই একই পুণ্যময় মঙ্গলকর্মের অনुष্ঠান থেকেই ঘটে।

Verse 143

आधिकभिश्ैव बाध्यन्ते व्याधै: क्षुद्रमूगा इव । इसमें संदेह नहीं कि मनुष्योंके जो रोग होते हैं

ব্যাধ বলল—জীবেরা উদ্বেগ ও ব্যাধিতে আক্রান্ত হয়, যেমন ক্ষুদ্র হরিণ শিকারিদের দ্বারা উৎপীড়িত হয়। এতে সন্দেহ নেই—মানুষের যে রোগব্যাধি ঘটে, তা তাদেরই কর্মফল; এইভাবেই ব্যাধি ও মানসিক যন্ত্রণা নিরন্তর প্রাণীদের কষ্ট দেয়।

Verse 166

न शवनुवन्ति ते भोक्तुं पश्य धर्मभूतां वर । धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ कौशिक! देखो, जिनके यहाँ भोजनका भण्डार भरा पड़ा है, उन्हें प्राय: संग्रहणी सता रही है, वे उसका उपभोग नहीं कर पाते

ব্যাধ বলল—ধর্মবানদের শ্রেষ্ঠ, দেখো, তারা তা ভোগ করতে পারে না। কৌশিক, সদ্গুণীদের অগ্রগণ্য, দেখো—যাদের গৃহে অন্নের ভাণ্ডার পূর্ণ, তারাও প্রায়ই সংগ্রহিণী-রোগে পীড়িত হয়ে সঞ্চিত অন্ন ভক্ষণ করতে অক্ষম হয়।

Verse 173

दुःखेन चाधिगच्छन्ति भोजन द्विजसत्तम | विप्रवर! दूसरे बहुत-से ऐसे मनुष्य हैं

ব্যাধ বলল—হে দ্বিজশ্রেষ্ঠ, তারা কষ্টে কষ্টে আহার পায়। হে বিপ্রবর, আরও বহু মানুষ আছে—যাদের বাহুবল আছে, যারা সুস্থ এবং অন্ন হজমে সক্ষম; তবু তারা মহাকষ্টে অন্ন জোটায়। তারা সর্বদা ক্ষুধা ও জীবিকার সংগ্রামের দুঃখ ভোগ করে।

Verse 186

स्रोतसासकृदाक्षिप्तं द्वियमाणं बलीयसा । इस प्रकार यह संसार असहाय तथा मोह

যেমন নদীর স্রোতে একবার ধরা পড়া বস্তু প্রবল ধারায় বারবার টেনে নিয়ে গিয়ে উল্টেপাল্টে দেয়, তেমনই এই জগৎ অসহায় হয়ে মোহ ও শোকে নিমজ্জিত থাকে। কর্মের অতিপ্রবল প্রবাহে পতিত হয়ে সে বারবার আধি-ব্যাধির তরঙ্গে আঘাতপ্রাপ্ত হয় এবং অনিচ্ছায় এদিক-ওদিক ভেসে বেড়ায়।

Verse 208

इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमास्यापर्वमें पतिव्रतोपाख्यानके प्रसंगमें ब्राह्मणव्याधसंवादाविषयक दो सौ आठवाँ अध्याय पूरा हुआ

এইভাবে শ্রীমহাভারতের বনপর্বের অন্তর্গত মার্কণ্ডেয়সমাস্য পর্বে পতিব্রতা-উপাখ্যান প্রসঙ্গে ব্রাহ্মণ-ব্যাধ সংলাপবিষয়ক দুই শত আটতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।

Verse 209

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि ब्राह्मणव्याधसंवादे नवाधिकद्वधिशततमो< ध्याय:

এইভাবে শ্রীমহাভারতের বনপর্বের অন্তর্গত মার্কণ্ডেয়সমাস্য পর্বে ব্রাহ্মণ-ব্যাধ সংলাপবিষয়ক দুই শত নয়তম অধ্যায় সমাপ্ত হল।

Verse 373

परिक्रामति संसारे चक्रवद्‌ बहुवेदन: । इस प्रकार वह यद्यपि निरन्तर दुःख ही भोगता रहता है

এইভাবে সে নিরন্তর দুঃখই ভোগ করলেও নিজেকে দুঃখী মনে করে না; সেই দুঃখকেই ‘সুখ’ বলে নাম দেয়। যতক্ষণ বন্ধনকারী কর্মের ফলভোগ নিঃশেষ না হয় এবং নতুন নতুন কর্ম সঞ্চিত হতে থাকে, ততক্ষণ নানাবিধ ক্লেশ সহ্য করে সে চক্রের মতো এই সংসারে ঘুরে বেড়ায়।

Verse 466

तस्यैव सिज्चते मूलं गुणान्‌ पश्यति तत्र वै । द्विजश्रेष्ठ! बुद्धिमान्‌ पुरुष धर्मसे ही आनन्द मानता है

দ্বিজশ্রেষ্ঠ! বুদ্ধিমান পুরুষ ধর্মকেই আনন্দ বলে মানে, ধর্মের আশ্রয়ে জীবনধারণ করে, আর ধর্মে অর্জিত ধন দিয়ে ধনের মূলকে সিঞ্চন করে—অর্থাৎ ধর্মই পালন করে। সে ধর্মের মধ্যেই গুণাবলি দেখে।

Verse 473

स मित्रजनसंतुष्ट इह प्रेत्य च नन्दति । इस प्रकार वह धर्मात्मा होता है, उसका अन्तःकरण निर्मल हो जाता है तथा मित्रजनोंसे संतुष्ट होकर वह इहलोक और परलोकमें भी आनन्दित होता है

মিত্র ও সুহৃদদের নিয়ে সন্তুষ্ট যে ব্যক্তি, সে ইহলোকে এবং পরলোকে—উভয়ত্রই আনন্দিত হয়। এইভাবে ধর্মাত্মার অন্তঃকরণ শুদ্ধ হয় এবং সুসম্পর্ক ও সদাচারে সে দুই লোকেই কল্যাণ লাভ করে।

Verse 486

प्रभुत्वं लभते चापि धर्मस्यैतत्‌ फल विदु: । सज्जनशिरोमणे! धर्मात्मा पुरुष शब्द, स्पर्श, रूप और प्रिय गन्ध--सभी प्रकारके विषय तथा प्रभुत्व भी प्राप्त करता है। उसकी यह स्थिति धर्मका ही फल मानी गयी है

সজ্জনশিরোমণি! প্রভুত্বও ধর্মেরই ফল বলে জানা যায়। ধর্মাত্মা পুরুষ শব্দ, স্পর্শ, রূপ ও প্রিয় গন্ধ—সব ইন্দ্রিয়বিষয় এবং প্রভুত্বও লাভ করে; তার এই অবস্থাকে ধর্মফলই বলা হয়।

Verse 496

अतृष्यमाणो निर्वेदमापेदे ज्ञानचक्षुषा । द्विजोत्तम! कोई-कोई धर्मके फलरूपसे सांसारिक सुखको पाकर संतुष्ट नहीं होता। वह ज्ञानदृष्टिके कारण विषयभोगके सुखसे तृप्ति-लाभ न करके निर्वेद (वैराग्य)-को प्राप्त होता है

দ্বিজোত্তম! কেউ কেউ ধর্মফলরূপ সংসারসুখ লাভ করেও তৃপ্ত হয় না। জ্ঞানদৃষ্টির ফলে তারা বিষয়ভোগের সুখে পরিতৃপ্তি পায় না এবং তাই নির্বেদ (বৈরাগ্য) লাভ করে।

Verse 513

ततो मोक्षे प्रयतते नानुपायादुपायत: । सम्पूर्ण जगतको नश्वर समझकर वह सबको त्यागनेका प्रयत्न करता है। तत्पश्चात्‌ उचित उपायसे मोक्षके लिये सचेष्ट होता है। अनुपाय (प्रारब्ध आदि)-का अवलम्बन करके बैठ नहीं रहता

তখন সে মোক্ষের জন্য সাধনা করে—অসাধনকে আঁকড়ে নয়, যথার্থ উপায় অবলম্বন করে। সমগ্র জগৎকে অনিত্য জেনে সে সকল আসক্তি ত্যাগে প্রবৃত্ত হয়; পরে সঠিক সাধনায় মোক্ষলাভের জন্য সক্রিয়ভাবে চেষ্টা করে, ভাগ্য বা প্রারব্ধাদি ‘অ-উপায়’-এর ভরসায় নিষ্ক্রিয় হয়ে বসে থাকে না।

Verse 523

धार्मिकश्नापि भवति मोक्ष च लभते परम्‌ | इस प्रकार वह वैराग्यको अपनाता और पापकर्मको छोड़ता जाता है। फिर सर्वथा धर्मात्मा हो जाता और अन्तमें परम मोक्ष प्राप्त कर लेता है

এইভাবে সে বৈরাগ্য অবলম্বন করে ধীরে ধীরে পাপকর্ম ত্যাগ করে। তারপর সে সম্পূর্ণরূপে ধর্মাত্মা হয়ে ওঠে এবং শেষে পরম মোক্ষ লাভ করে।

Verse 1563

व्याधयो विनिवार्यन्ते मृगा व्याधैरिव द्विज । ब्रह्म! (उनका भोग पूरा होनेपर) ओषधियोंका संग्रह करनेवाले चिकित्साकुशल चतुर चिकित्सक उन रोगव्याधियोंका उसी प्रकार निवारण कर देते हैं

হে দ্বিজ, রোগব্যাধি তেমনি নিবৃত্ত হয় যেমন শিকারিরা হরিণ তাড়িয়ে দেয়। যখন ভোগের কাল পূর্ণ হয়, তখন ঔষধ সংগ্রহে পারদর্শী ও চিকিৎসাকলায় চতুর বৈদ্য সেই ব্যাধিগুলিকে ঠিক তেমনি দূর করে, যেমন শিকারি হরিণদের ছত্রভঙ্গ করে।

Verse 1936

नाप्रियं प्रतिपश्येयु्वशित्वं यदि वै भवेत्‌ यदि जीव अपने वशमें होते तो वे न मरते और न बूढ़े ही होते। सभी सब तरहकी मनचाही वस्तुओंको प्राप्त कर लेते। किसीको अप्रिय घटना नहीं देखनी पड़ती

যদি জীবেরা সত্যিই নিজেদের বশে থাকত, তবে তারা মরত না, বার্ধক্যও আসত না। তারা সর্বপ্রকারে ইচ্ছিত বস্তু লাভ করত, আর কাউকেই কোনো অপ্রিয় ঘটনা দেখতে হত না। অতএব মৃত্যু, জরা ও অনিষ্টের উপস্থিতিই প্রমাণ করে যে দেহধারী জীবন সম্পূর্ণ নিজের নিয়ন্ত্রণে নয়।

Frequently Asked Questions

The implied problem is how to preserve sacrificial order when disruptive agents appropriate offerings; the text answers by relocating responsibility to correct ritual establishment—proper fire, qualified performance, and mantra-governed restraint.

Tapas and disciplined knowledge (śruti/mantra) are portrayed as stabilizing forces: generative power must be regulated by correct form, and ethical order is inseparable from procedural integrity in sacred action.

No explicit phalaśruti is stated in these verses; the meta-message functions implicitly—understanding the genealogy and ritual mechanics reinforces confidence that properly grounded agni and mantra secure auspicious sacrificial results.

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