Mahabharata Adhyaya 174
Vana ParvaAdhyaya 17486 Versesअर्जुन के दिव्यास्त्र-बल से निर्णायक रूप से देवपक्ष के पक्ष में; हिरण्यपुर उजड़कर प्रतिपक्ष की शक्ति समाप्त।

Adhyaya 174

Kailāsa-darśana, Badarī-vāsa, and Sarasvatī–Dvaitavana Transition (कैलासदर्शन–बदरीवास–सरस्वतीद्वैतवनगमनम्)

Upa-parva: Tīrtha-yātrā and Himalayan Sojourn (Kailāsa–Badarī–Sarasvatī itinerary episode)

Vaiśaṃpāyana describes the Pāṇḍavas departing a pleasant mountain residence and regaining resolve upon seeing Kailāsa, depicted as a luminous, Kubera-associated peak marked by waterfalls, forests, caves, and varied terrain. After enduring difficult travel they reach an exemplary āśrama of King Vṛṣaparvan, receive formal hospitality, and recount their wanderings. They stay one night in the meritorious hermitage and proceed to expansive Badarī, residing near Nārāyaṇa’s locale and observing the Kubera-linked Nalini lake frequented by divine and perfected beings. The brothers then return by the same route, enjoy a month in Badarī within the Kirāta ruler Subāhu’s domain, traverse northern regions (including references to Cīna, Tukhāra, Darada, and Kuninda territories), and are welcomed by Subāhu with attendants and provisions. After another night they depart toward a Yāmuna-associated mountain, establish residence near Viśākhayūpa, and spend a year in a great forest rich in wildlife and hunting activity. An episode of peril is noted: Bhīma encounters a powerful, hunger-driven serpent in a mountain cave, and Yudhiṣṭhira is described as the one who frees him when he is constricted (imagery likened to a crocodile’s grasp). As the twelfth year of forest life approaches, they move from the Caitraratha-like forest region toward Marudhanva, then to Sarasvatī, ultimately choosing Dvaitavana as a residence; ascetics practicing austerity and riverbank flora are catalogued, and the Sarasvatī landscape is praised as enchanting and conducive to contented wandering.

Chapter Arc: अर्जुन अपने वृतान्त का सूत्र पकड़ता है—हिरण्यपुर का दिव्य वैभव, रत्न-वृक्षों और मधुर पक्षियों से गूँजता नगर, और उसके भीतर छिपी दानवी सत्ता का संकेत। → रत्नमय, चार-द्वारों वाला दुर्गम नगर (हिरण्यपुर) पौलोमों और कालकेयों से भरा है; अर्जुन को देवकार्य सिद्ध करने हेतु उस ‘अमर-वर्जित’ ख-पुर में प्रवेश कर दानव-समूहों और उनके मायावी, बहुरूपी प्राकट्यों का सामना करना पड़ता है। → अर्जुन के समक्ष रौद्र/पाशुपत-सम्बद्ध दिव्य अस्त्र-प्रभाव का उग्र दृश्य उभरता है—त्रिशिर, त्रिमुख, षड्भुज, दीप्त पुरुष-रूप और मांस-मेद-वसा-अस्थि से संयुक्त अनेक भयावह रूप; इसी उन्मत्त संग्राम में अर्जुन पौलोमों, कालकेयों और निवातकवच दानवों का संहार कर नगर की शक्ति-रीढ़ तोड़ देता है। → दानव-नगर शुष्क वन-सा उजड़ा, शोभाहीन और शोकाकुल हो जाता है; अर्जुन अपने कृतकार्य से हर्षित होकर मातलि के साथ रणभूमि से लौटता है और देवराज इन्द्र के भवन की ओर प्रस्थान करता है—देवकार्य पूर्ण। → इन्द्र द्वारा अर्जुन के अभिनन्दन और आगे के दिव्य संवाद/पुरस्कार की भूमिका बनती है।

Shlokas

Verse 1

अर रत (0) है ० त्रिसप्तत्यांधिकशततमोब< ध्याय: अर्जुनद्वारा हिरण्यपुरवासी पौलोम तथा कालकेयोंका वध और इन्द्रद्वारा अर्जुनका अभिनन्दन अजुन उवाच निवर्तमानेन मया महदू दृष्टं ततो5परम्‌ पुरं कामचरं दिव्यं पावकार्कसमप्रभम्‌

অর্জুন বললেন—রাজন! ফিরে আসতে আসতে আমি তার থেকেও অধিক আশ্চর্য এক দৃশ্য দেখলাম—এক বিশাল দিব্য নগর, যা ইচ্ছামতো চলতে পারে, এবং অগ্নি ও সূর্যের ন্যায় দীপ্তিমান। তার অধিবাসীদের ইচ্ছানুসারে সে যেথায়-সেথায় গমন করত।

Verse 2

रत्नद्रुममयैश्षित्रै: सुस्वरैश्व पतत्त्रिभि: पौलोमै: कालकज्जैश्न नित्यहृष्टे रधिष्ठितम्‌

সে নগর বিচিত্র রত্নময় বৃক্ষ ও মধুর স্বরে কূজনকারী পক্ষীতে শোভিত ছিল। সেখানে পৌলোম ও কালকঞ্জ নামে দানবেরা সদা আনন্দিত হয়ে বাস করত।

Verse 3

गोपुराट्टालकोपेतं चतुर्द्धारं दुरासदम्‌ सर्वरत्नमयं दिव्यमद्भुतोपमदर्शनम्‌

সে নগরে উচ্চ গোপুর ও সুন্দর অট্টালিকা শোভা পেত। চার দিকেই তার চারটি দ্বার ছিল, আর শত্রুর পক্ষে তাতে প্রবেশ করা ছিল অত্যন্ত দুরূহ। সর্বপ্রকার রত্নে নির্মিত সেই দিব্য নগর অদ্ভুত দীপ্তিতে উদ্ভাসিত—তার দর্শনই যেন এক বিস্ময়।

Verse 4

ट्रुमै: पुष्पफलोपेतै: सर्वरत्नमयैर्वृतम्‌ तथा पतनत्र्त्रिभिर्दिव्यैरुपेतं सुमनोहरै:

সে নগর চারদিকে এমন বৃক্ষে পরিবেষ্টিত ছিল, যেগুলি ফুল-ফলে ভরা এবং যেন সর্বপ্রকার রত্নে নির্মিত। তদুপরি, দিব্য ও অতিশয় মনোহর পক্ষীরাও তাকে শোভিত করেছিল।

Verse 5

असुरैर्नित्यमुदितै: शूलर्टिमुसलायुधै: चापमुद्गरहस्तैश्व स्रग्विभि: सर्वतो वृतम्‌

অর্জুন বললেন—সেই নগরী সর্বদিক থেকে সদা উল্লসিত অসুরদের দ্বারা পরিবেষ্টিত ছিল। তারা গলায় মালা ধারণ করে, হাতে শূল, ঋষ্টি, মুষল, ধনুক ও মুদ্গর প্রভৃতি অস্ত্রশস্ত্র নিয়ে সর্বক্ষণ নগরীর প্রহরা দিত।

Verse 6

तदहं प्रेक्ष्य दैत्यानां पुरमद्भुतदर्शनम्‌ अपृच्छे मातलिं राजन्‌ किमिदं वर्तते5द्भुतम्‌,राजन! दैत्योंके उस अद्भुत दिखायी देनेवाले नगरको देखकर मैंने मातलिसे पूछा --'सारथे! यह कौन-सा अद्भुत नगर है?”

হে রাজন, দৈত্যদের সেই আশ্চর্য নগরী দেখে আমি মাতলিকে জিজ্ঞাসা করলাম—“সারথি, এখানে কী এমন অদ্ভুত দৃশ্য প্রকাশ পাচ্ছে?”

Verse 7

मातलिरुवाच पुलोमा नाम दैतेयी कालका च महासुरी दिव्यं वर्षमहस्रं ते चेरतु: परमं तप:

মাতলি বললেন—“পার্থ! দৈত্যকুলের কন্যা পুলোमा এবং মহাশক্তিশালী অসুরী কালকা—এই দু’জনেই এক হাজার দিব্য বর্ষ ধরে পরম তপস্যা করেছিলেন।”

Verse 8

तपसोडन्‍्ते ततस्ताभ्यां स्वयम्भूरदद्‌ वरम्‌ अगृल्लीतां वरं ते तु सुतानामल्पदुःखताम्‌

অর্জুন বললেন—“তপস্যা সম্পূর্ণ হলে স্বয়ম্ভূ ব্রহ্মা তাঁদের দু’জনকে বর দিলেন। তাঁরা এই বরই গ্রহণ করলেন—তাঁদের পুত্রদের দুঃখ যেন অল্প হয়, অর্থাৎ তাদের কষ্ট দূর হয়।”

Verse 9

अवध्यतां च राजेन्द्र सुरराक्षसपन्नगै: पुरं सुरमणीयं च खचरं सुमहाप्रभम्‌

অর্জুন বললেন—“হে রাজেন্দ্র! তাঁরা আরও বর চাইলেন—তাঁদের পুত্ররা দেবতা, রাক্ষস ও নাগদের কাছেও অবধ্য হোক; আর তাঁদের জন্য এক অতিশয় মনোহর, মহাপ্রভায় দীপ্ত, আকাশচারী নগরী হোক।”

Verse 10

सर्वरत्नै: समुदितं दुर्धर्षममरैरपि महर्षियक्षगन्धर्वपन्नगासुरराक्षसै:

অর্জুন বললেন—রাজেন্দ্র! তারা প্রার্থনা করেছিল—সর্বপ্রকার রত্নে পরিপূর্ণ এমন এক নগর, যা দেবতাদের পক্ষেও দুর্ধর্ষ; আর মহর্ষি, যক্ষ, গন্ধর্ব, নাগ, অসুর ও রাক্ষস—কেউই যার ধ্বংস করতে না পারে। আরও তারা বলেছিল—“আমাদের পুত্ররা দেব, রাক্ষস ও নাগদের কাছেও অবধ্য হোক; তাদের বাসের জন্য এক মনোরম নগর চাই, যা মহাপ্রভাপুঞ্জে দীপ্ত, বিমানের ন্যায় আকাশে বিচরণশীল, সর্বধনরত্নে পূর্ণ, মনোবাঞ্ছিত সকল গুণে সমৃদ্ধ, শোকশূন্য ও রোগমুক্ত; এবং যাকে কোনো দেব, ঋষি, যক্ষ, গন্ধর্ব, নাগ, অসুর বা রাক্ষস বিনষ্ট করতে না পারে।” ভারতশ্রেষ্ঠ! ব্রহ্মা কালকেয়দের জন্য তেমনই নগর নির্মাণ করেছিলেন। এই সেই দিব্য আকাশচারী নগর, যা সর্বত্র বিচরণ করে; এতে দেবতাদের প্রবেশ নেই; বীরবর, এতে পৌলোম ও কালকাঞ্জ নামে দানবেরা বাস করে।

Verse 11

सर्वकामगुणोपेतं वीतशोकमनामयम्‌ ब्रह्मणा भरतश्रेष्ठ कालकेयकृते कृतम्‌

অর্জুন বললেন—হে ভারতশ্রেষ্ঠ! ব্রহ্মা কালকেয়দের জন্য এমন এক নগর নির্মাণ করেছিলেন, যা মনোবাঞ্ছিত সকল গুণে সমৃদ্ধ, শোকশূন্য এবং রোগস্পর্শহীন। তাদের প্রার্থনা পূরণ করতে নগরটি এমনভাবে গড়া—দেবতাদের পক্ষেও দুর্ধর্ষ, আর মহর্ষি, যক্ষ, গন্ধর্ব, নাগ, অসুর ও রাক্ষস—কেউই যার ধ্বংস করতে পারে না; তা মহাপ্রভাপুঞ্জে দীপ্ত, বিমানের ন্যায় আকাশে বিচরণশীল, এবং সর্ব রত্ননিধিতে পরিপূর্ণ। এই সেই দিব্য আকাশচারি নগর, যা সর্বত্র ঘুরে বেড়ায়; এতে দেবতাদের প্রবেশ নেই; এবং এতে পৌলোম ও কালকাঞ্জ নামে দানবেরা বাস করে।

Verse 12

तदेतत्‌ खपुरं दिव्यं चरत्यमरवर्जितम्‌ पौलोमाध्युषितं वीर कालकज्जैश्व दानवै:

অর্জুন বললেন—এটাই সেই দিব্য ‘আকাশ-নগর’, যা আকাশে বিচরণ করে এবং দেবতাদের জন্য নিষিদ্ধ। হে বীর! এতে পৌলোম ও কালকাঞ্জ নামে দানবেরা বাস করে।

Verse 13

हिरण्यपुरमित्येवं ख्यायते नगरं महत्‌ रक्षितं कालकेयैश्न पौलोमैश्न महासुरै:,यह विशाल नगर हिरण्यपुरके नामसे विख्यात है। कालकेय तथा पौलोम नामक महान्‌ असुर इसकी रक्षा करते हैं

এই মহান নগর ‘হিরণ্যপুর’ নামে প্রসিদ্ধ। কালকেয় ও পৌলোম নামে মহাশক্তিধর অসুরেরা এর রক্ষা করে।

Verse 14

त एते मुदिता राजन्नवध्या: सर्वदैवतै: निवसन्त्यत्र राजेन्द्र गतोद्वेगा निरुत्सुका:

অর্জুন বললেন—হে রাজন! এই দানবেরাই এখানে আনন্দে বাস করে। তারা সকল দেবতার কাছেই অবধ্য; আর, রাজেন্দ্র, তারা এখানে উদ্বেগহীন ও উৎকণ্ঠাহীন হয়ে থাকে।

Verse 15

मानुषान्मृत्युरेतेषां निर्दिष्टो ब्रह्मणा पुरा एतानपि रणे पार्थ कालकज्जान्‌ दुरासदान्‌ वज्ास्त्रेण नयस्वाशु विनाशं सुमहाबलान्‌

অর্জুন বললেন—পূর্বকালে ব্রহ্মা স্থির করেছিলেন যে এদের মৃত্যু মানুষের হাতেই হবে। অতএব হে পার্থ, এই দুর্ধর্ষ ও মহাবলী কালকঞ্জ যোদ্ধাদেরও যুদ্ধে বজ্রাস্ত্র দ্বারা শীঘ্র বিনাশে পৌঁছে দাও—এতেই বিধির সিদ্ধি।

Verse 16

अजुन उवाच सुरासुरैरवध्यं तदहं ज्ञात्वा विशाम्पते अब्र॒ुवं मातलिं हृष्टो याहेतत्‌ पुरमज्जसा

অর্জুন বললেন—হে রাজন, হিরণ্যপুর দেবতা ও অসুর—উভয়ের কাছেই অবধ্য জেনে আমি আনন্দিত হয়ে মাতলিকে বললাম—“তুমি অবিলম্বে রথ চালিয়ে এই নগরে প্রবেশ করো।”

Verse 17

त्रिदशेशद्विषो यावत्‌ क्षयमस्त्रैर्नयाम्यहम्‌ न कथज्वचिद्धि मे पापा न वध्या ये सुरद्विष:

অর্জুন বললেন—আমি আমার অস্ত্র দ্বারা দেবরাজের শত্রুদের ধ্বংসে পৌঁছে দেব। যারা দেবতাদের প্রতি বিদ্বেষ পোষে, সেই পাপীদের আমি কোনোভাবেই অদণ্ডিত রেখে দিতে পারি না; তাদের বধ না করে আমি ছাড়ব না।

Verse 18

उवाह मां ततः शीघ्र हिरण्यपुरमन्तिकात्‌ रथेन तेन दिव्येन हरियुक्तेन मातलि:,मेरे ऐसा कहनेपर मातलिने घोड़ोंसे युक्त उस दिव्य रथके द्वारा मुझे शीघ्र ही हिरण्यपुरके निकट पहुँचा दिया

আমার কথা শুনে মাতলি অশ্বযুক্ত সেই দিব্য রথে আমাকে দ্রুত হিরণ্যপুরের নিকটে পৌঁছে দিলেন।

Verse 19

ते मामालक्ष्य दैतेया विचित्रा भरणाम्बरा: समुत्पेतुर्महावेगा रथानास्थाय दंशिता:,मुझे देखते ही विचित्र वस्त्राभूषणोंसे विभूषित वे दैत्य कवच पहनकर अपने रथोंपर जा बैठे और बड़े वेगसे मेरे ऊपर टूट पड़े

আমাকে দেখামাত্র বিচিত্র বস্ত্র-অলংকারে ভূষিত সেই দৈত্যরা বর্ম ধারণ করে রথে আরোহণ করল এবং মহাবেগে আমার ওপর ঝাঁপিয়ে পড়ল।

Verse 20

ततो नालीकनाराचैर्भल्लै: शक्त्यृष्टितोमरै: प्रत्यघ्नन्‌ दानवेन्द्रा मां क्रुद्धास्तीव्रपराक्रमा:

তখন ক্রোধে দগ্ধ, প্রবল পরাক্রমশালী দানবশ্রেষ্ঠেরা নালীক, নারাচ, ভল্ল এবং শক্তি, ঋষ্টি ও তোমর প্রভৃতি অস্ত্রশস্ত্রে চারিদিক থেকে আমাকে আঘাত করতে লাগল।

Verse 21

तदहं शरवर्षेण महता प्रत्यवारयम्‌ शस्त्रवर्ष महद्‌ राजन्‌ विद्याबलमुपाश्रित:

হে রাজন! তখন আমি বিদ্যা-বলের আশ্রয় নিয়ে মহা বাণবৃষ্টির দ্বারা তাদের অস্ত্রশস্ত্রের প্রবল বর্ষণ প্রতিহত করলাম।

Verse 22

व्यामोहयं च तान्‌ सर्वान्‌ रथमार्गैश्चरन्‌ रणे तेडन्योन्यमभिसम्मूढा: पातयन्ति सम दानवान्‌

হে রাজন! রণক্ষেত্রে রথের পথ নানাভাবে বদলে বদলে চলতে চলতে আমি তাদের সকলকে মোহগ্রস্ত করলাম; তারা কর্তব্যবিমূঢ় হয়ে পরস্পরকে আঘাত করতে লাগল, আর দানবেরা দানবদেরই ফেলে দিল।

Verse 23

तेषामेवं विमूढानामन्योन्यमभिधावताम्‌ शिरांसि विशियेर्दीप्तैन्यहनं शतसड्घश:

তারা এভাবে বিমূঢ় হয়ে পরস্পরের দিকে ধেয়ে এলে আমি দীপ্ত শরে তাদের মস্তক বারবার—শতশত করে, দলে দলে—কেটে ফেলতে লাগলাম।

Verse 24

इस प्रकार मूढ़चित्त हो आपसमें ही एक-दूसरेपर धावा करनेवाले उन दानवोंके सौ-सौ मस्तकोंको मैं अपने प्रज्वलित बाणोंद्वारा काट-काटकर गिराने लगा ।।

এভাবে নিহত হতে দেখে সেই দৈত্যেরা আবার নিজেদের নগরে আশ্রয় নিল এবং দানবী মায়ার অবলম্বনে নগরসহ আকাশে উড়ে উঠল।

Verse 25

ततो<हं शरवर्षेण महता कुरुनन्दन मार्गमावृत्य दैत्यानां गतिं चैषामवारयम्‌,कुरुनन्दन! तब मैं बाणोंकी भारी बौछार करके दैत्योंका मार्ग रोक लिया और उनकी गति कुण्ठित कर दी

তখন, হে কুরুনন্দন! আমি প্রবল শরবৃষ্টিতে পথ আচ্ছাদিত করে দৈত্যদের গতি রুদ্ধ করলাম, তাদের অগ্রগতি স্তব্ধ করে দিলাম।

Verse 26

तत्‌ पुरं खचरं दिव्यं कामगं सूर्यसप्रभम्‌ दैतेयैर्वरदानेन धार्यते सम यथासुखम्‌

অর্জুন বললেন—সূর্যের ন্যায় দীপ্তিমান সেই দিব্য, আকাশচারী নগর ইচ্ছামতো যত্রতত্র গমন করত; আর বরদানের প্রভাবে দৈত্যেরা তাকে স্বচ্ছন্দে আকাশে ধারণ করত।

Verse 27

अन्तर्भूमौ निपतति पुनरूर्ध्व॑ प्रतिष्ठते पुनस्तिर्यक्‌ प्रयात्याशु पुनरप्सु निमज्जति

অর্জুন বললেন—সেই দিব্য পুর কখনও ভূমির অন্তরে নিমজ্জিত হত, আবার কখনও ঊর্ধ্বে উঠে স্থিত হত; কখনও তির্যক দিশায় দ্রুত ধাবিত হত, আবার কখনও অচিরেই জলে ডুবে যেত।

Verse 28

अमरावतिसंकाशं तत्‌ पुरं कामगं महत्‌ अहमस्त्रैरबहुविधै: प्रत्यगृह्लं परंतप

অর্জুন বললেন—হে পরন্তপ! ইচ্ছামতো বিচরণশীল সেই মহান নগর অমরাবতীর ন্যায় দীপ্ত ছিল; কিন্তু আমি নানাবিধ অস্ত্র প্রয়োগ করে তাকে চারদিক থেকে ঘিরে রুদ্ধ করলাম।

Verse 29

ततो<हं शरजालेन दिव्यास्त्रनुदितेन च व्यगृह्नं सह दैतेयैस्तत्‌ पुरं पुरुषर्षभ

হে পুরুষর্ষভ! তখন দিব্যাস্ত্রে অভিমন্ত্রিত শরের জাল বিস্তার করে আমি দৈত্যদেরসহ সেই নগরকে চারদিক থেকে আবদ্ধ করলাম এবং তাকে বিদীর্ণ-ক্ষতবিক্ষত করতে লাগলাম।

Verse 30

विक्षतं चायसैर्बाणर्म-्प्रयुक्तैरजिद्वागै: महीमभ्यपतदू राजन्‌ प्रभग्नं पुरमासुरम्‌

Arjuna said: “O King, the iron arrows I discharged—swift and unerring in their course—struck the target and tore it apart. Thus the Asura-city, shattered and ruined, fell down upon the earth.”

Verse 31

ते वध्यमाना मद्वाणैर्वज़वेगैरयस्मयै: पर्यभ्रमन्त वै राजन्नसुरा: कालचोदिता:,महाराज! लोहेके बने हुए मेरे बाणोंका वेग वज्ञ़के समान था। उनकी मार खाकर वे कालप्रेरित असुर चारों ओर चक्कर काटने लगते थे

Arjuna said: “O King, struck down by my iron arrows—swift as Indra’s thunderbolt—the Asuras, driven onward by Time itself, reeled and whirled about on every side.”

Verse 32

ततो मातलिरारुह्म[ पुरस्तान्निपतन्निव महीमवातरत क्षिप्रं रथेनादित्यवर्चसा,तदनन्तर मातलि आकाशमें ऊँचे चढ़कर सूर्यके समान तेजस्वी रथद्वारा उन राक्षसोंके सामने गिरते हुए-से शीघ्र ही पृथ्वीपर उतरे

Then Mātali, mounting up into the sky, descended swiftly to the earth in his sun-bright chariot, as though falling straight down before the foes. The scene underscores disciplined, purposeful action: divine power is employed not for display, but to meet danger directly and protect the righteous cause.

Verse 33

ततो रथसहस्राणि षष्टिस्तेषाममर्षिणाम्‌ युयुत्सूनां मया सार्थ पर्यवर्तन्त भारत तान्यहं निशितैर्बाणिव्यधरमं गार्ध्रराजितै:

Then, O Bhārata, sixty thousand chariots of those wrath-filled beings, eager to fight, wheeled about and formed up against me. Seeing this, O delight of the Bharatas, I began to wound them all with sharp arrows, splendidly adorned with vulture-feathers—meeting their aggression with disciplined force in battle.

Verse 34

ते युद्धे सन्‍न्‍यवर्तन्त समुद्रस्थ यथोर्मय: नेमे शक्‍या मानुषेण युद्धेनेति प्रचिन्त्य तत्‌

Arjuna said: “In the midst of battle they turned back, like waves that rise within the ocean and then subside. Reflecting on that, it became clear: ‘These cannot be overcome by a merely human mode of fighting.’”

Verse 35

ततस्तानि सहस्राणि रथिनां चित्रयोधिनाम्‌

তখন বিচিত্র ও উজ্জ্বল পরাক্রমসম্পন্ন রথযোদ্ধাদের সেই সহস্র সহস্র দল দৃষ্টিগোচর হল।

Verse 36

अस्त्राणि मम दिव्यानि प्रत्यघध्नन्‌ शनकैरिव परंतु विचित्र युद्ध करनेवाले वे सहस्रों रथारूढ़ दानव धीरे-धीरे मेरे दिव्यास्त्रोंका भी निवारण करने लगे ।। रथमार्गान्‌ विचित्रांस्ते विचरन्तो महाबला:

অর্জুন বললেন—“আমার দিব্য অস্ত্রগুলি যেন ধীরে ধীরে প্রতিহত হতে লাগল। অথচ বিচিত্র রীতিতে যুদ্ধকুশল সেই সহস্র সহস্র রথারূঢ় দানব ক্রমে ক্রমে আমার দিব্য ক্ষেপণাস্ত্রও রোধ করতে শুরু করল। মহাবলীরা জটিল রথপথ ও কৌশলে বিচরণ করে রণে বারবার দিক বদলাতে লাগল।”

Verse 37

विचित्रमुकुटापीडा विचित्रकवचध्वजा:

অর্জুন বললেন—“তাদের মাথায় আশ্চর্য মুকুট ও কিরীট; আর তাদের বর্ম ও ধ্বজও নানা বর্ণে বিচিত্র।”

Verse 38

अहं तु शरवर्षैस्तानस्त्रप्रचुदितै रणे

অর্জুন বললেন—“কিন্তু আমি রণে আমার অস্ত্রপ্রেরিত তীরবৃষ্টিতে তাদের আঘাত করব।”

Verse 39

तैः पीड्यमानो बहुभि: कृतास्त्रै: कुशलैर्युधि

অর্জুন বললেন—“যুদ্ধে কুশলী ও প্রস্তুত অস্ত্রে সজ্জিত বহুজনের দ্বারা পীড়িত হয়ে আমি রণে প্রবলভাবে নিপীড়িত হচ্ছিলাম।”

Verse 40

ततो&हं देवदेवाय रुद्राय प्रयतो रणे

তখন যুদ্ধক্ষেত্রের মাঝখানে আমি সংযত ও একাগ্র হয়ে দেবাদিদেব রুদ্রের প্রতি ভক্তিভরে নিবেদন করলাম—ধর্মযুদ্ধের কঠিন কর্তব্যে তাঁর অনুগ্রহ ও পথনির্দেশ প্রার্থনা করে।

Verse 41

(प्रयत: प्रणतो भूत्वा नमस्कृत्य महात्मने ।) स्वस्ति भूतेभ्य इत्युक्त्वा महास्त्रं समचोदयम्‌ तब मैंने एकाग्रचित्त हो मस्तक झुकाकर देवाधिदेव महात्मा रुद्रको प्रणाम किया और “समस्त भूतोंका कल्याण हो” ऐसा कहकर उनके महान्‌ पाशुपतास्त्रका प्रयोग किया ।।

তারপর আমি সংযত হয়ে, প্রণত হয়ে মহাত্মা প্রভুকে নমস্কার করে বললাম—“সমস্ত জীবের মঙ্গল হোক”; এই বলে সেই মহাস্ত্র প্রয়োগ করলাম।

Verse 42

(महत्‌ पाशुपतं दिव्यं सर्वतोकनमस्कृतम्‌ ।) ततो<पश्यं त्रिशिरसं पुरुषं नवलोचनम्‌ त्रिमुखं षपड्भुजं दीप्तमर्कज्वलनमूर्थजम्‌

সে মহান্‌ দিব্য পাশুপতাস্ত্র সর্বলোকের বন্দিত। তা প্রয়োগ করতেই আমি এক আশ্চর্য দিব্য পুরুষকে দেখলাম—ত্রিশির, ত্রিমুখ, নয়নবৎ (নয় চক্ষু), ষড়্ভুজ; দীপ্তিময়, যার কেশ সূর্যের ন্যায় জ্বলছিল।

Verse 43

लेलिहानैर्महानागै: कृतचीरममित्रहन्‌ (भक्तानुकम्पिनं देवं नागयज्ञोपवीतिनम्‌ ।) विभीस्ततस्तदस्त्र॑ तु घोरं रौद्रं सनातनम्‌

হে শত্রুঘ্ন! লেলিহান জিহ্বাযুক্ত মহানাগেরা সেই দিব্য দেবের বস্ত্ররূপে ছিল; আর ভক্তানুকম্পী সেই দেব নাগকেই যজ্ঞোপবীতরূপে ধারণ করেছিলেন। তারপর আমি সেই ভয়ংকর, রৌদ্র, সনাতন অস্ত্র প্রস্তুত করলাম।

Verse 44

दृष्टवा गाण्डीवसंयोगमानीय भरतर्षभ नमस्कृत्वा त्रिनेत्राय शर्वायामिततेजसे

হে ভরতশ্রেষ্ঠ! গাণ্ডীবকে সংযোজিত ও প্রস্তুত দেখে আমি অমিত তেজস্বী ত্রিনেত্রধারী শর্বকে নমস্কার করলাম।

Verse 45

मुक्तवान्‌ दानवेन्द्राणां पपाभावाय भारत मुक्तमात्रे ततस्तस्मिन्‌ रूपाण्यासन्‌ सहस्रश:

অর্জুন বললেন—হে ভারত! দানবাধিপতিদের দুষ্কর্ম বিনাশের জন্য আমি সেই অস্ত্র নিক্ষেপ করেছিলাম। অস্ত্রটি মুক্ত হতেই মুহূর্তে তা সহস্র সহস্র রূপে প্রকাশ পেল।

Verse 46

मृगाणामथ सिंहानां व्याप्राणां च विशाम्पते ऋक्षाणां महिषाणां च पन्नगानां तथा गवाम्‌

অর্জুন বললেন—হে প্রজাপতি! (আমি দেখলাম) হরিণ, সিংহ ও ব্যাঘ্র; ভালুক ও মহিষও; তদ্রূপ সর্প এবং গবাদি পশু।

Verse 47

शरभाणां गजानां च वानराणां च सड्घश: ऋषभाणां वराहाणां मार्जाराणां तथैव च

অর্জুন বললেন—দলে দলে শরভ, গজ এবং বানরদের বাহিনী ছিল; তদ্রূপ ষাঁড়, বরাহ এবং বিড়ালও ছিল।

Verse 48

शालावृकाण्णा प्रेतानां भुरुण्डानां च सर्वशः गृध्राणां गरुडानां च चमराणां तथैव च

অর্জুন বললেন—সর্বত্র শেয়াল, প্রেতদের দল এবং ভুরুণ্ড দেখা যাচ্ছিল; তদ্রূপ শকুন, গরুড় এবং চমরও ছিল।

Verse 49

देवानां च ऋषीणां च गन्धर्वाणां च सर्वशः पिशाचानां सयक्षाणां तथैव च सुरद्धिषाम्‌

অর্জুন বললেন—দেবতা, ঋষি এবং গন্ধর্বদেরও নানাবিধ রূপ ছিল; পিশাচরা যক্ষদের সঙ্গে ছিল, এবং তদ্রূপ দেবগণের অধিপতিরাও (দেখা গেল)।

Verse 50

गुहाकानां च संग्रामे नै#तानं तथैव च झषाणां गजवकक्‍त्राणामुलूकानां तथैव च

অর্জুন বললেন—“যুদ্ধে আমি গুহ্যকদেরও দেখলাম, এবং এদেরও; মাছদের, গজমুখদের, এবং পেঁচাদেরও।”

Verse 51

मीनवाजिसरूपाणां नानाशस्त्रासिपाणिनाम्‌ तथैव यातुधानानां गदामुद्गरधारिणाम्‌

অর্জুন বললেন—“আমি মাছ ও অশ্বরূপধারী সত্তাদের দেখলাম—যাদের হাতে নানা অস্ত্র ও খড়্গ ছিল; আর তেমনি রাক্ষসস্বভাব যাতুধানদেরও, যারা গদা ও মুদ্গর ধারণ করেছিল।”

Verse 52

महाराज! मृग, सिंह, व्याप्र, रीछ, भैंस, नाग, गौ, शरभ, हाथी, वानर, बैल, सूअर, बिलाव, भेड़िये, प्रेत, मुरुण्ड, गिद्ध, गरुड, चमरी गाय, देवता, ऋषि, गन्धर्व, पिशाच, यक्ष, देवद्रोही राक्षस, गुह्मक, निशाचर, मत्स्य, गजमुख, उल्लू, मीन तथा अभश्व-जैसे रूपवाले नाना प्रकारके जीवोंका प्रादुर्भाव हुआ। उन सबके हाथमें भाँति-भाँतिके अस्त्र-शस्त्र एवं खड्ग थे। इसी प्रकार गदा और मुद्गर धारण किये बहुत-से यातुधान भी प्रकट हुए ।। ४६ “५३९ || एतैश्वान्यैश्व बहुभि्नानारूपधरैस्तथा सर्वमासीज्जगद्‌ व्याप्तं तस्मिन्नस्त्रे विसर्जिते,इन सबके साथ दूसरे भी बहुत-से जीवोंका प्राकट्य हुआ, जिन्होंने नाना प्रकारके रूप धारण कर रखे थे। उन सबके द्वारा यह सारा जगत्‌ व्याप्त-सा हो गया था। पाशुपतास्त्रका प्रयोग होते ही कोई तीन मस्तक, कोई चार दाढ़ें, कोई चार मुख और कोई चार भुजावाले अनेक रूपधारी प्राणी प्रकट हुए, जो मांस, मेदा, वसा और हलड्ियोंसे संयुक्त थे

অর্জুন বললেন—“মহারাজ! সেই অস্ত্র নিক্ষিপ্ত হতেই অসংখ্য নানাবিধ সত্তা প্রকাশ পেল—হরিণ, সিংহ, ব্যাঘ্র, ভালুক, মহিষ, নাগ, গাভী, শরভ, হাতি, বানর, ষাঁড়, বরাহ, বিড়াল, নেকড়ে, প্রেত, মুরুণ্ড, শকুন, গরুড়, চামরী-গাভী, দেবতা, ঋষি, গন্ধর্ব, পিশাচ, যক্ষ, দেবদ্রোহী রাক্ষস, গুহ্যক, নিশাচর, মাছ, গজমুখ, পেঁচা, আবার মাছ, এবং অশ্বসদৃশ রূপধারীরাও। তাদের সকলের হাতে ছিল নানা প্রকার অস্ত্রশস্ত্র ও খড়্গ; আর গদা ও মুদ্গর ধারণকারী বহু যাতুধানও প্রকাশ পেল। এদের সঙ্গে আরও বহু রূপান্তরধারীর আবির্ভাবে, সেই অস্ত্র ছুটতেই সমগ্র জগৎ যেন আচ্ছন্ন ও ব্যাপ্ত হয়ে উঠল।”

Verse 53

त्रिशिरोभिश्नतुर्दष्टै क्षतुरास्यै श्चतुर्भुजै: अनेकरूपसंयुक्तैर्मांसमेदोवसास्थिभि:

অর্জুন বললেন—“পাশুপত অস্ত্র চালু হতেই ভয়ংকর ও বিচিত্র রূপের অসংখ্য সত্তা প্রকাশ পেল—কারও তিন মাথা, কারও চার দংশন, কারও চার মুখ, কারও চার বাহু; তাদের দেহ ছিল মাংস, মেদ, বসা ও অস্থিতে গঠিত। তাদের আবির্ভাবে সমগ্র জগৎ যেন ব্যাপ্ত ও অভিভূত হয়ে উঠল।”

Verse 54

अभीक्षणं वध्यमानास्ते दानवा नाशमागता: अर्कज्वलनतेजोभिव॑ज्राशनिसमप्रभै:

অর্জুন বললেন—“বারবার আঘাতে সেই দানবরা বিনাশপ্রাপ্ত হল। সূর্য ও অগ্নির ন্যায় দগ্ধ তেজে দীপ্ত, এবং বজ্র ও বিদ্যুতের ন্যায় ঝলমলে লৌহবাণে আমি দ্রুত শত্রুসংঘকে সংহার করলাম।”

Verse 55

अद्रिसारमयैश्चान्यैर्बाणैरपि निबर्हणै: न्यहनं दानवानू्‌ सर्वान्‌ मुहूर्तेनेव भारत

অর্জুন বললেন—পর্বতসারসম কঠিন ও আঘাতে চূর্ণকারী অন্যান্য বাণ দিয়েও, হে ভারত, আমি এক মুহূর্তেই সেই সকল দানবকে নিপাত করেছিলাম। আর সূর্য ও অগ্নির ন্যায় দীপ্ত, বজ্র ও বিদ্যুতের ন্যায় ঝলমলে শত্রুনাশক লৌহবাণে অল্প সময়ের মধ্যেই দানবদের সম্পূর্ণ সংহার সাধন করলাম।

Verse 56

गाण्डीवास्त्रप्रणुन्नांस्तान्‌ गतासून्‌ नभसक्ष्युतान्‌ दृष्टवाहं प्राणमं भूयस्त्रिपुरघ्नाय वेधसे

অর্জুন বললেন—গাণ্ডীব থেকে নিক্ষিপ্ত অস্ত্রে বিদ্ধ হয়ে সেই সকল দানব প্রাণহীন হয়ে আকাশ থেকে ভূমিতে পতিত হল—এ দৃশ্য দেখে আমি আবার ত্রিপুরঘ্ন, স্রষ্টা শঙ্করকে প্রণাম করলাম।

Verse 57

तथा रौद्रास्त्रनिष्पिष्टान्‌ दिव्याभरणभूषितान्‌ निशम्य परमं हर्षमगमद्‌ देवसारथि:,दिव्य आभूषणोंसे विभूषित दानव पाशुपतास्त्रसे पिस गये हैं, यह देखकर देवसारथि मातलिको बड़ा हर्ष हुआ

দিব্য অলংকারে ভূষিত সেই দানবযোদ্ধারা রৌদ্রাস্ত্রে চূর্ণ হয়েছে—এ কথা শুনে দেবসারথি মাতলি পরম আনন্দে পূর্ণ হলেন।

Verse 58

तदसहां कृतं कर्म देवैरपि दुरासदम्‌ दृष्टवा मां पूजयामास मातलि: शक्रसारथि:,जो कार्य देवताओंके लिये भी दुष्कर और असहा था, वह मेरेद्वारा पूरा हुआ देख इन्द्रसारथि मातलिने मेरा बड़ा सम्मान किया

যে কর্ম দেবতাদের পক্ষেও দুষ্কর ও অসহ্য ছিল, তা আমার দ্বারা সম্পন্ন হয়েছে দেখে শক্রের সারথি মাতলি আমাকে মহাসম্মানে ভূষিত করলেন।

Verse 59

उवाच वचन चेदं प्रीयमाण: कृताञ्जलि: सुरासुरैरसहां हि कर्म यत्‌ साधितं त्वया,और अत्यन्त प्रसन्न हो हाथ जोड़कर कहा--'अर्जुन! आज तुमने वह कार्य कर दिखाया है जो देवताओं और असुरोंके लिये भी असाध्य था

অত্যন্ত প্রীত হয়ে, করজোড়ে তিনি এই মধুর বাক্য বললেন—“অর্জুন! আজ তুমি এমন এক কর্ম সাধন করেছ, যা দেবতা ও অসুর—উভয়ের পক্ষেই অসহ্য ছিল।”

Verse 60

न होतत्‌ संयुगे कर्तुमपि शक्तः सुरेश्वर: (ध्रुवं धनंजय प्रीतस्त्वयि शक्र: पुरार्दन ।) सुरासुरैरवध्यं हि पुरमेतत्‌ खगं महत्‌

সমরে তা সাধন করতে দেবেশ্বরও সক্ষম নন। নিশ্চয়ই, হে ধনঞ্জয়, হে পুরার্দন, শক্র তোমার প্রতি প্রসন্ন; কারণ এই মহৎ উড়ন্ত পুরী দেব ও অসুর—উভয়ের কাছেই অবধ্য।

Verse 61

विध्वस्ते खपुरे तस्मिन्‌ दानवेषु हतेषु च

যখন সেই আকাশচারী নগর বিধ্বস্ত হল এবং দানবেরা নিহত হল, তখন সেখানকার সকল নারী বিলাপ করতে করতে নগরের বাইরে বেরিয়ে এল। তাদের কেশ এলোমেলো; শোক ও যন্ত্রণায় বিহ্বল হয়ে তারা কুররী পাখির মতো করুণ আর্তনাদ করল।

Verse 62

विनदन्त्यः स्त्रिय: सर्वा निष्पेतुर्नगराद्‌ बहि: प्रकीर्णकेश्यो व्यथिता: कुरर्य इव दुखिता:

সকল নারী উচ্চস্বরে বিলাপ করতে করতে নগরের বাইরে ছুটে এল। তাদের কেশ ছড়ানো; ব্যথায় কাতর হয়ে তারা কুররী পাখির মতো দুঃখে করুণ আর্তনাদ করল।

Verse 63

पेतुः पुत्रान्‌ पितृन्‌ भ्रातूनू शोचमाना महीतले रुदत्यो दीनकण्ठ्यस्तु निनदन्त्यो हतेश्वरा:

পুত্র, পিতা ও ভ্রাতাদের জন্য শোক করতে করতে তারা ভূমিতে লুটিয়ে পড়ল। স্বামীহারা হয়ে কণ্ঠ রুদ্ধ করে কাঁদতে কাঁদতে তারা উচ্চস্বরে বিলাপ করল।

Verse 64

उरांसि परिनिध्नन्त्यो विस्नस्तस्रग्विभूषणा: अपने पुत्र, पिता और भाइयोंके लिये शोक करती हुई वे सब-की-सब पृथ्वीपर गिर पड़ीं। जिनके पति मारे गये थे, वे अनाथ अबलाएँ दीनतापूर्ण कष्टसे रोती-चिल्लाती हुई छाती पीट रही थीं। उनके हार और आभूषण इधर-उधर गिर पड़े थे ।।

তারা বক্ষ পিটাতে লাগল; তাদের মালা ও অলংকার এলোমেলো হয়ে ঝরে পড়ল। সেই দানব-নগর শোকে আচ্ছন্ন হয়ে সমস্ত শ্রী হারাল; দুঃখ ও দৈন্যে বিধ্বস্ত হয়ে তা শুকনো বৃক্ষভরা অরণ্যের মতোই দৃষ্টিকটু হয়ে উঠল।

Verse 65

न बभौ दानवपुरं हतत्विट्कं हतेश्वरम्‌ गन्धर्वनगराकारं हतनागमिव हृदम्‌

দানবদের সেই নগর আর দীপ্তিময় রইল না—তার জ্যোতি নিভে গেল, অধিপতিও নিহত। তা গন্ধর্ব-নগরের মতোই মায়াময় প্রতিচ্ছবি; যেন মহাসর্প নিহত হলে হ্রদ নিস্তেজ হয়ে যায়—তেমনই তার পূর্ব গৌরব শূন্য হয়ে পড়েছিল।

Verse 66

मां तु संहृष्टमनसं क्षिप्रं मातलिरानयत्‌

আর আমাকে—আনন্দে উল্লসিতচিত্ত—মাতলি দ্রুতই (সেখান থেকে) নিয়ে গেল।

Verse 67

हिरण्यपुरमुत्सूज्य निहत्य च महासुरान्‌

হিরণ্যপুর ত্যাগ করে এবং মহাবলী অসুরদের বধ করে…

Verse 68

मम कर्म च देवेन्द्र मातलिरविस्तरेण तत्‌

হে দেবেন্দ্র, হে মাতলি! আমার কর্ম এবং যা আমাকে করতে হবে—সে বিষয়টি বিস্তারে আমাকে বলো।

Verse 69

सर्व विश्रावयामास यथाभूतं महाद्ुते महाद्युते! मातलिने मेरा सारा कार्य, जो कुछ जैसे हुआ था, देवराज इन्द्रसे विस्तारपूर्वक कह सुनाया ।।

হে মহাদ্যুতে! যা যেমন ঘটেছিল, সবই (মাতলি) যথাযথভাবে বিস্তারে জানাল—হিরণ্যপুরের ধ্বংস, দানবী মায়ার প্রতিহতকরণ, এবং মহাবলী নিবাতকবচদের রণে বধ। তা শুনে সহস্রনয়ন দেবেন্দ্র ইন্দ্র, মরুত্‌গণ ও অন্যান্য দেবতাদের সঙ্গে, পরম আনন্দে উল্লসিত হলেন। তিনি সাধুবাদ দিয়ে আমার প্রশংসা করলেন, স্নেহভরে আমাকে আলিঙ্গন করলেন, হাসতে হাসতে আমার মস্তক শুঁকলেন, এবং বারবার আমাকে সান্ত্বনা দিলেন। তারপর দেবসমাজের সঙ্গে তিনি মধুর বাক্য বললেন—“পার্থ! তুমি যুদ্ধে এমন কর্ম সাধন করেছ, যা দেব ও অসুরদের পক্ষেও অসম্ভব।”

Verse 70

निवातकवचानां च वधं संख्ये महौजसाम्‌ 85 त्वा भगवान्‌ _प्रीतः सहस्राक्ष: पुरंदर:

অর্জুন বললেন— যুদ্ধে মহাবলী নিবাতকবচদের বধের সংবাদ শুনে সহস্রনয়ন পুরন্দর ইন্দ্র পরম আনন্দিত হলেন। মরুতগণ ও অন্যান্য দেবতার সঙ্গে তিনি আমাকে “সাধু! সাধু!” বলে প্রশংসা করলেন; স্নেহভরে আলিঙ্গন করে, হাসিমুখে আমার মস্তক শুঁকে অন্তরঙ্গ অনুমোদন দিলেন। তারপর দেবরাজ বারবার আমাকে সান্ত্বনা দিয়ে দেবসমাজের মধ্যে মধুর বাক্য বললেন— “পার্থ, তুমি রণে এমন কর্ম সাধন করেছ, যা দেব ও অসুরের পক্ষেও অসম্ভব।”

Verse 71

: सहित: श्रीमान्‌ साधु साध्वित्यथाब्रवीत्‌ (परिष्वज्य च मां प्रेम्णा मूर्ध्नि चाप्राय सस्मितम्‌ ।) ततो मां देवराजो वै समाश्वास्य पुन: पुन:

তখন শ্রীমান দেবরাজ ইন্দ্র অন্যান্য দেবতার সঙ্গে “সাধু! সাধু!” বলে উঠলেন। স্নেহভরে আমাকে আলিঙ্গন করে, হাসিমুখে আমার মস্তক শুঁকে অন্তরঙ্গ অনুমোদন দিলেন। এরপর তিনি বারবার আমাকে আশ্বস্ত করলেন এবং মধুর বাক্যে সেই কর্মের প্রশংসা করলেন— যা দেব ও দানবদের পক্ষেও অত্যন্ত দুরূহ।

Verse 72

अब्रवीद्‌ विबुधै: सार्थमिदं स मधुरं वच: अतिदेवासुरं कर्म कृतमेव त्वया रणे

তখন আনন্দিত হৃদয়ে ইন্দ্র মরুত ও অন্যান্য দেবতার সঙ্গে মধুর বাক্য বললেন— “তুমি রণে দেব ও অসুরের সীমা ছাড়িয়ে এক মহাকর্ম সাধন করেছ।” হিরণ্যপুর ধ্বংস, দানব-মায়া নিবারণ এবং মহাবলী নিবাতকবচদের যুদ্ধে বধের সংবাদ শুনে তিনি আমাকে প্রশংসা করলেন; স্নেহে আলিঙ্গন করে, হাসিমুখে আমার মস্তকে স্নেহস্পর্শ দিলেন। তারপর দেবরাজ দেবসমাজের মধ্যে বারবার আমাকে আশ্বস্ত করে বললেন— “পার্থ, তোমার এই কর্ম দেব ও অসুরের সামর্থ্যকেও অতিক্রম করেছে।”

Verse 73

गुर्वर्थश्ष कृत: पार्थ महाशत्रून्‌ घ्नता मम एवमेव सदा भाव्यं स्थिरेणाजी धनंजय

“পার্থ! আমার মহাশত্রুদের বধ করে তুমি গুরুর প্রাপ্য কর্তব্য (গুরুদক্ষিণা) সম্পন্ন করেছ। ধনঞ্জয়, রণক্ষেত্রে এভাবেই সর্বদা স্থির ও অবিচল থেকো।”

Verse 74

असम्मूढेन चास्त्राणां कर्तव्यं प्रतिपादनम्‌ अविषटह्गो रणे हि त्वं देवदानवराक्षसै:

“আর অস্ত্রপ্রয়োগ করতে হবে মোহশূন্য, স্বচ্ছ বুদ্ধিতে ও যথাযথ বিধিতে। কারণ যুদ্ধে তুমি অপ্রতিরোধ্য— দেব, দানব ও রাক্ষস কেউই তোমার সম্মুখে টিকতে পারে না।”

Verse 75

सयक्षासुरगन्धर्वै: सपक्षिगणपत्नगै: वसुधां चापि कौन्तेय त्वदूबाहुबलनिर्जिताम्‌ पालयिष्यति धर्मात्मा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिर:

অর্জুন বললেন—হে কুন্তীপুত্র! যক্ষ, অসুর, গন্ধর্ব, পক্ষীগণ এবং নাগজাতিও তোমার সম্মুখে স্থির থাকতে পারে না। ধর্মাত্মা কুন্তীপুত্র যুধিষ্ঠির তোমার বাহুবলে জয়লাভ করা এই পৃথিবীকে ধর্মের পথেই শাসন ও রক্ষা করবেন—শুধু জয়ের গর্বে নয়।

Verse 172

इस प्रकार श्रीमह्ा भारत वनपर्वके अन्तर्गत निवातकवचयुद्धपर्वमें निवातकवचयुद्धाविषयक एक सौ बहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ

এইভাবে শ্রীমহাভারতের বনপর্বের অন্তর্গত নিবাতকবচযুদ্ধপর্বে নিবাতকবচদের সঙ্গে যুদ্ধবিষয়ক একশ বাহাত্তরতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।

Verse 173

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि निवातकवचयुद्धपर्वणि हिरण्यपुरदैत्यवधे त्रिसप्तत्यधिकशततमो<ध्याय:

ইতি শ্রীমহাভারতের বনপর্বে নিবাতকবচযুদ্ধপর্বের অন্তর্গত হিরণ্যপুরের দৈত্যবধ-বিষয়ক একশ চুয়াত্তরতম অধ্যায় সমাপ্ত।

Verse 343

ततो&हमानुपूर्व्येण दिव्यान्यस्त्राण्ययोजयम्‌ परंतु वे दानव युद्धके लिये इस प्रकार मेरी ओर चढ़े आ रहे थे

তখন আমি একে একে দিব্য অস্ত্রসমূহ সংযোজিত করলাম। কিন্তু সেই দানবেরা যুদ্ধের জন্য এমনভাবে আমার দিকে ধেয়ে আসছিল, যেন সমুদ্রের তরঙ্গ উথলে উঠছে। তখন মনে করলাম—মানবসুলভ যুদ্ধপদ্ধতিতে এদের জয় করা সম্ভব নয়; তাই ক্রমে ক্রমে দিব্যাস্ত্রের প্রয়োগ আরম্ভ করলাম।

Verse 363

प्रत्यदृश्यन्त संग्रामे शतशो5थ सहस््रशः वे महान्‌ बलवान तो थे ही, रथके विचित्र पैंतरे बदलकर रणभूमिमें विचर रहे थे। उस युद्धके मैदानमें उनके सौ-सौ और हजार-हजारके झुंड दिखायी देते थे

সেই সংগ্রামে তারা শত শত ও সহস্র সহস্র করে দৃশ্যমান হচ্ছিল। তারা মহাবলবান; রথের বিচিত্র কৌশল বদলে বদলে যুদ্ধক্ষেত্রে বিচরণ করছিল। সেই রণাঙ্গনে তাদের শত শত ও সহস্র সহস্র দল চোখে পড়ছিল—যেন যুদ্ধের বেগই ভয়ংকর রূপ ধারণ করেছে।

Verse 373

विचित्राभरणाश्रैव नन्दयन्तीव मे मनः उनके मस्तकोंपर विचित्र मुकुट और पगड़ी देखी जाती थी। उनके कवच और ध्वज भी विचित्र ही थे। वे अद्भुत आभूषणोंसे विभूषित हो मेरे लिये मनोरंजनकी-सी वस्तु बन गये थे

অর্জুন বললেন—বিচিত্র অলংকারে সজ্জিত হয়ে তারা যেন আমার মনকে আনন্দিত করছিল। তাদের মস্তকে অদ্ভুত মুকুট ও পাগড়ি দেখা যাচ্ছিল; তাদের বর্ম ও ধ্বজও ছিল বিচিত্র। এইভাবে আশ্চর্য ভূষণে বিভূষিত হয়ে, যুদ্ধের গাম্ভীর্যের মধ্যেও তারা আমার কাছে দর্শনীয় কৌতুকবস্তুর মতোই প্রতীয়মান হল।

Verse 386

नाशबवनुवं॑ पीडयितु ते तु मां प्रत्यपीडयन्‌ उस युद्धमें दिव्यास्त्रों द्वारा अभिमन्त्रित बाणोंकी वर्षा करके भी मैं उन्हें पीड़ित न कर सका; परंतु वे मुझे बहुत पीड़ा देने लगे

অর্জুন বললেন—আমি তাদের কষ্ট দিতে পারছি না। সেই যুদ্ধে দিব্যাস্ত্রে অভিমন্ত্রিত, মন্ত্রপূত তীরের বৃষ্টি বর্ষিয়েও আমি তাদের দমন করতে পারলাম না; বরং তারাই আমাকে ভীষণভাবে যন্ত্রণা দিতে শুরু করেছে।

Verse 396

व्यथितो5स्मि महायुद्धे भयं चागान्महन्मम वे अस्त्रोंके ज्ञाता तथा युद्धकुशल थे, उनकी संख्या भी बहुत थी। उस महान संग्राममें उन दानवोंसे पीड़ित होनेपर मेरे मनमें महान्‌ भय समा गया

অর্জুন বললেন—এই মহাযুদ্ধে আমি ব্যথিত; আমার মধ্যে প্রবল ভয় এসে পড়েছে। তারা অস্ত্রবিদ্যায় পারদর্শী, যুদ্ধে দক্ষ এবং সংখ্যায়ও বহু। সেই বিরাট সংঘর্ষে সেই ভয়ংকর শত্রুদের দ্বারা পীড়িত হয়ে আমার মন ভয়ে পরিপূর্ণ হয়ে উঠল।

Verse 603

त्वया विमथितं वीर स्ववीर्यतपसो बलात्‌ 'साक्षात्‌ देवराज इन्द्र भी युद्धमें यह सब कार्य करनेकी शक्ति नहीं रखते हैं। हिरण्यपुरका विनाश करनेवाले वीरवर धनंजय! निश्चय ही देवराज इन्द्र आज तुम्हारे ऊपर बहुत प्रसन्न होंगे। वीर! तुमने अपने पराक्रम और तपस्याके बलसे इस आकाशचारी विशाल नगरको तहस-नहस कर डाला

অর্জুন বললেন—হে বীর! তোমার নিজের বীর্য ও তপস্যার বলেই তুমি এই নগরকে চূর্ণ-বিচূর্ণ করেছ। স্বয়ং দেবরাজ ইন্দ্রও যুদ্ধে এ সব সম্পন্ন করার শক্তি রাখেন না। হিরণ্যপুর-ধ্বংসকারী শ্রেষ্ঠ বীর ধনঞ্জয়! আজ দেবরাজ ইন্দ্র নিশ্চয়ই তোমার প্রতি অত্যন্ত প্রসন্ন হবেন। হে বীর! তোমার পরাক্রম ও তপোবলেই তুমি এই আকাশচারী বিশাল নগরকে ধ্বংসস্তূপে পরিণত করেছ—যা সমস্ত দেবতা ও অসুর একত্র হয়েও নষ্ট করতে পারত না।

Verse 653

शुष्कवृक्षमिवारण्यमदृश्यम भवत्‌ पुरम्‌ दानवोंका वह नगर शोकमग्न हो अपनी सारी शोभा खो चुका था। वहाँ दुःख और दीनता व्याप्त हो रही थी। अपने प्रभुओंके मारे जानेसे वह दानव-नगर निष्प्रभ और अशोभनीय हो गया था। गन्धर्व-नगरकी भाँति उसका अस्तित्व अयथार्थ जान पड़ता था। जिसका हाथी मर गया हो

অর্জুন বললেন—সে নগরটি শুকনো গাছের অরণ্যের মতোই অদর্শনীয় হয়ে উঠেছিল। প্রভুদের পতনে দৈত্য-নগর শোকে নিমগ্ন হয়ে সমস্ত শোভা হারিয়েছিল; সেখানে দুঃখ ও দীনতা ছড়িয়ে পড়েছিল। রক্ষকদের অভাবে তা নিষ্প্রভ ও অশোভন হয়ে গেল; গন্ধর্ব-নগরের মতো তার অস্তিত্বও যেন অবাস্তব মনে হচ্ছিল। যেমন হাতি মরে গেলে সরোবর এবং গাছ শুকিয়ে গেলে বন, তেমনি সে নগর আর দেখার যোগ্য রইল না।

Verse 663

देवराजस्य भवनं कृतकर्माणमाहवात्‌ मेरे मनमें तो हर्ष और उत्साह भरा हुआ था। मैंने देवताओंका कार्य पूरा कर दिया था। अतः मातलि उस रणभूमिसे मुझे शीघ्र ही देवराज इन्द्रके भवनमें ले आये

অর্জুন বললেন—যুদ্ধে কর্তব্য সম্পন্ন করে আমার অন্তর আনন্দে ও নব উদ্যমে পূর্ণ হল। দেবতাদের অর্পিত কাজ আমি সম্পূর্ণ করেছি; তাই মাতলি সেই রণভূমি থেকে আমাকে দ্রুত দেবরাজ ইন্দ্রের প্রাসাদে নিয়ে গেলেন।

Verse 676

निवातकवचांश्वैव ततो5हं शक्रमागमम्‌ इस प्रकार मैं निवातकवच नामक महादानवोंको (तथा पौलोम और कालकेयोंको) मारकर तथा उजड़े हुए हिरण्यपुरको उसी अवस्थामें छोड़कर वहाँसे इन्द्रके पास आया

অর্জুন বললেন—এইভাবে ‘নিবাতকবচ’ নামে মহাদানবদের, আর পউলোম ও কালকেয়দের বধ করে, বিধ্বস্ত হিরণ্যপুরকে যেমন ছিল তেমনই রেখে, আমি সেখান থেকে শক্র (ইন্দ্র)-এর কাছে গেলাম।

Frequently Asked Questions

The tension lies in balancing survival-oriented movement (seeking safe lodging, resources, and protection) with ascetic discipline and non-disruptive conduct—maintaining royal responsibility and restraint while living as forest-dwellers.

Sacred geography functions as moral infrastructure: disciplined travel, respectful reciprocity with hosts, and contemplative residence transform exile from mere deprivation into an organized practice of endurance, memory, and dharmic continuity.

No explicit phalaśruti formula is presented in the provided verses; the chapter’s meta-function is archival and orienting—linking locations, hosts, and trials to the broader exile chronology and the ethical maturation of the protagonists.

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