
Aṣṭāvakra–Kahoda Upākhyāna: Śvetaketu’s Āśrama, Sarasvatī, and the Origin of Aṣṭāvakra
Upa-parva: Tīrtha-yātrā / Lomasha-kathā-prasaṅga (Aṣṭāvakra–Śvetaketu Upākhyāna Context)
Lomasha directs Yudhiṣṭhira to the sacred and fruitful āśrama of the renowned mantra-knower Śvetaketu Auḍḍālaki. The chapter notes Śvetaketu’s direct vision of Sarasvatī in human form, linking the episode to vāk (speech) and brahmavidyā (sacred knowledge). It then situates Śvetaketu alongside Aṣṭāvakra (son of Kahoda) as maternal relatives, and recalls their entry into King Janaka of Videha’s yajña arena, where they confront the famed disputant Bandi. Prompted by Yudhiṣṭhira’s inquiry, Lomasha narrates Kahoda’s formation as Uddālaka’s disciplined student and his marriage to Uddālaka’s daughter Sujātā. While Kahoda studies, the unborn child admonishes his father’s recitation; the offended sage curses the fetus to be ‘crooked in eight ways,’ resulting in Aṣṭāvakra’s distinctive body at birth. Sujātā, distressed by poverty late in pregnancy, urges Kahoda to seek wealth; he goes to Janaka and is defeated in debate, being cast into the waters by Bandi. Uddālaka instructs Sujātā to conceal this from the child. Years later, a domestic incident with Śvetaketu triggers Aṣṭāvakra’s discovery of the truth; he resolves, with Śvetaketu, to attend Janaka’s yajña—where learned disputation and the recovery of familial honor become the narrative’s immediate horizon.
Chapter Arc: तीर्थयात्रा के प्रसंग में लोमश ऋषि धर्म की कसौटी पर खरे उतरे राजा उशीनर की कथा उठाते हैं—एक भयभीत कबूतर शरण माँगता है और उसके पीछे भूखा बाज न्याय की माँग लेकर आ खड़ा होता है। → बाज कहता है कि क्षुधा से पीड़ित उसका ‘विहित भक्षण’ रोका जा रहा है; राजा धर्म-लोभ में आकर यदि उसे रोकेगा तो स्वयं धर्म से च्युत होगा। राजा प्रत्युत्तर देता है कि शरणागत की रक्षा परम धर्म है—कबूतर भयार्त है, अतः उसे लौटाना अधर्म होगा। दोनों धर्मों—अहिंसा/शरणागति और जीविका/प्रकृति-धर्म—का टकराव तीखा होता जाता है। → बाज शर्त रखता है: यदि राजा को कबूतर से स्नेह है तो कबूतर के बराबर तौल कर अपना मांस काटकर दे। राजा अपने शरीर का मांस निकाल-निकाल कर तराजू पर रखता है, पर कबूतर का पलड़ा भारी ही रहता है—अंततः राजा स्वयं को ही तराजू पर रख देने को प्रस्तुत होता है, पूर्ण आत्म-त्याग के शिखर पर पहुँचकर। → तभी बाज और कबूतर अपना दिव्य रूप प्रकट करते हैं—बाज इन्द्र है और कबूतर अग्नि (हव्यवाहन)। वे कहते हैं कि वे धर्म की परीक्षा लेने आए थे; राजा उशीनर की शरणागत-रक्षा और आत्म-त्याग से प्रसन्न होकर उसे दिव्य लोक/सदन का दर्शन कराते हैं और उसकी कीर्ति को अमर बताते हैं।
Verse 1
हि आय न () है > 'प्रभास' की जगह 'हाटक' पाठभेद भी मिलता है। एकत्रिशदाधिकशततमो< ध्याय: राजा उशीनरद्वारा बाजको अपने शरीरका मांस देकर शरणमें आये हुए कबूतरके प्राणोंकी रक्षा करना श्येन उवाच धर्मात्मानं त्वाहुरेकं सर्वे राजन् महीक्षित: । सर्वधर्मविरुद्ध त्वं कस्मात् कर्म चिकीर्षसि
শ্যেন বলল—“হে রাজন, পৃথিবীর সকল নৃপতি আপনাকেই একমাত্র ধর্মাত্মা বলে ঘোষণা করে। তবে কেন আপনি সর্বধর্মবিরুদ্ধ কর্ম করতে চান? ক্ষুধায় আমি কাতর; এই কবুতর আমার জন্য নির্ধারিত আহার। ধর্মফলের লোভে একে রক্ষা করবেন না। সত্যই, একে আশ্রয় দিয়ে আপনি নিজেই ধর্ম ত্যাগ করেছেন।”
Verse 2
विहितं भक्षणं राजन् पीड्यमानस्य मे क्षुधा । मा रक्षीर्धर्मलो भेन धर्ममुत्सृष्टवानसि
শ্যেন বলল—“হে রাজন, ক্ষুধায় পীড়িত আমার জন্য ভক্ষণ করাই বিধিসিদ্ধ। এই কবুতর আমার নির্ধারিত আহার। ধর্মফলের লোভে একে রক্ষা করবেন না; এভাবে আপনি ধর্মকেই ত্যাগ করেছেন।”
Verse 3
राजोवाच संत्रस्तरूपस्त्राणार्थी त्वत्तो भीतो महाद्विज । मत्सकाशमनुप्राप्त: प्राणगृध्नुर॒यं द्विज:
রাজা বললেন—“হে মহাদ্বিজ, এই কবুতর তোমার ভয়ে সন্ত্রস্ত হয়ে প্রাণরক্ষার জন্য আশ্রয় চাইতে আমার কাছে এসেছে।”
Verse 4
एवमभ्यागतस्थेह कपोतस्या भयार्थिन: । अप्रदाने परं धर्म कथं श्येन न पश्यसि
রাজা বললেন—“যে ভয়ে কাতর হয়ে আশ্রয় নিতে এসেছে, সেই কবুতরকে না সঁপে দেওয়াই পরম ধর্ম। হে শ্যেন, তুমি তা কীভাবে দেখছ না?”
Verse 5
प्रस्पन्दमान: सम्भ्रान्त: कपोत: श्येन लक्ष्यते । मत्सकाशं जीवितार्थी तस्य त्यागो विगर्हित:
শ্যেন বলল—“দেখো, এই হতভাগা কবুতর ভয়ে কাঁপছে। প্রাণ বাঁচানোর জন্যই সে আমার কাছে আশ্রয় নিতে এসেছে। এমন অবস্থায় তাকে ত্যাগ করা অত্যন্ত নিন্দনীয়।”
Verse 6
यो हि कश्रिद् द्विजान् हन्याद् गां वा लोकस्य मातरम् । शरणागतं च त्यजते तुल्यं तेषां हि पातकम्
বাজ বলল—যে ব্রাহ্মণহত্যা করে, অথবা জগতের জননী গোরু হত্যা করে, কিংবা শরণাগতকে ত্যাগ করে—এই তিনটির পাপ সমান। দেখো, এই দীন কবুতরটি ভয়ে কাঁপছে; প্রাণরক্ষার জন্যই সে আমার শরণ নিয়েছে। এমন অবস্থায় তাকে ত্যাগ করা মহা নিন্দনীয়।
Verse 7
श्येन उवाच आहारात् सर्वभूतानि सम्भवन्ति महीपते | आहारेण विवर्धन्ते तेन जीवन्ति जन्तव:
বাজ বলল—হে মহারাজ, সকল প্রাণী আহার থেকেই উৎপন্ন হয়; আহারেই বৃদ্ধি পায়, আর সেই আহারেই জীবেরা জীবন ধারণ করে।
Verse 8
शक््यते दुस्त्यजे<प्यर्थे चिररात्राय जीवितुम् । न तु भोजनमुत्सृज्य शक्यं वर्तयितुं चिरम्
যে ধন ত্যাগ করা অত্যন্ত কঠিন, তা না থাকলেও মানুষ বহুদিন বাঁচতে পারে; কিন্তু আহার ত্যাগ করলে কেউই দীর্ঘকাল জীবন ধারণ করতে পারে না।
Verse 9
भक्ष्याद् वियोजितस्याद्य मम प्राणा विशाम्पते । विसृज्य कायमेष्यन्ति पन्थानमकुतोभयम्
বাজ বলল—হে প্রজাপতি, আজ তুমি আমাকে আমার আহার থেকে বঞ্চিত করেছ; তাই আমার প্রাণ এই দেহ ত্যাগ করে ভয়শূন্য পথ—মৃত্যুর পথে—চলে যাবে।
Verse 10
प्रमृते मयि धर्मात्मन् पुत्रदारादि नड्क्ष्यति | रक्षमाण: कपोतं त्वं बहून् प्राणान् न रक्षसि
বাজ বলল—হে ধর্মাত্মা, আমি মারা গেলে আমার স্ত্রী, পুত্র প্রভৃতিও নষ্ট হবে। তুমি এই এক কবুতরকে রক্ষা করতে গিয়ে বহু প্রাণকে রক্ষা করছ না।
Verse 11
धर्म यो बाधते धर्मो न स धर्म: कुधर्म तत् अविरोधात् तु यो धर्म: स धर्म: सत्यविक्रम
শ্যেন বলল—যে আচরণ ‘ধর্ম’ নামে পরিচিত হয়েও ধর্মকে বাধা দেয়, তা ধর্ম নয়; তা কুধর্ম। কিন্তু যে ধর্ম বিরোধহীন, সেই-ই প্রকৃত ধর্ম, হে সত্যবিক্রম।
Verse 12
सत्यपराक्रमी नरेश! जो धर्म दूसरे धर्मका बाधक हो वह धर्म नहीं, कुधर्म है। जो दूसरे किसी धर्मका विरोध न करके प्रतिष्ठित होता है वही वास्तविक धर्म है ।।
হে সত্যপরাক্রমী নরেশ! যে ধর্ম অন্য ধর্মকে বাধা দেয়, তা ধর্ম নয়—কুধর্ম। যে ধর্ম অন্য কোনো ধর্মের বিরোধ না করে প্রতিষ্ঠিত হয়, সেই-ই প্রকৃত ধর্ম। অতএব, হে ভূমিপাল! ধর্মগুলি পরস্পরবিরোধী মনে হলে গুরু-লাঘব বিচার করে, যেখানে অন্যের কোনো বাধা নেই, সেই ধর্মই পালন কর।
Verse 13
गुरुलाघवमादाय धर्माधर्मविनिश्चये । यतो भूयांस्ततो राजन् कुरुष्व धर्मनिश्चयम्
হে রাজন! ধর্ম-অধর্ম নির্ণয়ে পুণ্য-পাপের গুরু-লাঘব বিচার করো; আর যেখানে পুণ্য অধিক, সেই পথকেই ধর্ম স্থির করে আচরণে আনো।
Verse 14
राजोवाच बहुकल्याणसंयुक्तं भाषसे विहगोत्तम | सुपर्ण: पक्षिराट् किं त्वं धर्मज्ञश्नास्यसंशयम्
রাজা বললেন—হে পক্ষিশ্রেষ্ঠ! তোমার বাক্য বহু কল্যাণগুণে পরিপূর্ণ। তুমি কি তবে স্বয়ং সুপর্ণ, পক্ষিরাজ গরুড়? এতে সন্দেহ নেই—তুমি ধর্মজ্ঞ।
Verse 15
तथा हि धर्मसंयुक्तं बहु चित्र च भाषसे । न ते>स्त्यविदितं किंचिदिति त्वां लक्षयाम्पहम्
তুমি যা বলছ, তা বিচিত্রও বটে এবং ধর্মসম্মতও। লক্ষণ দেখে আমি বুঝি—তোমার অজানা বলে কিছুই নেই।
Verse 16
शरणैषिपरित्यागं कथं साध्विति मन्यसे । आहारार्थ समारम्भस्तव चायं॑ विहंगम
বাজ বলল—যে আশ্রয় প্রার্থনা করে তাকে ত্যাগ করা কীভাবে সঙ্গত বলে তুমি মনে কর? আরে বিহঙ্গম, তোমার এই উদ্যোগ তো আসলে আহারের জন্যই।
Verse 17
तो भी तुम शरणागतके त्यागको कैसे अच्छा मानते हो? यह मेरी समझमें नहीं आता। विहंगम! वास्तवमें तुम्हारा यह उद्योग केवल भोजन प्राप्त करनेके लिये है ।।
বাজ বলল—তোমার জন্য অন্য উপায়েও আহার জোগাড় করা যায়, আর তা এই কবুতরের চেয়েও বেশি হতে পারে। আজ তোমার জন্য উৎকৃষ্ট বলদ, কিংবা বরাহ, কিংবা হরিণ, এমনকি মহিষও প্রস্তুত করা যেতে পারে—অথবা এখানে তুমি যা-ই কামনা কর। হে বিহঙ্গম, তোমার এই উদ্যোগ তো কেবল আহারলাভের জন্য; তবে আশ্রয়প্রার্থীকে ত্যাগ করা কীভাবে গ্রহণযোগ্য বলে তুমি মানো?
Verse 18
श्येन उवाच न वराहं न चोक्षाणं न मृगान् विविधांस्तथा । भक्षयामि महाराज कि ममान्येन केनचित्
বাজ বলল—মহারাজ, আমি না বরাহ খাই, না বলদ, না নানাবিধ হরিণ। তবে অন্য কোনো আহারেরই বা আমার কী প্রয়োজন?
Verse 19
बाज बोला--महाराज! मैं न सूअर खाऊँगा, न कोई उत्तम पशु और न भाँति-भाँतिके मृगोंका ही आहार करूँगा। दूसरी किसी वस्तुसे भी मुझे क्या लेना है? ।।
বাজ বলল—হে ক্ষত্রিয়শ্রেষ্ঠ, বিধাতা আমার জন্য যে আহার নির্ধারণ করেছেন, তা এই কবুতরই। অতএব, হে ভূপাল, একে আমার জন্য ছেড়ে দাও; অন্য কোনো খাদ্যের আমার প্রয়োজন নেই।
Verse 20
श्येन: कपोतानत्तीति स्थितिरेषा सनातनी । मा राजन् सारमज्ञात्वा कदलीस्कन्धमाश्रय
বাজ বলল—এটি সনাতন বিধান যে বাজ কবুতর খায়। হে রাজন, ধর্মের সার না বুঝে কলাগাছের কাণ্ডের মতো ফাঁপা আশ্রয় গ্রহণ কোরো না।
Verse 21
राजोवाच राष्ट्र शिबीनामृद्धं वै ददानि तव खेचर । यं वा कामयसे कामं॑ श्येन सर्व ददानि ते
রাজা বললেন— হে আকাশচারী পাখি! আমি তোমাকে শিবিদের সমৃদ্ধ রাজ্য দান করব। অথবা হে শ্যেন! তোমার যে-কোনো কামনা, সবই আমি তোমাকে দেব।
Verse 22
विनेम॑ पक्षिणं श्येन शरणार्थिनमागतम् । येनेम॑ वर्जयेथास्त्वं कर्मणा पक्षिसत्तम । तदाचक्ष्व करिष्यामि न हि दास्ये कपोतकम्
হে শ্যেন! আশ্রয়প্রার্থী হয়ে আসা এই পাখিটিকে আমি ত্যাগ করতে পারি না। হে পক্ষিশ্রেষ্ঠ! যে কর্ম করলে তুমি একে ছেড়ে দেবে, তা বলো; আমি তাই করব। কিন্তু এই কপোতকে আমি দেব না।
Verse 23
श्येन उवाच उशीनर कपोते ते यदि स्नेहो नराधिप । आत्मनो मांसमुत्कृत्य कपोततुलया धृतम्
শ্যেন বলল— হে উশীনর, নরাধিপ! যদি এই কপোতের প্রতি তোমার স্নেহ থাকে, তবে নিজের দেহ থেকে মাংস কেটে দাঁড়িপাল্লায় রাখো, এবং কপোতের ওজনের সমান করো।
Verse 24
यदा सम॑ कपोतेन तव मांसं नृपोत्तम | तदा देयं तु तन्महां सा मे तुष्टिर्भविष्यति
শ্যেন বলল— হে নৃপোত্তম! যখন তোমার মাংস এই কপোতের ওজনের সমান হবে, তখন সেটাই আমাকে দেবে; তাতেই আমি তৃপ্ত হব।
Verse 25
शरीरका मांस काटकर देना है हे कु * £ राजा अनुग्रहमिमं मन्ये श्येन यन्माभियाचसे । तस्मात् तेड्द्य प्रदास्यामि स्वमांसं तुलया धृतम्
রাজা বললেন— হে শ্যেন! তুমি যে আমার কাছে আমারই মাংস প্রার্থনা করছ, আমি একে আমার প্রতি তোমার অনুগ্রহ বলে মানি। অতএব আজ আমি নিজের মাংস তুলায় রেখে তোমাকে দান করব।
Verse 26
लोगमश उवाच उत्कृत्य स स्वयं मांसं राजा परमधर्मवित् | तोलयामास कौन्तेय कपोतेन सम॑ विभो
লোমশ বললেন—হে কুন্তীনন্দন, হে মহাবীর! তারপর পরম ধর্মজ্ঞ রাজা নিজ হাতে নিজের মাংস কেটে সেই কবুতরের সমান করে তুলায় তুলতে লাগলেন।
Verse 27
पुनश्चोत्कृत्य मांसानि राजा प्रादादुशीनर:
লোমশ বললেন—রাজা উশীনর আবার নিজের দেহ থেকে মাংস কেটে তুলায় রাখলেন; তবু অন্য পাল্লায় থাকা কবুতরটি সেই মাংসের চেয়েও ভারী হল। তাই মহারাজ বারবার আরও মাংস কেটে অর্পণ করলেন। তবু সমান না হলে, যতটা সম্ভব সব মাংস কেটে শেষে তিনি নিজেই দাঁড়িপাল্লায় উঠলেন।
Verse 28
न विद्यते यदा मांसं कपोतेन सम॑ धृतम् । तत उत्कृत्तमांसोडसावारुरोह स्वयं तुलाम्
যখন কাটা মাংস কবুতরের সমান হল না, তখন সেই রাজা—বারবার মাংস কেটেও—শেষে নিজেই দাঁড়িপাল্লায় উঠলেন।
Verse 29
श्येन उवाच इन्द्रोडहमस्मि धर्मज्ञ कपोतो हव्यवाडयम् । जिज्ञासमानोौ धर्म त्वां यज्ञवाटमुपागतौ
শ্যেন বলল—হে ধর্মজ্ঞ! আমি ইন্দ্র, আর এই কবুতর হব্যবাহন অগ্নি। তোমার ধর্ম যাচাই করতে আমরা দু’জন তোমার যজ্ঞবাটে এসেছি।
Verse 30
बाज बोला--धर्मज्ञ नरेश! मैं इन्द्र हूँ और यह कबूतर साक्षात् अग्निदेव हैं। हम दोनों आपके धर्मकी परीक्षा लेनेके लिये इस यज्ञशालामें आपके निकट आये थे ।।
শ্যেন বলল—হে ধর্মজ্ঞ নৃপতি! আমি ইন্দ্র, আর এই কবুতর স্বয়ং হব্যবাহন অগ্নিদেব। তোমার ধর্মের পরীক্ষা নিতে আমরা দু’জন এই যজ্ঞশালায় এসেছিলাম। প্রজাপালক! তুমি অঙ্গ থেকে যে মাংস কেটে অর্পণ করেছ, তার ফলে তোমার দীপ্তিমান কীর্তি সকল লোকের কীর্তিকে অতিক্রম করবে।
Verse 31
यावल्लोके मनुष्यास्त्वां कथयिष्यन्ति पार्थिव । तावत् कीर्तिश्व लोकाश्च स्थास्यन्ति तव शाश्वता:,राजन! संसारके मनुष्य इस जगत्में जबतक आपकी चर्चा करेंगे, तबतक आपकी कीर्ति और सनातन लोक स्थिर रहेंगे
হে রাজন! এই জগতে যতদিন মানুষ তোমার কথা বলবে, ততদিন তোমার কীর্তি স্থির থাকবে—এবং তোমার শাশ্বত লোকসমূহও অটল থাকবে।
Verse 32
इत्येवमुक्त्वा राजानमारुरोह दिवं पुन: । उशीनरोअपि धर्मात्मा धर्मेणावृत्य रोदसी
এ কথা বলে ইন্দ্র পুনরায় দেবলোকে আরোহন করলেন। ধর্মাত্মা রাজা উশীনরও ধর্মের প্রভাবে পৃথিবী ও আকাশকে আচ্ছাদিত করে, দীপ্তিমান রূপ ধারণ করে স্বর্গলোকে গমন করলেন।
Verse 33
विभ्राजमानो वपुषाप्यारुरोह त्रिविष्टपम् । तदेतत् सदन राजन् राज्ञस्तस्य महात्मन:
দীপ্তিমান দেহে বিভূষিত হয়ে তিনি ত্রিবিষ্টপ (স্বর্গ) আরোহন করলেন। হে রাজন! এটাই সেই মহাত্মা রাজার নিবাসস্থান।
Verse 34
पश्यस्वैतन्मया सार्ध पुण्यं पापप्रमोचनम् । तत्र वै सततं देवा मुनयश्व॒ सनातना: । दृश्यन्ते ब्राह्मणै राजन् पुण्यवद्भिर्महात्मभि:
আমার সঙ্গে এসে দেখো—এটি পুণ্যদায়ক এবং পাপমোচনকারী পবিত্র স্থান। হে রাজন! সেখানে সনাতন দেবতা ও মুনিগণ সদা বিরাজমান; পুণ্যবান মহাত্মা ব্রাহ্মণরা তাঁদের নিত্য দর্শন লাভ করেন।
Verse 131
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपवके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें श्येनकपोतीयोपाख्यानविषयक एक सौ इकतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ
এইভাবে শ্রীমহাভারতের বনপর্বের অন্তর্গত তীর্থযাত্রাপর্বে লোমশের তীর্থযাত্রা-প্রসঙ্গে শ্যেনকপোতীয় উপাখ্যানের একশ একত্রিশতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।
Verse 13131
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां श्येनकपोतीये एकत्रिंशदधिकशततमो< ध्याय:
এইভাবে শ্রীমহাভারতের বনপর্বের তীর্থযাত্রাপর্বে, লোমশের তীর্থযাত্রা-প্রসঙ্গে, শ্যেন-কপোতী (বাজ ও কবুতর) উপাখ্যানের একশো একত্রিশতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।
The dilemma centers on pursuing material support through high-stakes public debate: Kahoda seeks wealth for household security, but the institutional risks of disputation expose him to catastrophic loss, raising questions about means, prudence, and responsibility.
Speech and learning are ethically charged: knowledge requires humility, and words—whether admonition, recitation, or curse—shape destinies; therefore disciplined study and measured speech are presented as safeguards against avoidable harm.
No explicit phalaśruti is stated in the provided passage; the chapter functions as contextual meta-instruction by embedding moral causality within biography, positioning the episode as an interpretive lens for dharma, debate culture, and restorative action.