
Kāleya-Āśrama-Vināśaḥ — The Kāleyas’ nocturnal raids and the devas’ supplication to Nārāyaṇa
Upa-parva: Kāleya-Dānava Upākhyāna (Account of the Kāleyas and the gods’ appeal to Nārāyaṇa)
Lomāśa reports that the Kāleya dānavas, taking refuge in the ocean (Varuṇa’s watery treasury) by day, emerge at night to attack hermitages and consume sages. Specific losses are enumerated: at Vasiṣṭha’s āśrama, eighty-eight plus nine ascetics are killed; at Cyavana’s, one hundred fruit-and-root subsisting munis are harmed; at Bharadvāja’s, twenty disciplined brahmacārins—some sustained by air or water—are struck down. The attackers move systematically across āśramas at night, and people do not understand the pattern or the perpetrators’ oceanic refuge. At dawn, the bodies of austerity-worn munis are seen on the ground; the terrain is described as strewn with remains and with broken ritual implements (pots, ladles) and scattered agnihotra materials. The world is characterized as losing svādhyāya and vaṣaṭ utterances; yajña and festive rites collapse; fear spreads, leading to flight into caves and ravines, and even to death from panic. Armed heroes attempt to find the dānavas but fail because the beings are hidden in the sea, exhausting themselves. With ritual life suppressed, the devas themselves become distressed; Indra and the gods assemble, place Nārāyaṇa (Vaikuṇṭha, the unconquered) at the forefront, and petition him by recalling earlier salvific interventions (Varāha lifting the earth, Narasiṃha against Hiraṇyakaśipu, Vāmana against Bali, and the defeat of Jambha). They conclude that Nārāyaṇa is their refuge and request protection of the worlds, the gods, and Indra from the great fear.
Chapter Arc: लोमश ऋषि युधिष्ठिर से कहते हैं—एक दिव्य, अद्भुत और अतिमानुष कथा सुनो: जब देवता वृत्रासुर और कालकेय दानवों के आतंक से त्रस्त हो उठे, तब विजय का उपाय एक असंभव-सा दिखने लगा। → कृतयुग के परमदारुण कालकेय दानव वृत्र के आश्रय में अनेक अस्त्र-शस्त्रों से सज्ज होकर इन्द्र-प्रमुख देवताओं को चारों ओर से घेर लेते हैं। देवगण भय, अपमान और पराजय की छाया में ब्रह्मा के पास जाते हैं; ब्रह्मा उनके मन की बात जानकर भी संकेत देते हैं कि समाधान साधारण नहीं—एक महर्षि के त्याग से ही देवबल पुनः खड़ा होगा। → ब्रह्मा के निर्देश पर देवता नारायण को अग्र में रखकर सरस्वती के पार दधीचि के आश्रम पहुँचते हैं—जहाँ वन, लताएँ, सरोवर, मदधारा बहाते गजराज-गजिनियाँ और क्रीड़ारत प्रकृति एक शांत, पवित्र विरोधाभास रचती है। वहीं देवता दधीचि से ‘अस्थिदान’ का याचना-रूप कठोर सत्य रखते हैं—विजय के लिए ऋषि की देह ही वज्र का आधार बने। → देवता आगे त्वष्टा प्रजापति के पास जाकर अपना प्रयोजन बताते हैं; कथा ‘वज्र-निर्माण’ की दिशा में स्थिर हो जाती है—दैवी योजना, ऋषि-त्याग और शिल्प-निर्माण एक ही धारा में जुड़ते हैं। अध्याय का स्वर यह स्थापित करता है कि देवताओं की रक्षा केवल शस्त्र से नहीं, तप और दान के परम त्याग से संभव होती है। → वज्र का निर्माण किस प्रकार होगा, और दधीचि का त्याग देवताओं को वृत्र के विरुद्ध निर्णायक सामर्थ्य कैसे देगा—यह आगे की कथा के लिए उत्कंठा छोड़ देता है।
Verse 1
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ३ श्लोक मिलाकर कुल ७४ श्लोक हैं) अऑरड..2 #९23. | हि २ 7 शततमो< ध्याय: वृत्रासुरसे त्रस््त देवताओंको महर्षि दधीचका अस्थिदान एवं वज्रका निर्माण युधिछिर उवाच भूय एवाहमिच्छामि महर्षेस्तस्य धीमत: । कर्मणां विस्तरं श्रोतुमगस्त्यस्य द्विजोत्तम
যুধিষ্ঠির বললেন—হে দ্বিজশ্রেষ্ঠ! আমি পুনরায় সেই প্রজ্ঞাবান মহর্ষি অগস্ত্যের কর্মসমূহের বিস্তৃত বিবরণ শুনতে চাই।
Verse 2
लोगमश उवाच शृणु राजन् कथां दिव्यामद्भुतामतिमानुषीम् । अगस्त्यस्य महाराज प्रभावममितौजस:
লোমশ বললেন—হে রাজন, শোনো এক দিব্য কাহিনি—অদ্ভুত, মানবসীমার অতীত। মহারাজ, তা মহাতেজস্বী ঋষি অগস্ত্যের প্রভাবের কথা; তাঁর মহিমা অপরিমেয়। আমি তাঁর মহত্ত্ব বর্ণনা করছি—শোনো।
Verse 3
आसन कृतयुगे घोरा दानवा युद्धदुर्मदा: । कालकेया इति ख्याता गणा: परमदारुणा:
কৃতযুগে ভয়ংকর দানবদল ছিল, যারা যুদ্ধের অহংকারে উন্মত্ত থাকত। তারা ‘কালকেয়’ নামে প্রসিদ্ধ ছিল—স্বভাবে অতিশয় নিষ্ঠুর।
Verse 4
ते तु वृत्रं समाश्रित्य नानाप्रहरणोद्यता: । समन्तात् पर्यधावन्त महेन्द्रप्रमुखान् सुरान्
তারা বৃত্রকে আশ্রয় করে, তার নেতৃত্বে নানাবিধ অস্ত্রে সজ্জিত হয়ে, চারদিক থেকে মহেন্দ্র-প্রমুখ দেবতাদের ওপর ঝাঁপিয়ে পড়ল।
Verse 5
ततो वृत्रवधे यत्नमकुर्वस्त्रिदशा: पुरा । पुरंदरं पुरस्कृत्य ब्रह्माणमुपतस्थिरे,तब समस्त देवता वृत्रासुरके वधके प्रयत्नमें लग गये। वे देवराज इन्द्रको आगे करके ब्रह्माजीके पास गये
তখন প্রাচীন কালে ত্রিদশ দেবগণ বৃত্রবধের জন্য উদ্যোগী হলেন। পুরন্দর ইন্দ্রকে অগ্রে রেখে তাঁরা ব্রহ্মার শরণে গেলেন।
Verse 6
कृताञ्जलीस्तु तान् सर्वान् परमेष्ठीत्युवाच ह । विदितं मे सुरा: सर्व यद् वः कार्य चिकीर्षितम्
সেখানে পৌঁছে সকল দেবতা করজোড়ে দাঁড়ালেন। তখন পরমেষ্ঠী ব্রহ্মা বললেন—“হে দেবগণ, তোমরা যে কাজ সাধন করতে চাও, তা সবই আমার জানা।”
Verse 7
तमुपायं प्रवक्ष्यामि यथा वृत्रं वधिष्यथ । दधीच इति विख्यातो महानृषिरुदारधी:
লোমশ বললেন—আমি তোমাদের সেই উপায় বলছি, যাতে তোমরা বৃত্রকে বধ করতে পারবে। দধীচ নামে খ্যাত এক মহান ঋষি আছেন, উদারচিত্ত ও দানশীল। তোমরা সকলে একসঙ্গে তাঁর কাছে গিয়ে একমত হয়ে একটি বর প্রার্থনা করো। তিনি ধর্মাত্মা; অন্তরে প্রসন্ন হয়ে তোমাদের ইচ্ছামতো দান করবেন।
Verse 8
त॑ गत्वा सहिता: सर्वे वरं वै सम्प्रयाचत । स वो दास्यति धर्मात्मा सुप्रीतेनान्तरात्मना
তোমরা সকলে একসঙ্গে তাঁর কাছে গিয়ে আন্তরিকভাবে একটি বর প্রার্থনা করো। সেই ধর্মাত্মা ঋষি অন্তরে পরম প্রসন্ন হয়ে তোমাদের তা দান করবেন।
Verse 9
स वाच्य: सहितै: सर्वैर्भवद्धिर्जयकाड्क्षिभि: । स्वान्यस्थीनि प्रयच्छेति त्रैलोक्यस्य हिताय वै
তিনি বর দিতে সম্মত হলে, বিজয়কামী তোমরা সকলে একসঙ্গে তাঁকে বলবে—“মহাত্মন্! ত্রিলোকের কল্যাণের জন্য আপনার দেহের অস্থি আমাদের দান করুন।”
Verse 10
स शरीर समुत्सज्य स्वान्यस्थीनि प्रदास्यति । तस्यास्थिभिर्महाघोरं वजन संस्क्रियतां दृढम्
তোমাদের প্রার্থনায় তিনি দেহ ত্যাগ করে নিজের অস্থি দান করবেন। সেই অস্থি দিয়ে তোমরা এক দৃঢ় ও অতিভয়ংকর বজ্র নির্মাণ করো।
Verse 11
महच्छत्रुहणं घोरं षडश्र॑ भीमनि:स्वनम् । तेन वज्नेण वै वृत्रं वधिष्यति शतक्रतु:
সে বজ্র হবে বিশাল, ভয়ংকর এবং মহাশত্রুনাশক; তার আকৃতি হবে ষড়কোণ এবং তার ধ্বনি হবে ভীষণ গর্জনময়। সেই বজ্র দিয়েই শতক্রতু—দেবরাজ ইন্দ্র—নিশ্চয়ই বৃত্রকে বধ করবেন।
Verse 12
एतद् व: सर्वमाख्यातं तस्माच्छीघ्रं विधीयताम् । एवमुक्तास्ततो देवा अनुज्ञाप्प पितामहम्
লোমশ বললেন—“আমি তোমাদের সব কথা জানিয়েছি; অতএব আর বিলম্ব কোরো না।” এ কথা শুনে দেবতারা পিতামহ ব্রহ্মার অনুমতি নিয়ে, অগ্রে ভগবান নারায়ণকে স্থাপন করে, দধীচির আশ্রমের দিকে গেলেন। সেই আশ্রম ছিল সরস্বতীর অপর পারে, নানাবিধ বৃক্ষ ও লতায় পরিবেষ্টিত।
Verse 13
नारायणं पुरस्कृत्य दधीचस्वाश्रमं ययु: । सरस्वत्या: परे पारे नानाद्रुमलतावृतम्
ভগবান নারায়ণকে অগ্রে রেখে দেবতারা দধীচির আশ্রমে গেলেন। সেই আশ্রম ছিল সরস্বতীর অপর পারে, নানাবিধ বৃক্ষ ও লতায় পরিবেষ্টিত।
Verse 14
षट्पदोदगीतनिनदैर्विघुष्टं सामगैरिव । पुंस्कोकिलरवोन्मिश्र॑ं जीव॑ं जीवकनादितम्
ভ্রমরদের গুঞ্জন-গীতের ধ্বনিতে সে স্থান এমন মুখর ছিল যেন সামগায়কেরা সামমন্ত্র উচ্চারণ করছে। পুরুষ কোকিলের কলরবের সঙ্গে মিশে, জীবক পাখির ডাকেও অনুরণিত হয়ে—অন্যান্য প্রাণীর শব্দে পরিপূর্ণ—আশ্রমটি যেন প্রাণবন্ত হয়ে উঠেছিল।
Verse 15
महिषैश्न वराहैश्न सृमरैश्वमरैरपि । तत्र तत्रानुचरितं शार्टूलभयवर्जिति:,भैंसे, सूअर, बालमृग और चवँरी गायें बाघ-सिंहोंके भयसे रहित हो उस आश्रमके आस-पास विचर रही थीं
সেই আশ্রম-প্রদেশে মহিষ, বরাহ, ভীত-স্বভাব হরিণ এবং চমরী গরুও—বাঘের ভয় থেকে মুক্ত হয়ে—এখানে-সেখানে নির্ভয়ে বিচরণ করছিল।
Verse 16
करेणुभिवररिणैश्व प्रभिन्नकरटामुखै: । सरो<वगाढै: क्रीडद्धि:ः समन््तादनुनादितम्
সেখানে হাতি ও হাতিনীরা—প্রবল ও মদোন্মত্ত, কপোল থেকে মদের ধারা ঝরছে—সरोবরের জলে নেমে ক্রীড়া করছিল। তাদের খেলায় চারদিক অনুরণিত হয়ে উঠল, আর সমগ্র আশ্রম-প্রদেশ প্রতিধ্বনিতে ভরে গেল।
Verse 17
सिंहव्याप्रैर्महानादान्नदद्धिरनुनादितम् । अपरैश्नापि संलीनैर्गुहाकन्दरशायिभि:
লোমশ বললেন—সিংহ ও ব্যাঘ্রের মহাগর্জনে বারবার সেই স্থান প্রতিধ্বনিত হচ্ছিল; আর অন্য পশুরাও, যারা লুকিয়ে গুহা ও কন্দরায় শুয়ে থাকত, তাদের শব্দে তা অনুরণিত ছিল।
Verse 18
पर्वतोंकी गुफाओं तथा कन्दराओंमें लेटे, झाड़ियोंमें छिपे और वनमें विचरते हुए जोर- जोरसे दहाड़नेवाले सिंहों और व्याप्रोंकी गर्जनासे वह स्थान गूँज रहा था ।।
লোমশ বললেন—সেই বনাঞ্চলে পর্বতের গুহা ও কন্দরায় শুয়ে থাকা, ঝোপঝাড়ে লুকিয়ে থাকা এবং অরণ্যে বিচরণকারী সিংহ-ব্যাঘ্রের প্রবল গর্জনে সমগ্র স্থান প্রতিধ্বনিত হচ্ছিল। সেই নানা প্রদেশের মধ্যেই মহর্ষি দধীচের অতিশয় মনোরম আশ্রম শোভিত ছিল—বিভিন্ন স্থানে আরও দীপ্ত, যেন ত্রিবিষ্টপসম স্বর্গ। আর দেবতারা সেখানে এসে উপস্থিত হলেন।
Verse 19
तत्रापश्यन् दधीचं ते दिवाकरसमद्युतिम् | जाज्वल्यमानं वपुषा यथा लक्ष्म्या पितामहम्
সেখানে তারা মহর্ষি দধীচকে দেখল—সূর্যের সমান দীপ্তিমান; তাঁর দেহের দিব্য কান্তিতে তিনি যেন লক্ষ্মীসমেত পিতামহ ব্রহ্মার মতোই জ্যোতির্ময় প্রতীয়মান হচ্ছিলেন।
Verse 20
तस्य पादौ सुरा राजन्नभिवाद्य प्रणम्य च | अयाचन्त वरं सर्वे यथोक्तं परमेछ्टिना,राजन! उस समय सब देवताओंने महर्षिके चरणोंमें अभिवादन एवं प्रणाम करके ब्रह्माजीने जैसे कहा था, उसी प्रकार उनसे वर माँगा
হে রাজন! তখন দেবতারা মহর্ষির চরণে প্রণাম ও অভিবাদন জানিয়ে, পরমেষ্টি ব্রহ্মার নির্দেশ অনুসারে, সকলেই তাঁর কাছে বর প্রার্থনা করল।
Verse 21
ततो दधीच: परमप्रतीत: सुरोत्तमांस्तानिदम भ्युवाच । करोमि यद् वो हितमद्य देवा: स्वं चापि देहं स्वयमुत्सूजामि
তখন মহর্ষি দধীচ পরম প্রীত হয়ে সেই শ্রেষ্ঠ দেবতাদের বললেন—“হে দেবগণ! আজ আমি তোমাদের কল্যাণের জন্য যা উচিত তাই করব। আর এই দেহ আমি নিজেই ত্যাগ করব।”
Verse 22
स एवमुकक्त्वा द्विपदां वरिष्ठ: प्राणान् वशी स्वान् सहसोत्ससर्ज | ततः सुरास्ते जगृहुः परासो- रस्थीनि तस्याथ यथोपदेशम्
এই কথা বলে দ্বিপদদের শ্রেষ্ঠ, ইন্দ্রিয়সংযমী মহর্ষি দধীচি সহসাই নিজের প্রাণত্যাগ করলেন। তারপর ব্রহ্মার উপদেশ অনুসারে দেবতারা তাঁর নিথর দেহ থেকে অস্থিসমূহ গ্রহণ করল।
Verse 23
प्रह्ृष्टरूपा कश्ष॒ जयाय देवा- स्त्वष्टारमागम्य तमर्थमूचु: । त्वष्टा तु तेषां वचन निशम्य प्रह्ृष्टरूप: प्रयत: प्रयत्नात्
লোমশ বললেন—দেবতারা আনন্দোজ্জ্বল মুখে বিজয়ের আশায় ত্বষ্টার কাছে গিয়ে তাদের উদ্দেশ্য জানাল। তাদের কথা শুনে ত্বষ্টাও প্রসন্ন হয়ে সংযম ও যত্নসহকারে কাজে প্রবৃত্ত হলেন।
Verse 24
चकार वजं भृशमुग्ररूप॑ं कृत्वा च शक्रं स उवाच हृष्ट: । अनेन वज्प्रवरेण देव भस्मीकुरुष्वाद्य सुरारिमुग्रम्
লোমশ বললেন—তিনি অত্যন্ত ভয়ংকর রূপের বজ্র নির্মাণ করলেন; তা প্রস্তুত করে আনন্দিত হয়ে শক্রকে বললেন—‘হে দেব, এই শ্রেষ্ঠ বজ্র দ্বারা আজই দেবতাদের উগ্র শত্রুকে ভস্ম করে দাও।’
Verse 25
इसके बाद वे हर्षोल्लाससे भरकर विजयकी आशा लिये त्वष्टा प्रजापतिके पास आये और उनसे अपना प्रयोजन बताया। देवताओंकी बात सुनकर त्वष्टा प्रजापति बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने एकाग्रचित्त हो प्रयत्नपूर्वक अत्यन्त भयंकर वज्रका निर्माण किया। तत्पश्चात् वे हर्षमें भरकर इन्द्रसे बोले--'देव! इस उत्तम वज़से आप आज ही भयंकर देवद्रोही वृत्रासुरको भस्म कर डालिये ।। ततो हतारि: सगण: सुखं वै प्रशाधि कृत्स्नं त्रिदिवं दिविष्ठ: । त्वष्टा तथोक्तस्तु पुरंदरस्तद् वज् प्रद्ृष्ट: प्रयतो हागृह्नात्
তখন শত্রু নিহত হলে, দেবগণের সঙ্গে স্বর্গে অবস্থান করে সুখে সমগ্র ত্রিদিবের শাসন ও পালন করো, হে দেবলোকে অধিষ্ঠিত। ত্বষ্টার এই কথা শুনে পুরন্দর ইন্দ্র সেই বজ্র দেখে প্রসন্ন হলেন এবং শুদ্ধচিত্তে শ্রদ্ধাভরে তাঁর হাত থেকে বজ্র গ্রহণ করলেন।
Verse 99
इस प्रकार श्रीमह्याभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोगशती ्थयात्राके प्रसंगमें परशुरामके तेजकी हानिविषयक +िन्यानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ
এইভাবে শ্রীমহাভারতের বনপর্বের অন্তর্গত তীর্থযাত্রাপর্বে লোকশা-তীর্থযাত্রার প্রসঙ্গে পরশুরামের তেজহানিবিষয়ক নিরানব্বইতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।
Verse 100
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां वजनिर्माणक थने शततमो<ध्याय:
এইভাবে শ্রীমহাভারতের বনপর্বের তীর্থযাত্রাপর্বে, লোমশের তীর্থযাত্রা-প্রসঙ্গে, বজ্র-নির্মাণ-সম্পর্কিত পবিত্র স্থানে, শততম অধ্যায় সমাপ্ত হল।
The dilemma is collective: how society preserves dharma when its caretakers (munis and āśramas) are targeted and ordinary protective measures fail to identify or reach the threat concealed in an inaccessible refuge.
The chapter frames ritual-learning communities as foundational to social order; when they are harmed, the decline affects all realms. It also models śaraṇāgati: disciplined petition to a higher protective principle when human capacity is exhausted.
No explicit phalaśruti is stated in the provided verses; the meta-function is illustrative—demonstrating the consequences of disrupting yajña and svādhyāya and the narrative logic of seeking Nārāyaṇa as ultimate refuge.
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