Udyoga Parva Adhyāya 92: Kṛṣṇasya sabhāpraveśaḥ
Krishna’s Entry into the Royal Assembly
ज्ञातीनां हि मिथो भेदे यम्मित्र॑ नाभिपद्यते । सर्वयत्नेन माध्यस्थ्यं न तम्मित्रं विदुर्बुधा:,भाई-बन्धुओंमें परस्पर फूट होनेका अवसर आनेपर जो मित्र सर्वथा प्रयत्न करके उनमें मेल करानेके लिये मध्यस्थता नहीं करता, उसे विद्वान् पुरुष मित्र नहीं मानते हैं
আত্মীয়দের মধ্যে পরস্পর ভেদ দেখা দিলে যে বন্ধু সর্বপ্রকার চেষ্টা করে মীমাংসার জন্য মধ্যস্থতা করে না, জ্ঞানীরা তাকে বন্ধু বলে মানেন না।
(वैशग्पायन उवाच