
Dhṛtarāṣṭra–Duryodhana Dialogue on Peace and the Refusal of Compromise
Upa-parva: Sanjaya–Dhritarashtra Samvada (War-Counsel Episode)
Chapter 57 records a tense exchange in the Kuru court. Dhṛtarāṣṭra urges Duryodhana to desist from war, arguing that conflict is not praised in any condition and that even half the earth is sufficient for dignified life; he recommends granting the Pāṇḍavas their due and notes that leading Kuru elders and allies do not desire hostilities. He further implies that Duryodhana is being driven by advisers such as Karṇa, Duḥśāsana, and Śakuni. Duryodhana replies with categorical defiance: he will not shift the burden of the campaign onto Droṇa, Aśvatthāman, Sañjaya, or other allies; instead he and Karṇa will conduct a ‘raṇa-yajña’ (battle-sacrifice), casting Yudhiṣṭhira as the symbolic victim, and he details a ritualized metaphor where chariot, weapons, and arrows become implements of sacrifice. He vows that he, Karṇa, and Duḥśāsana will destroy the Pāṇḍavas, framing the outcome as binary sovereignty—either he rules after killing them, or they rule after killing him—and asserts he will not live alongside them. Dhṛtarāṣṭra then laments the impending destruction, foresees the Pāṇḍavas’ battlefield efficacy (with specific attention to Yuyudhāna and Bhīmasena), and warns of the Kuru army’s collapse; Vaiśaṃpāyana concludes the unit by noting Dhṛtarāṣṭra’s renewed questioning of Sañjaya after addressing assembled kings.
Chapter Arc: हस्तिनापुर की सभा में धृतराष्ट्र दुर्योधन को युद्ध-त्याग और संधि का उपदेश देते हैं—राज्य-भाग देकर पाण्डवों को संतुष्ट करने की अंतिम कोशिश। → धृतराष्ट्र युद्ध की निन्दा करते हुए दुर्योधन से कहते हैं कि पृथ्वी का उचित भाग पाण्डवों को दे दे; पर दुर्योधन अहंकार में अडिग रहता है—वह सुई की नोक जितनी भूमि भी छोड़ने को तैयार नहीं। → संजय (वर्णन/भविष्यवाणी-स्वर) दुर्योधन को भीमसेन के प्रचण्ड पराक्रम का भयावह चित्र दिखाते हैं—हाथियों के दाँत टूटे, कुम्भ फटे, रक्तरंजित गजराज गिरते हैं; कौरव-सेना अग्नि-वेग से ‘निर्दग्ध’ होती प्रतीत होती है। → धृतराष्ट्र उपस्थित राजाओं को समझा-बुझाकर फिर संजय से प्रश्न करते हैं—सभा का संवाद आगे बढ़ने के लिए तैयार होता है। → धृतराष्ट्र का संजय से अगला प्रश्न क्या होगा, और संजय कौन-सा निर्णायक समाचार/नीति-वचन सुनाएगा—यही अगले अध्याय की देहरी है।
Verse 1
ऑपन-माजल बछ। जि अष्टपञ्चाशत्तमो< ध्याय: धृतराष्ट्रका दुर्योधनको संधिके लिये समझाना, दुर्योधनका अहंकारपूर्वक पाण्डवोसे युद्ध करनेका ही निश्चय तथा धृतराष्ट्रका अन्य योद्धाओंको युद्धसे भय दिखाना धृतराष्ट उवाच क्षत्रतेजा ब्रह्मबचारी कौमारादपि पाण्डव: । तेन संयुगमेष्यन्ति मन्दा विलपतो मम,धृतराष्ट्र बोले--संजय! पाण्थुपुत्र युधिष्ठिर क्षात्र-तेजसे सम्पन्न हैं। उन्होंने कुमारावस्थासे ही विधि-पूर्वक ब्रह्मचर्यका पालन किया है, परंतु मेरे ये मूर्ख पुत्र मेरे विलापकी ओर ध्यान न देकर उन्हीं युधिष्ठिरके साथ युद्ध छेड़नेवाले हैं
ধৃতরাষ্ট্র বললেন—“সঞ্জয়! পাণ্ডব যুধিষ্ঠির ক্ষাত্র-তেজে সমৃদ্ধ এবং কৈশোরকাল থেকেই বিধিপূর্বক ব্রহ্মচর্য পালন করে এসেছে। তবু আমার এই মূঢ় পুত্রেরা আমার বিলাপ উপেক্ষা করে তাঁর সঙ্গেই যুদ্ধে প্রবৃত্ত হতে চলেছে।”
Verse 2
दुर्योधन निवर्तस्व युद्धाद् भरतसत्तम | न हि युद्ध प्रशंसन्ति सर्वावस्थमरिंदम,भरतकुलभूषण शत्रुदमन दुर्योधन! तुम युद्धसे निवृत्त हो जाओ। श्रेष्ठ पुरुष किसी भी दशामें युद्धकी प्रशंसा नहीं करते हैं
ধৃতরাষ্ট্র বললেন— দুর্যোধন, হে ভরতশ্রেষ্ঠ, যুদ্ধ থেকে ফিরে এসো। হে শত্রুদমন, কোনো অবস্থাতেই জ্ঞানীরা যুদ্ধের প্রশংসা করেন না।
Verse 3
अलमर्ध पृथिव्यास्ते सहामात्यस्य जीवितुम् | प्रयच्छ पाण्डुपुत्राणां यथोचितमरिंदम,शत्रुओंका दमन करनेवाले वीर! तुम पाण्डवोंको उनका यथोचित राज्यभाग दे दो। बेटा! मन्त्रियों-सहित तुम्हारे जीवननिर्वाहके लिये तो आधा राज्य ही पर्याप्त है
ধৃতরাষ্ট্র বললেন— হে শত্রুদমন, মন্ত্রীদেরসহ তোমার জীবিকা নির্বাহের জন্য অর্ধেক পৃথিবীই যথেষ্ট। অতএব পাণ্ডুপুত্রদের তাদের যথোচিত রাজ্যাংশ দাও।
Verse 4
एतद्धि कुरव: सर्वे मन्यन्ते धर्मसंहितम् । यत् त्वं प्रशान्तिं मनन््येथा: पाण्डुपुत्रमहात्मभि:,समस्त कौरव यही धर्मानुकूल समझते हैं कि तुम महात्मा पाण्डवोंके साथ (संधि करके आपसमें) शान्ति बनाये रखनेकी बात स्वीकार कर लो
ধৃতরাষ্ট্র বললেন— সকল কৌরবই একে ধর্মসম্মত মনে করে যে তুমি মহাত্মা পাণ্ডুপুত্রদের সঙ্গে সন্ধি করে শান্তির পথ গ্রহণ করো।
Verse 5
अड़्जेमां समवेक्षस्व पुत्र स्वामेव वाहिनीम् । जात एष तवाभावस्त्वं तु मोहान्न बुध्यसे,वत्स! तुम इस अपनी ही सेनाकी ओर दृष्टिपात करो। यह तुम्हारा विनाशकाल ही उपस्थित हुआ है, परंतु तुम मोहवश इस बातको समझ नहीं रहे हो
ধৃতরাষ্ট্র বললেন— বৎস, নিজের এই সেনাবাহিনীর দিকেই ভালো করে চেয়ে দেখো। তোমার বিনাশক্ষণ এসে গেছে, কিন্তু মোহে তুমি তা বুঝতে পারছ না।
Verse 6
न त्वहं युद्धमिच्छामि नैतदिच्छति बाह्विकः । न च भीष्मो न च द्रोणो नाश्वृत्थामा न संजय:,देखो, न तो मैं युद्ध करना चाहता हूँ, न बाह्नीक इसकी इच्छा रखते हैं और न भीष्म, द्रोण, अश्वत्थामा, संजय, सोमदत्त, शल तथा कृपाचार्य ही युद्ध करना चाहते हैं। सत्यव्रत, पुरुमित्र, जय और भूरिश्रवा भी युद्धके पक्षमें नहीं हैं
ধৃতরাষ্ট্র বললেন— দেখো, আমি যুদ্ধ চাই না; বাহ্লিকও চায় না। ভীষ্মও নয়, দ্রোণও নয়, অশ্বত্থামাও নয়, সঞ্জয়ও নয়— কেউই যুদ্ধ কামনা করে না।
Verse 7
न सोमदत्तो न शलो न कृपो युद्धमिच्छति । सत्यव्रत: पुरुमित्रो जयो भूरिश्रवास्तथा,देखो, न तो मैं युद्ध करना चाहता हूँ, न बाह्नीक इसकी इच्छा रखते हैं और न भीष्म, द्रोण, अश्वत्थामा, संजय, सोमदत्त, शल तथा कृपाचार्य ही युद्ध करना चाहते हैं। सत्यव्रत, पुरुमित्र, जय और भूरिश्रवा भी युद्धके पक्षमें नहीं हैं
ধৃতরাষ্ট্র বললেন—সোমদত্ত, শল কিংবা কৃপ—কেউই যুদ্ধ চায় না। সত্যব্রত, পুরুমিত্র, জয় ও ভূরিশ্রবাও রণযুদ্ধে প্রবৃত্ত নন।
Verse 8
येषु सम्प्रतितिष्ठेयु: कुरव: पीडिता: परै: । ते युद्ध नाभिनन्दन्ति तत् तुभ्यं तात रोचताम्,शत्रुओंसे पीड़ित होनेपर कौरवसैनिक जिनके आश्रयमें खड़े हो सकते हैं, वे ही लोग युद्धका अनुमोदन नहीं कर रहे हैं। तात! उनके इस विचारको तुम्हें भी पसंद करना चाहिये
যাঁদের আশ্রয়ে শত্রুপীড়িত কৌরবরা দৃঢ়ভাবে দাঁড়াতে পারে, তাঁরাই যুদ্ধ অনুমোদন করছেন না। অতএব, বৎস, তাঁদের বিচার তোমারও গ্রহণীয় হোক।
Verse 9
न त्वं करोषि कामेन कर्ण: कारयिता तव । दुःशासनश्न पापात्मा शकुनिश्चापि सौबल:,(मैं जानता हूँ.) तुम अपनी इच्छासे युद्ध नहीं कर रहे हो, अपितु पापात्मा दुःशासन, कर्ण तथा सुबल-पुत्र शकुनि ही तुमसे यह कार्य करा रहे हैं
তুমি নিজের ইচ্ছায় এই যুদ্ধ করছ না; কর্ণই তোমাকে এতে ঠেলে দিচ্ছে। পাপাত্মা দুঃশাসন এবং সুবলপুত্র শকুনিও তোমাকে এই কাজে প্ররোচিত করছে।
Verse 10
दुर्योधन उवाच नाहं भवति न द्रोणे नाश्वृत्थाम्नि न संजये । न भीष्मे न च काम्बोजे न कृपे न च बाह्लिके,दुर्योधन बोला-पिताजी! मैंने आप, द्रोणाचार्य, अश्वत्थामा, संजय, भीष्म, काम्बोजनरेश, कृपाचार्य, बाह्नीक, सत्यव्रत, पुरुमित्र, भूरिश्रवा अथवा आपके अन्यान्य योद्धाओंपर सारा बोझ रखकर पाण्डवोंको युद्धके लिये आमन्त्रित नहीं किया है
দুর্যোধন বলল—পিতা! আপনার উপর, দ্রোণ, অশ্বত্থামা, সঞ্জয়, ভীষ্ম, কাম্বোজরাজ, কৃপ কিংবা বাহ্লীক—কারও উপর সমগ্র ভার চাপিয়ে আমি পাণ্ডবদের যুদ্ধের আহ্বান জানাইনি।
Verse 11
सत्यव्रते पुरुमित्रे भूरिश्रवसि वा पुन: । अन्येषु वा तावकेषु भारं कृत्वा समाह्दयम्,दुर्योधन बोला-पिताजी! मैंने आप, द्रोणाचार्य, अश्वत्थामा, संजय, भीष्म, काम्बोजनरेश, कृपाचार्य, बाह्नीक, सत्यव्रत, पुरुमित्र, भूरिश्रवा अथवा आपके अन्यान्य योद्धाओंपर सारा बोझ रखकर पाण्डवोंको युद्धके लिये आमन्त्रित नहीं किया है
দুর্যোধন বলল—সত্যব্রত, পুরুমিত্র, ভূরিশ্রবা কিংবা আপনার পক্ষের অন্য যোদ্ধাদের উপর সমগ্র ভার চাপিয়ে, মন কঠোর করে, আমি পাণ্ডবদের যুদ্ধের জন্য আহ্বান জানাইনি।
Verse 12
अहं च तात कर्णश्न रणयज्ञं वितत्य वै | युधिष्ठिरं पशुं कृत्वा दीक्षितौ भरतर्षभ,तात! भरतश्रेष्ठ! मैंने तथा कर्णने रणयज्ञका विस्तार करके युधिष्ठिरको बलिपशु बनाकर उस यज्ञकी दीक्षा ले ली है
দুর্যোধন বলল—পিতা, ভরতশ্রেষ্ঠ! আমি ও কর্ণ সত্যই রণযজ্ঞ বিস্তার করেছি; যুধিষ্ঠিরকে বলিপশু করে আমরা সেই যজ্ঞের দীক্ষা গ্রহণ করেছি।
Verse 13
रथो वेदी ख्रुवः खड्गो गदा स्लरुक् कवचोडजिनम् | चातुर्ोत्रं च धुर्या मे शरा दर्भा हविर्यश:,इसमें रथ ही वेदी है, खड़ग खुवा है, गदा खुक् है, कवच मृगचर्म है, रथका भार वहन करनेवाले मेरे चारों घोड़े ही चार होता हैं, बाण कुश हैं और यश ही हविष्य है
দুর্যোধন বলল—আমার রথই বেদী, আমার খড়্গই স্থির স্তম্ভ; আমার গদাই আহুতি-চামচ, আমার বর্মই মৃগচর্ম। রথ বহনকারী আমার চার অশ্বই চার হোতা; আমার শর দর্ভ-তৃণ, আর আমার যশই হব্য।
Verse 14
आत्मयज्ञेन नृपते इष्ट्वा वैवस्व॒तं रणे । विजित्य च समेष्यावो हतामित्रौ श्रिया वृती,नरेश्वरर हम दोनों समरांगणमें अपने इस यज्ञके द्वारा यमराजका यजन करके शत्रुओंको मारकर विजयी हो विजयलक्ष्मीसे शोभा पाते हुए पुनः राजधानीमें लौटेंगे
দুর্যোধন বলল—হে নৃপতি! রণক্ষেত্রে আত্মযজ্ঞ দ্বারা আমরা বৈবস্বত (যম)কে পূজা করব; শত্রুদের সংহার করে বিজয় লাভ করে, রাজলক্ষ্মীর শোভায় ভূষিত হয়ে আমরা দু’জন একসঙ্গে ফিরে আসব।
Verse 15
अहं च तात कर्णश्न भ्राता दुःशासनश्व मे । एते वयं हनिष्याम: पाण्डवान् समरे त्रयः,तात! मैं, कर्ण तथा भाई दुःशासन--हम तीन ही समरभूमिमें पाण्डवोंका संहार कर डालेंगे
দুর্যোধন বলল—পিতা! আমি, কর্ণ এবং আমার ভাই দুঃশাসন—আমরা এই তিনজনই রণক্ষেত্রে পাণ্ডবদের বিনাশ করব।
Verse 16
अहं हि पाण्डवान् हत्वा प्रशास्ता पृथिवीमिमाम् | मां वा हत्वा पाण्डुपुत्रा भोक्तार: पृथिवीमिमाम्,या तो मैं ही पाण्डवोंको मारकर इस पृथ्वीका शासन करूँगा या पाण्डव ही मुझे मारकर भूमण्डलका राज्य भोगेंगे
দুর্যোধন বলল—হয় আমি পাণ্ডবদের বধ করে এই পৃথিবী শাসন করব, নয়তো পাণ্ডুপুত্ররা আমাকে বধ করে এই পৃথিবীর রাজ্য ভোগ করবে।
Verse 17
त्यक्त मे जीवितं राज्यं धनं सर्व च पार्थिव । न जातु पाण्डवै: सार्थ वसेयमहमच्युत,राज्यच्युत न होनेवाले महाराज! मैं जीवन, राज्य, धन--सब कुछ छोड़ सकता हूँ, परंतु पाण्डवोंके साथ मिलकर कदापि नहीं रह सकता
হে মহারাজ! আমি প্রাণ, রাজ্য ও সমস্ত ধন ত্যাগ করতেও পারি; কিন্তু পাণ্ডবদের সঙ্গে মিলিত হয়ে কখনওই বাস করতে সম্মত হব না।
Verse 18
यावद्धि सूच्यास्तीक्ष्णाया विध्येदग्रेण मारिष । तावदप्यपरित्याज्यं भूमेर्न: पाण्डवान् प्रति,पूज्य पिताजी! तीखी सूईके अग्रभागसे जितनी भूमि बिंध सकती है, उतनी भी मैं पाण्डवोंको नहीं दे सकता
পূজ্য পিতামহ! ধারালো সূচের অগ্রভাগ যতটুকু ভূমি ভেদ করতে পারে, আমাদের ভূমি থেকে ততটুকুও পাণ্ডবদের জন্য ত্যাগযোগ্য নয়—আমি দেব না।
Verse 19
धृतराष्ट्र रवाच सर्वान् वस्तात शोचामि त्यक्तो दुर्योधनो मया । ये मन्दमनुयास्यध्वं यान्तं वैवस्वतक्षयम्,धृतराष्ट्र बोले--तात कौरवगण! दुर्योधनको तो मैंने त्याग दिया। यमलोकको जाते हुए उस मूर्खका तुम लोगोंमेंसे जो अनुसरण करेंगे मैं उन सभी लोगोंके लिये शोकमें पड़ा हूँ
ধৃতরাষ্ট্র বললেন—বৎসগণ! আমি তোমাদের সকলের জন্য শোক করি। দুঃশাসনপুত্র দুর্যোধনকে আমি ত্যাগ করেছি। যে যে জন সেই মূর্খকে অনুসরণ করবে, যে বৈবস্বত (যম)-এর ধামে অগ্রসর হচ্ছে, তাদের সকলের জন্য আমি দুঃখে নিমগ্ন।
Verse 20
रुरूणामिव यूथेषु व्याप्रा: प्रहरतां वरा: । वरान् वरान् हनिष्यन्ति समेता युधि पाण्डवा:,प्रहार करनेवालोंमें श्रेष्ठ व्याप्र जैसे रुक नामक मृगोंके झुंडोंमें घुसकर बड़ों-बड़ोंको मार डालते हैं, उसी प्रकार योद्धाओंमें अग्रगण्य पाण्डव युद्धमें एकत्र होकर कौरवोंके प्रधान- प्रधान वीरोंका वध कर डालेंगे
যেমন আঘাতে শ্রেষ্ঠ ব্যাঘ্র রুরু-মৃগের পালেতে ঢুকে প্রবলদেরও নিধন করে, তেমনই পাণ্ডবেরা যুদ্ধে একত্র হয়ে আমাদের প্রধান প্রধান বীরদের সংহার করবে।
Verse 21
प्रतीपमिव मे भाति युयुधानेन भारती । व्यस्ता सीमन्तिनी ग्रस्ता प्रमृष्टा दीर्घबाहुना,मुझे तो ऐसा प्रतीत हो रहा है कि पुरुषसे तिरस्कृत हुई नारीकी भाँति इस भरतवंशियोंकी सेनाको विशाल बाँहोंवाले वीर सात्यकिने अपने अधिकारमें करके रौंद डाला है और वह अब विपरीत दिशाकी ओर अस्त-व्यस्त दशामें भागी जा रही है
আমার মনে হচ্ছে, যুযুধান (সাত্যকি) ভরতবংশীয় এই সেনাকে উল্টো দিকে ফিরিয়ে দিয়েছে—যেন পুরুষে তিরস্কৃত এক নারী, যার সিঁথি এলোমেলো, দীর্ঘবাহু বীরের হাতে ধরা পড়ে পদদলিত; তেমনই এ সেনা বিশৃঙ্খল হয়ে বিপরীত দিকে পালিয়ে যাচ্ছে।
Verse 22
सम्पूर्ण पूरयन् भूयो धन पार्थस्य माधव: । शैनेय: समरे स्थाता बीजवत् प्रवपठ्शरान्,मधुवंशी सात्यकि युधिष्ठिरके भरे-पूरे बल-वैभवको और भी बढ़ाते हुए, जैसे किसान खेतोंमें बीज बोता है, उसी प्रकार समरभूमिमें बाण बिखेरते हुए खड़े होंगे
মাধব (কৃষ্ণ) পার্থ (অর্জুন)-এর সম্পদ-সমৃদ্ধি আরও পূর্ণ করে ক্রমে বৃদ্ধি করবেন; আর শৈনেয় (সাত্যকি) সমরে অটল হয়ে, কৃষক যেমন বীজ বোনে, তেমনই তীর ছড়িয়ে দেবেন।
Verse 23
सेनामुखे प्रयुद्धानां भीमसेनो भविष्यति । त॑ं सर्वे संश्रयिष्यन्ति प्राकारमकुतो भयम्,सेनामें समस्त पाण्डव योद्धाओंके आगे भीमसेन खड़े होंगे और समस्त योद्धा उन्हें भयरहित प्राकार (चहारदीवारी)-के समान मानकर उन्हींका आश्रय लेंगे
সেনার অগ্রভাগে যাঁরা যুদ্ধ করবেন, তাঁদের মধ্যে ভীমসেনই অগ্রগণ্য হবেন। সকল যোদ্ধা তাঁকে নির্ভয় প্রাকার—অভেদ্য প্রাচীর—জেনে তাঁরই আশ্রয় নেবে।
Verse 24
यदा द्रक्ष्यसि भीमेन कुञ्जरान् विनिपातितान् । विशीर्णदन्तान् गिर्याभान् भिन्नकुम्भान् सशोणितान्,जब तुम देखोगे कि भीमसेनने पर्वताकार गजराजोंके दाँत तोड़ एवं कुम्भस्थल विदीर्ण करके उन्हें रक्तरंजित दशामें धराशायी कर दिया है और वे रणभूमिमें टूट-फ़ूटकर गिरे हुए पर्वतोंके समान दृष्टिगोचर हो रहे हैं, तब उन सबपर दृष्टिपात करके भीमसेनके स्पर्शसे भी भयभीत होकर मेरी कही हुई बातोंको याद करोगे
যখন তুমি দেখবে ভীম পর্বতসম গজরাজদের মাটিতে ফেলে দিয়েছে—তাদের দাঁত ভেঙে চূর্ণ, কপোল ফেটে গেছে, রক্তে সিক্ত—তখন সেই দৃশ্য তোমার অন্তরে ভয় সঞ্চার করবে।
Verse 25
तानभिप्रेक्ष्य संग्रामे विशीर्णानिव पर्वतान् | भीतो भीमस्य संस्पर्शात् स्मर्तासि वचनस्य मे,जब तुम देखोगे कि भीमसेनने पर्वताकार गजराजोंके दाँत तोड़ एवं कुम्भस्थल विदीर्ण करके उन्हें रक्तरंजित दशामें धराशायी कर दिया है और वे रणभूमिमें टूट-फ़ूटकर गिरे हुए पर्वतोंके समान दृष्टिगोचर हो रहे हैं, तब उन सबपर दृष्टिपात करके भीमसेनके स्पर्शसे भी भयभीत होकर मेरी कही हुई बातोंको याद करोगे
সমরে তাদের ভাঙা পর্বতের মতো ছিন্নভিন্ন হয়ে পড়ে থাকতে দেখে, ভীমের স্পর্শমাত্রের ভয়েও কাঁপতে কাঁপতে তুমি আমার কথাগুলি স্মরণ করবে।
Verse 26
निर्दग्ध॑ं भीमसेनेन सैन्यं रथहयद्विपम् । गतिमग्नेरिव प्रेक्ष्य स्मतासि वचनस्य मे,भीमसेन जब घोड़े, रथ और हाथियोंसे भरी हुई सारी कौरव-सेनाको अपनी क्रोधाग्निसे दग्ध करने लगेंगे, उस समय अग्निके समान उनका प्रबल वेग देखकर तुम्हें मेरी बातें याद आयेंगी
যখন ভীমসেন রথ-অশ্ব-গজে পূর্ণ আমাদের সেনাকে দগ্ধ করে দেবে, তখন অগ্নির গতির মতো তার প্রবল বেগ দেখে তুমি আমার কথাগুলি স্মরণ করবে।
Verse 27
महद् वो भयमागामि न चेच्छाम्यथ पाण्डवै: । गदया भीमसेनेन हता: शममुपैष्यथ,तुमलोगोंपर बहुत बड़ा भय आनेवाला है। मैं नहीं चाहता कि पाण्डवोंके साथ तुम्हारा युद्ध हो। यदि हो गया तो तुमलोग भीमसेनकी गदासे मारे जाकर सदाके लिये शान्त हो जाओगे
তোমাদের উপর মহাভয় নেমে আসতে চলেছে। আমি চাই না তোমরা পাণ্ডবদের সঙ্গে যুদ্ধে জড়াও। যদি যুদ্ধ হয়, তবে ভীমসেনের গদার আঘাতে তোমরা নিহত হয়ে চিরকালের জন্য মৃত্যুর নিস্তব্ধ শান্তিতে লীন হবে।
Verse 28
महावनमिवच्छिन्नं यदा द्रक्ष्यसि पातितम् । बल॑ कुरूणां भीमेन तदा स्मर्तासि मे वच:,काटकर गिराये हुए विशाल वनकी भाँति जब तुम कौरवसेनाको भीमसेनके द्वारा मार गिरायी हुई देखोगे, तब तुम्हें मेरे वचनोंका स्मरण हो आयेगा
যখন তুমি ভীমের দ্বারা কুরুসেনাকে কেটে ফেলা মহাবনের মতো ভূমিতে লুটিয়ে পড়তে দেখবে, তখনই তুমি আমার কথাগুলি স্মরণ করবে।
Verse 29
वैशम्पायन उवाच एतावदुक्त्वा राजा तु सर्वास्तान् पृथिवीपतीन् । अनुभाष्य महाराज पुन: पप्रच्छ संजयम्
বৈশম্পায়ন বললেন—এতটুকু বলে রাজা সেই সকল ভূ-পতিদেরও সম্বোধন করলেন। তাদের সঙ্গে আরও কথা বলে, হে মহারাজ, তিনি পুনরায় সঞ্জয়কে প্রশ্ন করলেন।
Verse 57
इस प्रकार श्रीमह्माभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत यानसंधिपर्वमें संजयवाक्यविषयक सत्तावनवाँ अध्याय पूरा हुआ
এইভাবে শ্রীমহাভারতের উদ্যোগপর্বের অন্তর্গত যানসন্ধিপর্বে সঞ্জয়বাক্যবিষয়ক সাতান্নতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।
Verse 58
वैशम्पायनजी कहते हैं--महाराज जनमेजय! राजा धृतराष्ट्रने वहाँ बैठे हुए समस्त भूपालोंसे उपर्युक्त बातें कहकर उन्हें समझा-बुझाकर पुन: संजयसे पूछा ।। इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि यानसंधिपर्वणि धृतराष्ट्रवाक्येडष्टपञ्चाशत्तमो5 ध्याय:,इस प्रकार श्रीमह्ाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत यानसंधिपर्वमें धृतराष्ट्रवाक्यविषयक अद्डावनवाँ अध्याय पूरा हुआ
বৈশম্পায়ন বললেন—মহারাজ জনমেজয়! রাজা ধৃতরাষ্ট্র সেখানে উপবিষ্ট সকল ভূ-পালকে পূর্বোক্ত কথায় বুঝিয়ে-শুনিয়ে ও স্থির করে দিয়ে, পুনরায় সঞ্জয়কে প্রশ্ন করলেন। এইভাবে শ্রীমহাভারতের উদ্যোগপর্বের অন্তর্গত যানসন্ধিপর্বে ধৃতরাষ্ট্রবাক্যবিষয়ক আটান্নতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।
The dilemma is whether sovereignty and honor can justify rejecting equitable compromise when war is foreseeable and preventable—testing the ruler’s duty to protect life and stability against an aggressive claim to undivided power.
The chapter illustrates that ethical governance depends not only on receiving counsel but on the capacity to internalize it; rhetorical sacralization of conflict can function as a mechanism to bypass moral scrutiny and normalize extreme risk.
No explicit phalaśruti is stated here; the meta-frame is conveyed through Vaiśaṃpāyana’s transition, positioning the exchange as evidentiary material within the larger inquiry into causality, responsibility, and the escalation toward Kurukṣetra.