
Udyoga-parva Adhyāya 27 — Saṃjaya’s Counsel on Dharma, Desire, and the Non-Perishing of Karma
Upa-parva: Sanjaya–Dhritarashtra Nīti-saṃvāda (Counsel on Forbearance and Karmaphala)
Saṃjaya advises the royal listener to remain steady in dharma and not be driven toward a destructive resolution. He frames human life as brief and unstable, argues that desire (kāma) obstructs dharma, and praises the disciplined person who restrains such impulses. The discourse asserts karmic continuity—merit and demerit do not perish, and the agent is followed by the results. Saṃjaya contrasts righteous acts (truthfulness, self-control, straightforwardness, non-cruelty, sacrifice and giving) with the suffering that follows adharma and excessive attachment to pleasure and wealth. He highlights the strategic cost of long exile and the irrationality of choosing conflict “at an inopportune time,” given available allies and prior strength. The counsel culminates in a warning about the grievous consequences of a conflict that would fell eminent elders and teachers, concluding that even sovereignty cannot remove old age and death, so restraint is superior to a path bound to moral and social ruin.
Chapter Arc: संजय के समक्ष युधिष्ठिर धर्म की उलझी हुई परिभाषा को पकड़ते हैं—जहाँ अधर्म धर्म का वेश धर लेता है और धर्म स्वयं अधर्म-सा दिखने लगता है। → युधिष्ठिर ‘आपद्धर्म’ की कठिन भूमि में उतरते हैं: जब जीविका (प्रकृति) लुप्त हो जाए, वर्ण-धर्म और नित्यवृत्ति डगमगा जाए, तब मनुष्य किस प्रमाण से कर्म चुने? देवयोनि-भोगयोनि के उदाहरण से वे बताते हैं कि हर लोक में ‘नवीन कर्म’ की बाध्यता समान नहीं—पर मनुष्य-लोक में निर्णय का भार टलता नहीं। → वे निर्णायक प्रश्न उठाते हैं: यदि मैं साम (शान्ति-नीति) छोड़कर युद्ध में उतरूँ, या युद्ध में उतरते हुए भी स्वधर्म से च्युत हो जाऊँ—तो इस द्वंद्व का अंतिम निर्णय कौन करे? युधिष्ठिर कृष्ण को ‘धर्मस्वामी, नीतिज्ञ, ब्राह्मणभक्त, मनीषी’ कहकर प्रमाण-रूप में स्थापित करते हैं। → कृष्ण की नीति और यदुवंश-वृष्ण्यन्धक आदि की समृद्ध, अनुशासित शक्ति का स्मरण कर युधिष्ठिर संकेत देते हैं कि कृष्ण-वचन का अतिक्रमण नहीं होना चाहिए; धर्म का निर्णय बुद्धि और प्रमाण—दोनों से, और आपत्ति-काल में विशेष सावधानी से किया जाए। → युधिष्ठिर का प्रश्न कृष्ण के उत्तर की प्रतीक्षा में ठहर जाता है—क्या शान्ति का मार्ग अंतिम है, या धर्म की रक्षा हेतु युद्ध अपरिहार्य?
Verse 1
ऑपनआक्राता बछ। अर: > देवयोनि भोगयोनि है, कर्मयोनि नहीं। उसमें नवीन कर्म करनेके लिये देवता बाध्य नहीं हैं। अष्टाविशोश् ध्याय: संजयको युधिष्ठिरका उत्तर युधिछिर उवाच असंशयं संजय सत्यमेतद् धर्मो वर: कर्मणां यत् त्वमात्थ । ज्ञात्वा तु मां संजय गर्हयेस्त्वं यदि धर्म यद्यधर्म चरेयम्,युधिष्ठिर बोले--संजय! सब प्रकारके कर्मोमें धर्म ही श्रेष्ठ है। यह जो तुमने कहा है, वह बिलकुल ठीक है। इसमें रत्तीभर भी संदेह नहीं है; परंतु मैं धर्म कर रहा हूँ या अधर्म, इस बातको पहले अच्छी तरह जान लो; फिर मेरी निन्दा करना
যুধিষ্ঠির বললেন—সঞ্জয়, নিঃসন্দেহে তুমি সত্য বলেছ: সকল কর্মপথের মধ্যে ধর্মই শ্রেষ্ঠ। এতে কোনো সংশয় নেই। কিন্তু সঞ্জয়, আগে স্পষ্ট করে বোঝো—আমি ধর্মে চলছি না অধর্মে; তারপরই আমাকে নিন্দা করো।
Verse 2
यत्राधर्मो धर्मरूपाणि धत्ते धर्म: कृत्स्नो दृश्यतेडधर्मरूप: । बिश्रद् धर्मो धर्मरूपं तथा च विद्वांसस्तं सम्प्रपश्यन्ति बुद्धया,कहीं तो अधर्म ही धर्मका रूप धारण कर लेता है, कहीं पूर्णतया धर्म ही अधर्म दिखायी देता है तथा कहीं धर्म अपने वास्तविक स्वरूपको ही धारण किये रहता है। विद्वान् पुरुष अपनी बुद्धिसे विचार करके उसके असली रूपको देख और समझ लेते हैं
যুধিষ্ঠির বললেন—কোথাও অধর্মই ধর্মের রূপ ধারণ করে, কোথাও সম্পূর্ণ ধর্মও যেন অধর্মের মতো দেখা দেয়, আর কোথাও ধর্ম নিজের সত্য স্বরূপেই স্থিত থাকে। জ্ঞানীরা বুদ্ধির বিচারে তার প্রকৃত রূপ উপলব্ধি করেন।
Verse 3
एवं तथैवापदि लिड्रमेतद् धर्माधर्मो नित्यवृत्ती भजेताम् । आट्यं लिड्रं यस्य तस्य प्रमाण- मापद्धर्म संजय तं निबोध,इस प्रकार जो यह विभिन्न वर्णॉका अपना-अपना लक्षण (लिंग) (जैसे ब्राह्मणके लिये अध्ययनाध्यापन आदि, क्षत्रियके लिये शौर्य आदि तथा वैश्यके लिये कृषि आदि) है, वह ठीक उसी प्रकार उस-उस वर्णके लिये धर्मरूप है और वही दूसरे वर्णके लिये अधर्मरूप है। इस प्रकार यद्यपि धर्म और अधर्म सदा सुनिश्चितरूपसे रहते हैं तथापि आपत्तिकालमें वे दूसरे वर्णके लक्षणको भी अपना लेते हैं। प्रथम वर्ण ब्राह्मणका जो विशेष लक्षण (याजन और अध्यापन आदि) है, वह उसीके लिये प्रमाणभूत है (क्षत्रिय आदिको आपत्तिकालमें भी याजन और अध्यापन आदिका आश्रय नहीं लेना चाहिये)। संजय! आपद्धर्मका क्या स्वरूप है, उसे तुम (शास्त्रके वचनोंद्वारा) जानो
যুধিষ্ঠির বললেন— বিপদের সময়েও বর্ণগুলির এই চিহ্নগুলিই কার্যকর হয়; যে এক বর্ণের জন্য ধর্ম, তা অন্য বর্ণের জন্য অধর্ম হয়ে দাঁড়ায়। ধর্ম-অধর্ম সাধারণত নিজ নিজ সীমায় স্থির থাকলেও দুর্দশায় তারা যেন অন্য বর্ণের লক্ষণ ধারণ করে। তবু নিজের অবস্থান-অনুযায়ী যে প্রধান লক্ষণ, সেটিই তার জন্য প্রকৃত মানদণ্ড। অতএব, সঞ্জয়, শাস্ত্রপ্রমাণ থেকে ‘আপদ্ধর্ম’—সংকটকালের কর্তব্য—এর সত্য স্বরূপ জেনে নাও।
Verse 4
लुप्तायां तु प्रकृती येन कर्म निष्पादयेत् तत् परीप्सेद् विहीन: । प्रकृतिस्थश्चापदि वर्तमान उभौ गह्याँ भवतः संजयैतौ,प्रकृति (जीविकाके साधन)-का सर्वथा लोप हो जानेपर जिस वृत्तिका आश्रय लेनेसे (जीवनकी रक्षा एवं) सत्कर्मोंका अनुष्ठान हो सके, जीविकाहीन पुरुष उसे अवश्य अपनानेकी इच्छा करे। संजय! जो प्रकृतिस्थ (स्वाभाविक स्थितिमें स्थित) होकर भी आपद्धर्मका आश्रय लेता है, वह (अपनी लोभवृत्तिके कारण) निन्दनीय होता है तथा जो आपत्तिग्रस्त होनेपर भी (उस समयके अनुरूप शास्त्रोक्त साधनको अपनाकर) जीविका नहीं चलाता है, वह (जीवन और कुटुम्बकी रक्षा न करनेके कारण) गर्हणीय होता है। इस प्रकार ये दोनों तरहके लोग निन्दाके पात्र होते हैं
যুধিষ্ঠির বললেন— জীবিকার উপায় সম্পূর্ণ লুপ্ত হলে, যে জীবিকা অবলম্বনে প্রাণরক্ষা হয় এবং সৎকর্মও সম্পন্ন করা যায়, সম্পদহীন মানুষের তা গ্রহণ করতে চাওয়া উচিত। কিন্তু, সঞ্জয়, দুই প্রকার লোক নিন্দনীয়— এক, যে স্বাভাবিক অবস্থায় থেকেও আপদ্ধর্মের আচরণ করে; আর এক, যে সত্যিই বিপন্ন হয়েও সেই সময়োপযোগী ধর্মসম্মত উপায়ে জীবনধারণ করে না। এই দুই চরম অবস্থাই নিন্দার যোগ্য।
Verse 5
अविनाशमिच्छतां ब्राह्मणानां प्रायश्षित्तं विहितं यद् विधात्रा । सम्पश्येथा: कर्मसु वर्तमानान् विकर्मस्थान् संजय गर्हयेस्त्वम्,सूत! (जीविकाका मुख्य साधन न होनेपर) ब्राह्मणोंका नाश न हो जाय, ऐसी इच्छा रखनेवाले विधाताने जो (उनके लिये अन्य वर्णोकी वृत्तिसे जीविका चलाकर अन्तमें) प्रायश्चित्त करनेका विधान किया है, उसपर दृष्टिपात करो। फिर यदि हम आपत्तिकालमें भी (स्वाभाविक) कर्मोमें ही लगे हों और आपत्तिकाल न होनेपर भी अपने वर्णके विपरीत कर्मोमें स्थित हो रहे हों तो उस दशामें हमें देखकर तुम (अवश्य) हमारी निन््दा करो
যুধিষ্ঠির বললেন— হে সূত! ব্রাহ্মণদের বিনাশ না হোক—এই কামনায় বিধাতা যে প্রায়শ্চিত্তের বিধান করেছেন, তা বিবেচনা করো। আর, সঞ্জয়, যদি আমরা বিপদের সময়ে নিজেদের স্বাভাবিক কর্মেই নিয়োজিত থাকি, কিন্তু বিপদ না থাকলে নিজেদের বর্ণবিরুদ্ধ কর্মে প্রতিষ্ঠিত হই—তবে আমাদের সেই অবস্থায় দেখে তুমি অবশ্যই আমাদের নিন্দা করবে।
Verse 6
मनीषिणां सत्त्वविच्छेदनाय विधीयते सत्सु वृत्ति: सदैव । अब्राह्मुणा: सन्ति तु ये न वैद्या: सर्वोत्सड्ूं साधु मन्येत तेभ्य:,मनीषी पुरुषोंको सत्त्व आदिके बन्धनसे मुक्त होनेके लिये सदा ही सत्पुरुषोंका आश्रय लेकर जीवन-निर्वाह करना चाहिये, यह उनके लिये शास्त्रीय विधान है। परंतु जो ब्राह्मण नहीं हैं तथा जिनकी ब्रह्मविद्यामें निष्ठा नहीं है, उन सबके लिये सबके समीप अपने धर्मके अनुसार ही जीविका चलानी चाहिये
যুধিষ্ঠির বললেন— জ্ঞানীদের জন্য সত্ত্বাদি আসক্তির বন্ধন ছিন্ন করতে শাস্ত্র নির্দেশ দেয় যে তারা সর্বদা সৎপুরুষের আশ্রয়ে জীবিকা নির্বাহ করবে। কিন্তু যারা ব্রাহ্মণ নয় এবং যারা বৈদিক জ্ঞানে নিষ্ঠ নয়, তাদের সকলের জন্যই উত্তম হলো—নিজ নিজ স্বধর্ম অনুসারে নিজের জীবিকা চালানো।
Verse 7
तदध्वान: पितरो ये च पूर्वे पितामहा ये च तेभ्य: परेडन्ये । यज्जैषिणो ये च हि कर्म कुर्यु- नन्न्यं ततो नास्तिको5स्मीति मन््ये,यज्ञकी इच्छा रखनेवाले मेरे पूर्व पिता-पितामह आदि तथा उनके भी पूर्वज उसी मार्गपर चलते रहे (जिसकी मैंने ऊपर चर्चा की है) तथा जो कर्म करते हैं, वे भी उसी मार्गसे चलते आये हैं। मैं भी नास्तिक नहीं हूँ, इसलिये उसी मार्गपर चलता हूँ; उसके सिवा दूसरे मार्गपर विश्वास नहीं रखता हूँ
যুধিষ্ঠির বললেন— সেই পথই আমার পূর্বপুরুষেরা—পিতা, পিতামহ এবং তাঁদেরও পূর্ববর্তী পূর্বজরা—অনুসরণ করেছেন। যাঁরা যজ্ঞফলের কামনা করেন এবং নির্ধারিত কর্ম সম্পাদন করেন, তাঁরাও বহু কাল ধরে সেই পথেই চলেছেন। আমি নাস্তিক নই; তাই আমি সেই পথই অবলম্বন করি, অন্য কোনো পথে বিশ্বাস রাখি না।
Verse 8
यत् किंचनेदं वित्तमस्यां पृथिव्यां यद् देवानां त्रिदशानां परं यत् । प्राजापत्यं त्रिदिवं ब्रह्म॒लोक॑ नाधर्मत: संजय कामयेयम्,संजय! इस धरातलपर जो कुछ भी धन-वैभव विद्यमान है, नित्य यौवनसे युक्त रहनेवाले देवताओंके यहाँ जो धनराशि है, उससे भी उत्कृष्ट जो प्रजापतिका धन है तथा जो स्वर्गलोक एवं ब्रह्मलोकका सम्पूर्ण वैभव है, वह सब मिल रहा हो, तो भी मैं उसे अधर्मसे लेना नहीं चाहूँगा
যুধিষ্ঠির বললেন—সঞ্জয়! এই পৃথিবীতে যা কিছু ধন-ঐশ্বর্য আছে, চিরযৌবনধারী ত্রিদশ দেবতাদের যে সম্পদ, তারও ঊর্ধ্বে প্রজাপতির যে রাজঐশ্বর্য, এবং স্বর্গলোক ও ব্রহ্মলোকের সমগ্র বিভব—এ সবই যদি আমার নাগালে আসে, তবু অধর্মের পথে তা লাভ করতে আমি কামনা করব না।
Verse 9
धर्मेश्चरः कुशलो नीतिमां श्चा- प्युपासिता ब्राह्मणानां मनीषी | नानाविधांश्रैव महाबलांश्र राजन्यभोजाननुशास्ति कृष्ण:
যুধিষ্ঠির বললেন—কৃষ্ণ ধর্মের অধীশ্বর, নীতি ও রাজকার্যে দক্ষ; তিনি মনীষী এবং ব্রাহ্মণদের সেবা-সম্মান করেন। তিনি নানা প্রকারের মহাবলী রাজন্য ও ভোজ শাসকদের শাসন-উপদেশ দেন, তাদের যথোচিত আচরণ ও সংযত শাসনের পথে পরিচালিত করেন।
Verse 10
यदि हाहं विसृजन् साम गहाों नियुध्यमानो यदि जहां स्वधर्मम् । महायशा: केशवस्तद् ब्रवीतु वासुदेवस्तूभयोरर्थकाम:
যুধিষ্ঠির বললেন—যদি আমি সাম-নীতি ত্যাগ করে ভয়ংকর যুদ্ধে প্রবৃত্ত হই এবং তাতে নিজের স্বধর্ম পরিত্যাগ করি, তবে মহাযশস্বী কেশব আমাকে সত্য পথ বলে দিন। বাসুদেব তো উভয় পক্ষেরই মঙ্গল কামনা করেন; তিনিই আমাদের কল্যাণের পথ ঘোষণা করুন।
Verse 11
यहाँ धर्मके स्वामी, कुशल नीतिज्ञ, ब्राह्मणभक्त और मनीषी भगवान् श्रीकृष्ण बैठे हैं, जो नाना प्रकारके महान् बलशाली क्षत्रियों तथा भोजवंशियोंका शासन करते हैं। यदि मैं सामनीति अथवा संधिका परित्याग करके निन्दाका पात्र होता होऊँ या युद्धके लिये उद्यत होकर अपने धर्मका उल्लंघन करता होऊँ तो ये महायशस्वी वसुदेवनन्दन भगवान् श्रीकृष्ण अपने विचार प्रकट करें; क्योंकि ये दोनों पक्षोंका हित चाहनेवाले हैं ।। शैनेयो<यं चेदयश्नान्धकाश्न वार्ष्णेयभोजा: कुकुरा: सृंजयाश्न । उपासीना वासुदेवस्य बुद्धि निगृहा शत्रून् सुहदो नन्दयन्ति,ये सात्यकि, ये चेदिदेशके लोग, ये अन्धक, वृष्णि, भोज, कुकुर तथा सूंजयवंशके क्षत्रिय इन्हीं भगवान् वासुदेवकी सलाहसे चलकर अपने शत्रुओंको बंदी बनाते और सुहृदोंको आनन्दित करते हैं
যুধিষ্ঠির বললেন—এখানেই ধর্মের অধীশ্বর, নীতিতে দক্ষ, ব্রাহ্মণভক্ত ও মনীষী ভগবান শ্রীকৃষ্ণ আসীন আছেন; তিনি নানা প্রকারের মহাবলী ক্ষত্রিয় ও ভোজবংশীয়দের শাসন ও পথপ্রদর্শন করেন। যদি আমি সাম-নীতি বা সন্ধির পথ ত্যাগ করে নিন্দার পাত্র হই, অথবা যুদ্ধের উদ্যমে নিজের ধর্ম লঙ্ঘন করি, তবে মহাযশস্বী বসুদেবনন্দন শ্রীকৃষ্ণ তাঁর মত প্রকাশ করুন; কারণ তিনি উভয় পক্ষেরই মঙ্গল চান। শৈনেয় (সাত্যকি), চেদি, অন্ধক, বৃষ্ণি, ভোজ, কুকুর ও সৃঞ্জয়—এরা সকলেই বাসুদেবের বুদ্ধি অনুসারে চলেই শত্রুদের দমন করে এবং সুহৃদদের আনন্দিত করে।
Verse 12
वृष्ण्यन्धका हाग्रसेनादयो वै कृष्णप्रणीता: सर्व एवेन्द्रकल्पा: । मनस्विन: सत्यपरायणाश्ष॒ महाबला यादवा भोगवन्त:,श्रीकृष्णकी बतायी हुई नीतिके अनुसार बर्ताव करनेसे वृष्णि और अन्धकवंशके सभी उमग्रसेन आदि क्षत्रिय इन्द्रके समान शक्तिशाली हो गये हैं तथा सभी यादव मनस्वी, सत्यपरायण, महान् बलशाली और भोगसामग्रीसे सम्पन्न हुए हैं
যুধিষ্ঠির বললেন—কৃষ্ণের নির্দেশিত নীতির অনুসরণে বৃষ্ণি ও অন্ধকবংশের অগ্রসেন প্রভৃতি সকলেই পরাক্রমে ইন্দ্রসম হয়ে উঠেছে। যাদবরা মনস্বী, সত্যপরায়ণ, মহাবলী এবং ভোগসামগ্রীতে সমৃদ্ধ হয়েছে।
Verse 13
काश्यो बश्रु: श्रियमुत्तमां गतो लब्ध्वा कृष्णं भ्रातरमीशितारम् । यस्मै कामान् वर्षति वासुदेवो ग्रीष्मात्यये मेघ इव प्रजाभ्य:,(पौण्ड्रक वासुदेवके छोटे भाई) काशीनरेश बश्रु श्रीकृष्णको ही शासक बन्धुके रूपमें पाकर उत्तम राज्यलक्ष्मीके अधिकारी हुए हैं। भगवान् श्रीकृष्ण बभ्रुके लिये समस्त मनोवांछित भोगोंकी वर्षा उसी प्रकार करते हैं, जैसे वर्षाकालमें मेघ प्रजाओंके लिये जलकी वृष्टि करता है
যুধিষ্ঠির বললেন—কাশীর বভ্রু সর্বোচ্চ রাজলক্ষ্মী লাভ করেছেন, কারণ তিনি তাঁর ভ্রাতা ও অধিপতি-রক্ষক কৃষ্ণকে পেয়েছেন। বাসুদেব তাঁর জন্য সকল কাম্য ভোগ বর্ষণ করেন, যেমন গ্রীষ্মের শেষে মেঘ প্রজাদের জন্য বৃষ্টি ঢালে।
Verse 14
ईदृशो<यं केशवस्तात विद्वान् विद्धि होन॑ कर्मणां निश्चयज्ञम् । प्रियश्ष नः साधुतमश्च कृष्णो नातिक्रामे वचनं केशवस्य,तात संजय! तुम्हें मालूम होना चाहिये कि भगवान् श्रीकृष्ण ऐसे प्रभावशाली और विद्वान हैं। ये प्रत्येक कर्मका अन्तिम परिणाम जानते हैं। ये हमारे सबसे बढ़कर प्रिय तथा श्रेष्ठतम पुरुष हैं। मैं इनकी आज्ञाका उल्लंघन नहीं कर सकता
যুধিষ্ঠির বললেন—প্রিয়জন, জেনে রেখো, কেশব কৃষ্ণ এমনই প্রভাবশালী ও সত্যজ্ঞানী; তিনি কর্মের চূড়ান্ত পরিণাম ও নিশ্চিত সিদ্ধান্ত জানেন। কৃষ্ণ আমাদের সর্বাধিক প্রিয় এবং পুরুষদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ; কেশবের বাক্য আমি লঙ্ঘন করতে পারি না।
Verse 28
इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि सञ्जययानपर्वणि युधिष्ठटिरवाक्ये अष्टाविंशो5 ध्याय:,इस प्रकार श्रीमह्ााभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत संजययानपर्वमें युधिष्ठिरवचनसम्बन्धी अद्वाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ
এইভাবে শ্রীমহাভারতের উদ্যোগপর্বের অন্তর্গত সঞ্জয়ায়ন অংশে যুধিষ্ঠিরের বাক্য-সম্পর্কিত অষ্টাবিংশ অধ্যায় সমাপ্ত হল।
Whether to pursue a coercive resolution (conflict) for political ends despite foreseeable irreversible losses, versus choosing restraint grounded in dharma and long-term welfare.
Desire and anger are binding forces that obstruct dharma; since karmic results persist and life is impermanent, disciplined restraint and righteous conduct are presented as superior to short-term gains secured through harmful means.
No explicit phalaśruti formula appears; instead, the chapter embeds a doctrinal meta-claim that karma does not perish and follows the agent, functioning as the chapter’s internal rationale for ethical restraint.