
अध्याय 24 — संजयस्य शमोपदेशः (Sanjaya’s Counsel Toward Conciliation)
Upa-parva: Sanjaya–Dhritarashtra Samvada (Court Reportage and Counsel) — Udyoga Parva Context
Chapter 24.0 presents Sañjaya addressing Ajātaśatru (Yudhiṣṭhira) in a tone of calibrated reassurance and warning. He acknowledges Yudhiṣṭhira’s proper inquiry into the welfare (anāmaya) of the Kuru elders and notable persons, while noting that within Dhārtarāṣṭra’s circle there exist both venerable virtuous elders and also unethical actors. Sañjaya argues that Dhṛtarāṣṭra would not be expected to violate inherited rights and social obligations—invoking the gravity of betraying allies and the moral weight assigned by brāhmaṇa counsel to ‘mitra-droha’ (treachery toward friends). He then recalls the remembered martial reputation of the Pāṇḍavas—Bhīmasena’s battlefield presence and the Mādrī-sutas’ (Nakula and Sahadeva) relentless archery—signaling deterrent capacity without overt provocation. Sañjaya concludes with epistemic humility about foreknowing outcomes, urging Yudhiṣṭhira to deliberate with intelligence and pursue śama so that Dhārtarāṣṭras, Pāṇḍavas, Sṛñjayas, and allied kings may attain stability and relief. The chapter ends by introducing that Dhṛtarāṣṭra conveyed a night-time message to Yudhiṣṭhira, to be heard in sequence.
Chapter Arc: संजय, धृतराष्ट्र का संदेश लेकर पाण्डव-सभा में प्रवेश करता है और युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल-सहदेव, कृष्ण, सात्यकि, चेकितान, विराट, धृष्टद्युम्न तथा पाञ्चाल-वीरों को संबोधित कर अपनी वाणी सुनाने की अनुमति माँगता है। → वह पाण्डवों की शक्ति और धर्मनिष्ठा को स्वीकारते हुए भी उन्हें युद्ध की भयावहता का स्मरण कराता है—कुरु-पक्ष के पास भीष्म-द्रोण-कृप-शल्य-अश्वत्थामा और कर्ण सहित अपार बल है; ऐसे में विजय-पराजय दोनों ही ओर ‘निःश्रेयस’ (परम कल्याण) स्पष्ट नहीं दिखता। → संजय हाथ जोड़कर शरणागत-भाव से निवेदन करता है कि कुरु और सृंजय—दोनों का स्वस्ति-कल्याण कैसे हो; वह संकेत देता है कि ज्ञातिवध में जीवन भी मृत्यु के समान हो जाता है, इसलिए निर्णय ऐसा हो जो कुल-क्षय से बचाए। → वह अपनी ओर से शांति के लिए प्रार्थना करता है और बताता है कि भीष्म-प्रधान धृतराष्ट्र-पक्ष की सम्मति में भी यहाँ शांति ही उत्तम है—अर्थात् युद्ध नहीं, समझौता ही श्रेयस्कर। → संजय की विनयपूर्ण वाणी के बाद अब प्रश्न यह रह जाता है कि युधिष्ठिर और कृष्ण इस संदेश को किस रूप में ग्रहण करेंगे—क्या शांति का मार्ग खुलेगा या युद्ध की अनिवार्यता और निकट आएगी।
Verse 1
भीस्न्म+ज () अमान पञ्चविशो< ध्याय: संजयका युधिष्ठिरको धृतराष्ट्रका संदेश सुनाना एवं अपनी ओरसे भी शान्तिके लिये प्रार्थना करना युधिछिर उवाच समागता: पाण्डवा: सूंजयाश्न जनार्दनो युयुधानो विराट: । यत् ते वाक्यं धृतराष्ट्रानुशिष्टं गावल्गणे ब्रूहि तत् सूतपुत्र,युधिष्ठिर बोले--गवल्गणकुमार सूतपुत्र संजय! यहाँ पाण्डव, सूंजय, भगवान् श्रीकृष्ण, सात्यकि तथा राजा विराट--सब एकत्र हुए हैं। राजा धृतराष्ट्रने तुम्हारे द्वारा जो संदेश भेजा है, उसे कहो
যুধিষ্ঠির বললেন—গাবল্গণের পুত্র, সূতপুত্র সঞ্জয়! এখানে পাণ্ডবগণ, সৃঞ্জয়গণ, জনার্দন (শ্রীকৃষ্ণ), যুযুধান (সাত্যকি) এবং রাজা বিরাট—সকলেই সমবেত। ধৃতরাষ্ট্র যে বার্তা তোমাকে দিয়ে পাঠিয়েছেন, তা বলো।
Verse 2
संजय उवाच अजातशत्रुं च वृकोदरं च धनंजयं माद्रवतीसुतौ च । आमन्त्रये वासुदेवं च शौरिं युयुधानं चेकितानं विराटम्,संजय बोला--मैं अजातशत्रु युधिष्ठिर, भीमसेन, अर्जुन, नकुल, सहदेव, भगवान् श्रीकृष्ण, सात्यकि, चेकितान, विराट, पांचालदेशके बूढ़े नरेश द्रुपद तथा उनके पुत्र पृषतवंशी धृष्टद्युम्नको भी आमन्त्रित करता हूँ। मैं कौरवोंकी भलाई चाहता हुआ जो कुछ कह रहा हूँ, मेरी उस वाणीको आप सब लोग सुनें
সঞ্জয় বললেন—আমি অজাতশত্রু যুধিষ্ঠির, বৃকোদর ভীম, ধনঞ্জয় অর্জুন এবং মাদ্রীর দুই পুত্র নকুল-সহদেবকে আহ্বান করছি। তদুপরি বাসুদেব শৌরি শ্রীকৃষ্ণ, যুযুধান সাত্যকি, চেকিতান ও বিরাটকেও ডেকে পাঠাচ্ছি। কৌরবদের মঙ্গল কামনা করে যে কথা বলছি, আপনারা সকলে তা শ্রবণ করুন।
Verse 3
पज्चालानामधिपं चैव वृद्ध धृष्टय्युम्नं पार्षत॑ याज्ञसेनिम् । सर्वे वाच॑ शृणुतेमां मदीयां वक्ष्यामि यां भूतिमिच्छन् कुरूणाम्,संजय बोला--मैं अजातशत्रु युधिष्ठिर, भीमसेन, अर्जुन, नकुल, सहदेव, भगवान् श्रीकृष्ण, सात्यकि, चेकितान, विराट, पांचालदेशके बूढ़े नरेश द्रुपद तथा उनके पुत्र पृषतवंशी धृष्टद्युम्नको भी आमन्त्रित करता हूँ। मैं कौरवोंकी भलाई चाहता हुआ जो कुछ कह रहा हूँ, मेरी उस वाणीको आप सब लोग सुनें
সঞ্জয় বললেন—পাঞ্চালদের বৃদ্ধ অধিপতি দ্রুপদ এবং তাঁর পুত্র পার্ষত ধৃষ্টদ্যুম্ন (যাজ্ঞসেনি)কেও আমি আহ্বান করছি। তোমরা সকলে আমার কথা শোনো; কুরুদের মঙ্গল ও সমৃদ্ধি কামনা করে আমি যা বলব, তাই বলব।
Verse 4
शमं राजा धृतराष्ट्रोडभिनन्द- न्नयोजयत् त्वरमाणो रथं मे । सभ्रातृपुत्रस्वजनस्य राज्ञ- स्तद् रोचतां पाण्डवानां शमो<स्तु,राजा धृतराष्ट्र शान्तिका आदर करते हैं (युद्ध नहीं चाहते)। उन्होंने बड़ी उतावलीके साथ मेरे लिये शीघ्रतापूर्वक रथ तैयार कराया और मुझे यहाँ भेजा। मैं चाहता हूँ कि भाई, पुत्र तथा स्वजनोंसहित राजा धृतराष्ट्रका यह शान्तिसंदेश पाण्डवोंको रुचिकर प्रतीत हो और दोनों पक्षोंमें सन्धि स्थापित हो जाय
সঞ্জয় বললেন—রাজা ধৃতরাষ্ট্র শান্তির পথকে অনুমোদন করে ত্বরিতভাবে আমার জন্য রথ প্রস্তুত করিয়ে আমাকে পাঠিয়েছেন। ভ্রাতা, পুত্র ও স্বজনসহ রাজার এই সন্ধি-বার্তা পাণ্ডবদের প্রিয় হোক; উভয় পক্ষের মধ্যে শান্তি প্রতিষ্ঠিত হোক।
Verse 5
सर्वर्धर्म: समुपेतास्तु पार्था: संस्थानेन मार्दवेनार्जवेन । जाता: कुले हानृशंसा वदान्या ह्लीनिषेवा: कर्मणां निश्चयज्ञा:,! | शत ! 34८ 222. हे 25%-फलफान-- हा" कुन्तीके पुत्रो! आपलोग अपने दिव्य शरीर, दयालु एवं कोमल स्वभाव और सरलता आदि गुणों तथा सम्पूर्ण धर्मोंसे युक्त हैं। आपलोगोंका उत्तम कुलमें जन्म हुआ है। आपलोगोंमें क्रूरताका सर्वधा अभाव है। आपलोग उदार, लज्जाशील और कर्मोंके परिणामको जाननेवाले हैं
সঞ্জয় বললেন—হে পৃথার পুত্রগণ! তোমরা উত্তম মর্যাদা, কোমলতা ও সরলতার সঙ্গে সর্বধর্মে সমৃদ্ধ। শ্রেষ্ঠ কুলে জন্ম; তোমাদের মধ্যে নিষ্ঠুরতার লেশমাত্র নেই। তোমরা দানশীল, লজ্জাশীল এবং কর্মের ফল ও যথাযথ সিদ্ধান্তের জ্ঞানী।
Verse 6
न युज्यते कर्म युष्मासु हीन॑ सत्त्वं हि वस्तादृशं भीमसेना: । उद्धासते हाञ्जनबिन्दुवत् त- च्छुश्रे वस्त्रे यद् भवेत् किल्बिषं व:,भयंकर सैन्यसंग्रह करनेवाले पाण्डवो! आपलोगोंमें ऐसा सत्त्वगुण भरा है कि आपके द्वारा कोई नीच कर्म बन ही नहीं सकता। यदि आपलोगोंमें कोई दोष होता तो वह सफेद वस्त्रमें काले दागकी भाँति चमक उठता (छिप नहीं सकता)
সঞ্জয় বললেন—হে ভীমসেনগণ! তোমাদের মধ্যে এমন সত্ত্ব আছে যে নীচ কর্ম তোমাদের সঙ্গে যুক্ত হতে পারে না। যদি তোমাদের কোনো দোষ থাকত, তবে তা শ্বেত বস্ত্রে কাজলের কালো বিন্দুর মতো স্পষ্ট হয়ে উঠত—গোপন থাকতে পারত না।
Verse 7
सर्वक्षयो दृश्यते यत्र कृत्स्न: पापोदयो निरयो5भावसंस्थ: । कस्तत् कुर्याज्जातु कर्म प्रजानन् पराजयो यत्र समो जयश्नल,जिसमें सबका विनाश दिखायी देता है, जिससे पूर्णतः पापका उदय होता है, जो नरकका हेतु है, जिसके अन्तमें अभाव ही हाथ लगता है और जिसमें जय तथा पराजय दोनों समान हैं, उस युद्ध-जैसे कठोर कर्मके लिये कौन समझदार मनुष्य कभी उद्योग करेगा?
যেখানে সর্বনাশ স্পষ্ট দেখা যায়, যেখানে পাপ সম্পূর্ণরূপে জেগে ওঠে, যার পরিণাম নরক, যার শেষে থাকে কেবল শূন্যতা ও ক্ষয়—আর যেখানে জয় ও পরাজয় সমান—সে রকম যুদ্ধসম কঠোর কর্ম জেনে-বুঝে কোন জ্ঞানী কখনও গ্রহণ করবে?
Verse 8
ते वै धन्या यै: कृतं ज्ञातिकार्य ते वै पुत्रा: सुह्ददो बान्धवाश्व । उपक्रुष्टं जीवितं संत्यजेयु- रत: कुरूणां नियतो वैभव: स्यात्,जिन्होंने जाति और कुटुम्बके हितकर कार्योका साधन किया है, वे धन्य हैं। वे ही पुत्र, मित्र तथा बान्धव कहलानेयोग्य हैं। कौरवोंको चाहिये कि वे निन्दित जीवनका परित्याग कर दें, जिससे कौरवकुलका अभ्युदय अवश्यम्भावी हो
যাঁরা স্বজনদের জন্য যা করণীয় ছিল তা সম্পন্ন করেছেন, তাঁরাই সত্যিই ধন্য; তাঁরাই পুত্র, সুহৃদ ও আত্মীয় নামে অভিহিত হওয়ার যোগ্য। কৌরবরা নিন্দিত হয়ে ওঠা জীবন ত্যাগ করুক; তবেই কুরুবংশের ঐশ্বর্য ও উন্নতি নিশ্চিত হবে।
Verse 9
ते चेत् कुरूननुशिष्याथ पार्था निर्णीय सर्वान् द्विषतो निगृहा | सम॑ वस्तज्जीवितं मृत्युना स्याद् यज्जीवध्वं ज्ञातिवधे न साधु,कुन्तीकुमारो! यदि आपलोग समस्त कौरवोंको निश्चित रूपसे अपना शत्रु मानकर उन्हें दण्ड देंगे, कैद करेंगे अथवा उनका वध कर डालेंगे तो उस दशामें आपका जो जीवन होगा, वह आपके द्वारा कुट॒म्बीजनोंका वध होनेके कारण अच्छा नहीं समझा जायगा। वह निन्दित जीवन तो मृत्युके समान ही होगा
হে পৃথাপুত্রগণ! যদি তোমরা কৌরবদের সকলকে শত্রু বলে স্থির করে তাদের দমন কর—বেঁধে রাখ, কারাগারে নিক্ষেপ কর, কিংবা হত্যা কর—তবে তার পরে যে জীবন তোমাদের থাকবে, তা মৃত্যুরই সমান হবে। কারণ স্বজনবধের পর বেঁচে থাকা শুভ বলে গণ্য হয় না; সে জীবন নিন্দিত।
Verse 10
को होव युष्मान् सह केशवेन सचेकितानान् पार्षतबाहुगुप्तान् । ससात्यकीन् विषद्ठेत प्रजेतुं लब्ध्वापि देवान् सचिवान् सहेन्द्रान्,भगवान् श्रीकृष्ण, चेकितान और सात्यकि आपलोगोंके सहायक हैं। आपलोग महाराज ट्रुपदके बाहुबलसे सुरक्षित हैं। ऐसी दशामें इन्द्रसहित समस्त देवताओंको अपने सहायकके रूपमें पाकर भी कौन ऐसा मनुष्य होगा, जो आपलोगोंको जीतनेका साहस करेगा?
কেশব তোমাদের সঙ্গে আছেন; চেকিতান ও সাত্যকি সহায়; আর পার্ষত (দ্রুপদ)-এর বাহুবলে তোমরা সুরক্ষিত। এমন অবস্থায় ইন্দ্রসহ সকল দেবতাকে সহায় হিসেবে পেলেও কোন মানুষ তোমাদের জয় করার সাহস করবে?
Verse 11
को वा कुरून् द्रोणभीष्माभिगुप्ता- नश्वृत्थाम्ना शल्यकृपादिभिश्न । रणे विजेतुं विषहेत राजन् राधेयगुप्तान् सह भूमिपालै:,राजन! इसी प्रकार द्रोणाचार्य, भीष्म, अश्वत्थामा, शल्य, कृपाचार्य आदि वीरों तथा अन्य राजाओंसहित कर्णके द्वारा सुरक्षित कौरवोंको युद्धमें जीतननेका साहस कौन कर सकता है?
রাজন! দ্রোণ ও ভীষ্মের রক্ষায়, অশ্বত্থামা, শল্য, কৃপ প্রভৃতি বীরদের সহায়তায়, এবং বহু ভূমিপালের সঙ্গে রাধেয় (কর্ণ)-এর প্রহরায় থাকা কৌরবদের রণে জয় করার সাহস কার হতে পারে?
Verse 12
महद् बल धार्तराष्ट्रस्य राज्ञ: को वै शक्तो हन्तुमक्षीयमाण: । सो<हं जये चैव पराजये च निः:श्रेयसं नाधिगच्छामि किज्चित्,राजा दुर्योधनके पास विशाल वाहिनी एकत्र हो गयी है। कौन ऐसा वीर है जो स्वयं क्षीण न होकर उस सेनाका विनाश कर सके? मैं तो इस युद्धमें किसी भी पक्षकी जय हो या पराजय, कोई कल्याणकी बात नहीं देखता हूँ
সঞ্জয় বললেন—ধৃতরাষ্ট্রের পক্ষের শক্তি অতি মহৎ। কে এমন বীর, যে নিজে ক্ষয় না হয়ে সেই সেনাকে ধ্বংস করতে পারে? আর আমার দৃষ্টিতে এই যুদ্ধে জয় হোক বা পরাজয়—কোনো নিত্যকল্যাণ, কোনো পরম মঙ্গলই জন্মায় না।
Verse 13
कथं हि नीचा इव दौष्कुलेया निर्धर्मार्थ कर्म कुर्युश्न पार्था: । सोऊहं प्रसाद्य प्रणतो वासुदेवं पज्चालानामधिपं चैव वृद्धम्,भला! दुन्तीके पुत्र नीच कुलमें उत्पन्न हुए दूसरे अधम मनुष्योंके समान ऐसा (निन्दित) कर्म कैसे कर सकते हैं? जिससे न तो धर्मकी सिद्धि होनेवाली है और न अर्थकी ही। यहाँ भगवान् श्रीकृष्ण हैं तथा वृद्ध पांचालराज ट्रपद भी उपस्थित हैं। मैं इन सबको प्रणाम करके प्रसन्न करना चाहता हूँ, हाथ जोड़कर आपलोगोंकी शरणमें आया हूँ। आप स्वयं विचार करें कि कुरु तथा सूंजय-वंशका कल्याण कैसे हो? मुझे विश्वास है कि भगवान् श्रीकृष्ण अथवा अर्जुन इस प्रकार प्रार्थनापूर्वक कही हुई मेरी किसी भी बातको ठुकरा नहीं सकते
সঞ্জয় বললেন—পৃথার পুত্রেরা কীভাবে নীচকুলজাত অধম লোকদের মতো এমন কর্ম করতে পারে, যাতে না ধর্ম সিদ্ধ হয়, না সত্য লাভ? এখানে ভগবান বাসুদেব আছেন, আর পাঞ্চালদের বৃদ্ধ অধিপতিও আছেন। আমি প্রণাম করে তাঁদের প্রসন্নতা কামনা করি।
Verse 14
कृताञ्जलि: शरणं व: प्रपद्ये कथं स्वस्ति स्यात् कुरुसृंजयानाम् । न होवमेवं वचन वासुदेवो धनंजयो वा जातु किंचिन्न कुर्यात्,भला! दुन्तीके पुत्र नीच कुलमें उत्पन्न हुए दूसरे अधम मनुष्योंके समान ऐसा (निन्दित) कर्म कैसे कर सकते हैं? जिससे न तो धर्मकी सिद्धि होनेवाली है और न अर्थकी ही। यहाँ भगवान् श्रीकृष्ण हैं तथा वृद्ध पांचालराज ट्रपद भी उपस्थित हैं। मैं इन सबको प्रणाम करके प्रसन्न करना चाहता हूँ, हाथ जोड़कर आपलोगोंकी शरणमें आया हूँ। आप स्वयं विचार करें कि कुरु तथा सूंजय-वंशका कल्याण कैसे हो? मुझे विश्वास है कि भगवान् श्रीकृष्ण अथवा अर्जुन इस प्रकार प्रार्थनापूर्वक कही हुई मेरी किसी भी बातको ठुकरा नहीं सकते
সঞ্জয় বললেন—করজোড়ে আমি আপনাদের শরণ নিচ্ছি। কুরু ও সৃঞ্জয়দের মঙ্গল কীভাবে সাধিত হবে—তা ভেবে দেখুন। এমন বিনীত প্রার্থনায় বাসুদেব বা ধনঞ্জয় কখনোই কর্মে প্রবৃত্ত হতে অস্বীকার করবেন না।
Verse 15
प्राणान् दद्याद् याचमान: कुतो<न्य- देतद् विद्वन् साधनार्थ ब्रवीमि । एतद् राज्ञो भीष्मपुरोगमस्य मतं यद् वः शान्तिरिहोत्तमा स्थात्,इतना ही नहीं, मेरे माँगनेपर अर्जुन अपने प्राणतक दे सकते हैं, फिर दूसरी किसी वस्तुके लिये तो कहना ही क्या है? विद्वान् राजा युधिष्ठिर! मैं संधि-कार्यकी सिद्धिके लिये ही यह सब कह रहा हूँ। भीष्म तथा राजा धृतराष्ट्रको भी यही अभिमत है और इसीसे आप सब लोगोंको उत्तम शान्ति प्राप्त हो सकती है
সঞ্জয় বললেন—আমি চাইলে সে প্রাণ পর্যন্ত দেবে; অন্য কিছুর কথা আর কী! হে বিদ্বান রাজা যুধিষ্ঠির, আমি এ কথা বলছি কেবল সন্ধি-সাধনের জন্য। ভীষ্মকে অগ্রে রেখে রাজা ধৃতরাষ্ট্রেরও এই মত—এই পথেই তোমাদের সকলের জন্য এখানে সর্বোত্তম শান্তি স্থাপিত হোক।
Verse 25
इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि संजययानपर्वणि संजयवाक्ये पठचविंशो5ध्याय: ।। २५ || इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत यंजययानपर्वमें संजयवाक्यविषयक पचीसवाँ अध्याय पूरा हुआ
এইভাবে শ্রীমহাভারতের উদ্যোগপর্বের অন্তর্গত ‘সঞ্জয়যান’ পর্বে সঞ্জয়ের বাক্যবিষয়ক পঁচিশতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।
The dilemma is whether to continue principled restraint and seek peace despite provocation, or to treat hostile conduct as grounds for escalation—balancing justice, social order, and foreseeable harm.
Deliberate with prājñā, prioritize śama where it can secure collective welfare, and treat betrayal of trust (mitra-droha) as a severe ethical boundary that destabilizes polity and legitimacy.
No explicit phalaśruti appears in these verses; the chapter’s meta-function is transitional—framing ethical evaluation and introducing Dhṛtarāṣṭra’s forthcoming message as part of the narrative sequence.