Adhyaya 184
Udyoga ParvaAdhyaya 18442 Versesनिर्णायक वध की ओर बढ़ता संग्राम दैवी निषेध से ‘युद्धनिवृत्ति’ की ओर मुड़ता है, पर परशुराम की प्रतिज्ञा तनाव बनाए रखती है।

Adhyaya 184

Bhīṣma’s Dream-Counsel and the Prasvāpa Astra (भीष्मस्वप्नदर्शनम् / प्रस्वापास्त्रोपदेशः)

Upa-parva: Bhīṣma–Jāmadagnya (Paraśurāma) Saṃvāda / Anusmṛti Episode (Udyoga-parva embedded narration)

Bhīṣma addresses the king (rājendra) and narrates a nocturnal interval during an arduous engagement with Jāmadagnya. After prostrating mentally and ritually to brāhmaṇas, ancestors, and deities, he lies down wounded by arrows and reflects on the severity of the ongoing struggle and his inability to decisively overcome the formidable opponent in direct combat. He prays for a favorable sign if victory is possible. In a dream-vision, eight radiant brāhmaṇa-like figures appear, lift and reassure him, and deliver directive counsel: he should not fear; Jāmadagnya will not be the victor; Bhīṣma is destined to prevail. They instruct him to recollect and deploy a beloved, previously known weapon—identified as the Prajāpatya, Viśvakṛt, named Prasvāpa—described as rare or unknown even to Rāma (Paraśurāma) and others. The counsel emphasizes that the weapon will not bring about the opponent’s destruction; rather, it will induce sleep under the pressure of Bhīṣma’s arrows, after which Bhīṣma should awaken and restore him using another favored means of ‘saṃbodhana’ (rousing). The figures then vanish, leaving an operational plan that privileges neutralization and controlled restoration over lethal finality.

Chapter Arc: भीष्म-परशुराम संग्राम के बीच भीष्म धनुष पर ‘प्रस्वापन’ (निद्रास्त्र) चढ़ाते हैं—पर उसी क्षण आकाश में देवगण प्रकट होकर उन्हें रोकते हैं, मानो युद्ध के ऊपर स्वयं धर्म का हाथ उतर आया हो। → नारद, पितर और देवता—सब एक स्वर में चेताते हैं कि यह अस्त्र इस प्रसंग में अकार्य है; भीष्म के भीतर प्रतिज्ञा-धर्म (युद्ध से न हटने का संकल्प) और लोक-धर्म (देवाज्ञा का मान) टकराते हैं। परशुराम भी पीछे हटने को तैयार नहीं; दोनों महावीरों की जिद़ से विनाश की छाया गहराती है। → देवताओं के निषेध के बाद भीष्म ‘प्रस्वापनास्त्र’ को वापस खींच लेते हैं और उसके स्थान पर ब्रह्मास्त्र का तेज प्रज्वलित करते हैं—यही क्षण बताता है कि वे देववाणी का उल्लंघन नहीं करेंगे, पर रण-धर्म से भी विमुख नहीं होंगे। → गंगा, पितर और देवता परशुराम को समझाते हैं कि भीष्म साधारण मनुष्य नहीं—वसु-स्वरूप हैं; उन्हें जीतना असंभव है। यह उपदेश युद्ध की आग को शमन की ओर मोड़ता है और ‘युद्धनिवृत्ति’ का मार्ग खुलता है। → परशुराम का अडिग वचन—‘मैं इस युद्ध से किसी प्रकार नहीं हटूँगा’—शांति के प्रयासों पर प्रश्नचिह्न छोड़ देता है: क्या देववाणी भी एक प्रतिज्ञाधारी ऋषि को रोक पाएगी?

Shlokas

Verse 1

अत-४-शक+ पज्चाशीर्त्याधिकशततमो< ध्याय: देवताओंके मना करनेसे भीष्मका प्रस्वापनास्त्रको प्रयोगमें न लाना तथा पितर

ভীষ্ম বললেন—হে রাজন, কৌরবনন্দন! তখন আকাশে মহা কোলাহল উঠল—“ভীষ্ম! প্রস্বাপন (নিদ্রাজনক) অস্ত্র নিক্ষেপ কোরো না।”

Verse 2

अयुगञ्जमेव चैवाहं तदस्त्र॑ भृगुनन्दने । प्रस्वापं मां प्रयुझजानं नारदो वाक्यमब्रवीत्‌

তবু ভৃগুনন্দন পরশুরামকে লক্ষ্য করে আমি সেই অস্ত্র ধনুকে আরোপ করলাম। আমাকে প্রস্বাপনাস্ত্র প্রয়োগ করতে উদ্যত দেখে নারদ এই কথা বললেন।

Verse 3

एते वियति कौरव्य दिवि देवगणा: स्थिता: । ते त्वां निवारयन्त्यद्य प्रस्वापं मा प्रयोजय

হে কৌরব্য! আকাশে স্বর্গলোকে দেবগণ দাঁড়িয়ে আছেন। তাঁরা আজ তোমাকে নিবৃত্ত করছেন—“প্রস্বাপনাস্ত্র প্রয়োগ কোরো না।”

Verse 4

रामस्तपस्वी ब्रह्मण्यो ब्राह्मणश्न गुरुश्न ते । तस्यावमानं कौरव्य मा सम कार्षी: कथंचन

রাম (পরশুরাম) তপস্বী, ব্রাহ্মণভক্ত ও ব্রহ্মনিষ্ঠ; তিনি ব্রাহ্মণ এবং তোমার গুরু। হে কৌরব্য! কোনোভাবেই তাঁর অবমাননা কোরো না।

Verse 5

ततो<पश्यं दिविष्ठान्‌ वै तानष्टौ ब्रह्म॒वादिन: । ते मां स्मयन्तो राजेन्द्र शनकैरिदमन्रुवन्‌

হে রাজেন্দ্র! তখন আমি আকাশে প্রতিষ্ঠিত সেই আট ব্রহ্মবাদী বসুকে দেখলাম। তাঁরা মৃদু হাসিতে ধীরে ধীরে আমাকে এভাবে বললেন।

Verse 6

यथा55ह भरतश्रेष्ठ नारदस्तत्‌ तथा कुरु । एतद्धि परमं श्रेयो लोकानां भरतर्षभ,“भरतश्रेष्ठ! नारदजी जैसा कहते हैं, वैसा करो। भरतकुलतिलक! यही सम्पूर्ण जगत्‌के लिये परम कल्याणकारी होगा'

হে ভরতশ্রেষ্ঠ! নারদ যেমন বলেছেন, তেমনই করো। হে ভরতবংশের বৃষভ! এটাই সকল লোকের পরম মঙ্গল।

Verse 7

ततश्च प्रतिसंहृत्य तदस्त्रं स्वापनं महत्‌ | ब्रह्मास्त्रं दीपयांचक्रे तस्मिन्‌ युधि यथाविधि

তারপর সেই মহা নিদ্রাজনক অস্ত্রটি প্রত্যাহার করে, যুদ্ধবিধি অনুসারে, সেই সমরে আমি ব্রহ্মাস্ত্রকে প্রজ্বলিত করলাম।

Verse 8

ततो रामो हृषितो राजसिंह दृष्टवा तदस्त्रं विनिवर्तितं वै । जितो<स्मि भीष्मेण सुमन्दबुद्धि- रित्येव वाक्यं सहसा व्यमुड्चत्‌

হে রাজসিংহ! সেই অস্ত্র প্রত্যাবর্তিত দেখে রাম (পরশুরাম) অত্যন্ত হৃষ্ট হলেন এবং সহসাই বললেন—“আমি, মন্দবুদ্ধি, ভীষ্মের দ্বারা পরাজিত হলাম।”

Verse 9

ततो<पश्यत्‌ पितरं जामदग्न्यः पितुस्तथा पितरं चास्य मान्यम्‌ | ते तत्र चैनं परिवार्य तस्थु- रूचुश्नैनं सान्त्वपूर्व तदानीम्‌

তখন জামদগ্ন্য (পরশুরাম) তাঁর পিতা জমদগ্নিকে এবং পিতারও পূজনীয় পিতা, শ্রদ্ধেয় ঋচীক মুনিকে দেখলেন। তাঁরা সেখানে তাঁকে চারদিক থেকে ঘিরে দাঁড়ালেন এবং তখন সান্ত্বনাসহকারে তাঁকে বললেন।

Verse 10

पितर ऊचु. मा स्मैवं साहसं तात पुनः कार्षी: कथंचन । भीष्मेण संयुगं गन्तुं क्षत्रियेण विशेषत:

পিতৃগণ বললেন—বৎস! আর কখনও কোনোভাবেই এমন দুঃসাহস করো না। ভীষ্মের সঙ্গে—বিশেষত এমন ক্ষত্রিয়ের সঙ্গে—যুদ্ধে প্রবেশ করা তোমার পক্ষে শোভন নয়।

Verse 11

क्षत्रियस्थ तु धर्मोड्यं यद्‌ युद्धे भूगुनन्दन । स्वाध्यायो व्रतचर्याथ ब्राह्मणानां परं धनम्‌

হে ভৃগুনন্দন! ক্ষত্রিয়ের ধর্ম হলো যুদ্ধে অবিচল থাকা; কিন্তু ব্রাহ্মণদের পরম ধন হলো বেদের স্বাধ্যায় ও শ্রেষ্ঠ ব্রতাচরণ।

Verse 12

इदं निमित्ते कस्मिंश्चिदस्माभि: प्रागुदाहतम्‌ । शस्त्रधारणमत्युग्रं तच्चाकार्य कृतं त्वया

পূর্বে কোনো এক উপলক্ষে, এই প্রসঙ্গেই, আমরা তোমাকে এ কথা বলেছিলাম। অস্ত্র ধারণ করা অত্যন্ত ভয়ংকর কর্ম; তাই তুমি অনুচিত কাজ করেছ।

Verse 13

वत्स पर्याप्तमेतावद्‌ भीष्मेण सह संयुगे । विमर्दस्ते महाबाहो व्यपयाहि रणादित:

বৎস! মহাবাহো! ভীষ্মের সঙ্গে যুদ্ধে নেমে তুমি যে বিপুল ধ্বংস সাধন করেছ, এতেই যথেষ্ট। এখন এই রণক্ষেত্র থেকে সরে যাও।

Verse 14

पर्याप्तमेतद्‌ भद्रं ते तव कार्मुकधारणम्‌ । विसर्जयैतद्‌ दुर्धर्ष तपस्तप्यस्व भार्गव

তোমার মঙ্গল হোক। দুর্ধর্ষ ভার্গব! তোমার ধনুক ধারণ করাই যথেষ্ট। এখন এটি ত্যাগ করে তপস্যায় প্রবৃত্ত হও। হে গাধেয়! রণক্ষেত্রে ব্রাহ্মণের মর্যাদা রক্ষা করো।

Verse 15

एष भीष्म: शान्तनवो देवै: सर्वैर्निवारित: | निवर्तस्व रणादस्मादिति चैव प्रसादित:

এই শান্তনু-পুত্র ভীষ্মকে সকল দেবতা নিবৃত্ত করেছেন; এবং তাঁকে বিনীতভাবে এ কথাও বলা হয়েছে—“এই যুদ্ধ থেকে ফিরে এসো।”

Verse 16

रामेण सह मा योत्सीर्गुरुणेति पुनः पुनः । न हि रामो रणे जेतु त्वया न्याय्य: कुरूद्गह

ভীষ্ম বললেন—আমি বারবার তোমাকে বলেছি—‘গুরু রামের সঙ্গে যুদ্ধ কোরো না।’ হে কুরু-ধ্বজবাহী! রণক্ষেত্রে রামকে তোমার দ্বারা পরাজিত হওয়া ন্যায়সঙ্গত নয়।

Verse 17

वयं तु गुरवस्तुभ्यं तस्मात्‌ त्वां वारयामहे

কিন্তু আমরা তোমার গুরুজন ও বয়োজ্যেষ্ঠ; তাই ধর্ম ও ন্যায়ের খাতিরে আমরা তোমাকে নিবৃত্ত করি এবং বিরত হতে বলি।

Verse 18

गाड़ेय: शान्तनो: पुत्रो वसुरेष महायशा:

ভীষ্ম বললেন—গাডেয়, শান্তনুর পুত্র, ছিলেন বসুরেষ—মহাযশস্বী।

Verse 19

अर्जुन: पाण्डवश्रेष्ठ: पुरंदरसुतो बली

ভীষ্ম বললেন—পাণ্ডবদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ, বলবান, পুরন্দর (ইন্দ্র)-পুত্র অর্জুনই সেই প্রাচীন ও সনাতন দেবসত্তা—প্রজাপালক, বীরশ্রেষ্ঠ, ভগবান নর, ইন্দ্রপুত্র মহাবলী। তিনি অর্জুনরূপে প্রকাশ পাবেন এবং পরাক্রমে সমৃদ্ধ হয়ে তিন লোকেই ‘সব্যসাচী’ নামে খ্যাত হবেন। স্বয়ম্ভূ ব্রহ্মা যথাকালে আমার মৃত্যুর বিষয়ে তাঁকেই কারণরূপে স্থির করেছেন।

Verse 20

नर: प्रजापतिर्वीर: पूर्वदेव: सनातन: । सव्यसाचीति विख्यातस्त्रिषु लोकेषु वीर्यवान्‌ | भीष्ममृत्युर्यथाकालं विहितो वै स्वयम्भुवा

ভীষ্ম বললেন—নর প্রজাপতি, বীর, প্রাচীন ও সনাতন দেবতা। তিনি পরাক্রমশালী হয়ে তিন লোকেই ‘সব্যসাচী’ নামে খ্যাত হবেন। স্বয়ম্ভূ যথাকালে ভীষ্মের মৃত্যুকে তাঁর দ্বারাই বিধিত করেছেন।

Verse 21

भीष्म उवाच एवमुक्तः स पितृभिः पितृन्‌ रामो<ब्रवीदिदम्‌ । नाहं युधि निवर्तेयमिति मे व्रतमाहितम्‌

ভীষ্ম বললেন—রাজন! পিতৃগণ এ কথা বললে পরশুরাম তাঁদের উদ্দেশে বললেন—“যুদ্ধে আমি কখনও পিছু হটব না; এ আমার বহুদিনের ধারণ করা ব্রত।”

Verse 22

न निवर्तितपूर्वश्च कदाचिद्‌ रणमूर्थनि । निवर्त्यतामापगेय: काम॑ युद्धात्‌ पितामहा:

ভীষ্ম বললেন—রণাঙ্গনের অগ্রভাগ থেকে তিনি কখনও পূর্বে পিছু হটেননি। অতএব পিতামহ (ভীষ্ম) ইচ্ছামতো যুদ্ধ থেকে সরে দাঁড়ান।

Verse 23

ततस्ते मुनयो राजन्नूचीकप्रमुखास्तदा

তখন, হে রাজন, সেই সময় উচীক-প্রমুখ মুনিগণ বললেন।

Verse 24

नारदेनैव सहिता: समागम्येदमब्रुवन्‌ । निवर्तस्व रणात्‌ तात मानयस्व द्विजोत्तमम्‌

নারদের সঙ্গে তাঁরা একত্র হয়ে বললেন—“বৎস! যুদ্ধ থেকে সরে দাঁড়াও; দ্বিজোত্তমের সম্মান রক্ষা করো।”

Verse 25

राजन्‌! तब वे ऋचीक आदि मुनि नारदजीके साथ मेरे पास आये और इस प्रकार बोले --तात! तुम्हीं युद्धसे निवृत्त हो जाओ और द्विजश्रेष्ठ परशुरामजीका मान रखो” ।।

ভীষ্ম বললেন—রাজন! তখন ঋচীক-প্রমুখ মুনিগণ নারদের সঙ্গে আমার কাছে এসে বললেন—“বৎস! তুমি যুদ্ধ থেকে সরে দাঁড়াও এবং দ্বিজশ্রেষ্ঠ পরশুরামের মান রক্ষা করো।” কিন্তু আমি ক্ষত্রধর্মের কথা মনে রেখে তাঁদের বললাম—“জগতে এ আমার ব্রত; আমি কখনও যুদ্ধ থেকে সরে যাই না।”

Verse 26

विमुखो विनिवर्तेयं पृष्ठतो5भ्याहत: शरै: । नाहं लोभाजन्न कार्पण्यान्न भयान्ञार्थकारणात्‌

আমি যদি মুখ ফিরিয়ে সরে যাই, তবে পেছন থেকে তীরের আঘাতে বিদ্ধ হব। আমি লোভে নয়, কৃপণ দুর্বলতায় নয়, ভয়ে নয়, কিংবা কোনো স্বার্থসিদ্ধির কারণেও পশ্চাদপসরণ করি না।

Verse 27

त्यजेयं शाश्व॒तं धर्ममिति मे निश्चिता मतिः । तब मैंने क्षत्रियधर्मको लक्ष्य करके उनसे कहा--“महर्षियो! संसारमें मेरा यह व्रत प्रसिद्ध है कि मैं पीठपर बाणोंकी चोट खाता हुआ कदापि युद्धसे निवृत्त नहीं हो सकता। मेरा यह निश्चित विचार है कि मैं लोभसे

আমার স্থির সংকল্প—আমি শাশ্বত ধর্ম ত্যাগ করব না। ক্ষত্রিয়ধর্মকে সামনে রেখে আমি সেই মহর্ষিদের বললাম—“মহর্ষিগণ! জগতে আমার এই ব্রত প্রসিদ্ধ—পিঠে তীরের আঘাত সহ্য করেও আমি কখনো যুদ্ধ থেকে সরে দাঁড়াতে পারি না। আমার দৃঢ় বিশ্বাস—লোভে নয়, কাপুরুষতা বা দীনতায় নয়, ভয়ে নয়, কিংবা কোনো ব্যক্তিগত লাভের কারণেও আমি ক্ষত্রিয়দের সনাতন ধর্ম পরিত্যাগ করতে পারি না।”

Verse 28

भागीरथी च मे माता रणमध्यं प्रपेदिरे तथैवात्तशरो धन्वी तथैव दृढनिश्चय: । स्थिरो5हमाहवे योद्धुं ततस्ते राममब्रुवन्‌

আমার জননী ভাগীরথী (গঙ্গা)ও যুদ্ধক্ষেত্রের মধ্যভাগে এসে উপস্থিত হলেন। আমিও তেমনি—তীরে হাত, ধনুক ধারণ করে, দৃঢ় সংকল্পে—রণে যুদ্ধ করতে স্থির হয়ে দাঁড়ালাম। তখন সেই যোদ্ধারা রামকে বলল।

Verse 29

समेत्य सहिता भूय: समरे भृगुनन्दनम्‌ । इतना कहकर मैं पूर्ववत्‌ धनुष-बाण लिये दृढ़ निश्चयके साथ समरभूमिमें युद्ध करनेके लिये डटा रहा। राजन्‌! तब वे नारद आदि सम्पूर्ण ऋषि और मेरी माता गंगा सब लोग उस रणक्षेत्रमें एकत्र हुए और पुनः एक साथ मिलकर उस समरांगणमें भूगुनन्दन परशुरामजीके पास जाकर इस प्रकार बोले-- || २७-२८ ह || नावनीतं हि हृदयं विप्राणां शाम्य भार्गव

এ কথা বলে আমি আগের মতোই ধনুক-বাণ হাতে, দৃঢ় সংকল্পে, রণভূমিতে অটল রইলাম। তখন, হে রাজন, নারদ প্রমুখ সকল ঋষি এবং আমার জননী গঙ্গা—সবাই সেই যুদ্ধক্ষেত্রে একত্র হলেন। পরে তাঁরা একসঙ্গে ভৃগুনন্দন পরশুরামের কাছে গিয়ে বললেন—“হে ভার্গব! ব্রাহ্মণদের হৃদয় নবনীতের মতো কোমল; অতএব শান্ত হও। হে দ্বিজোত্তম পরশুরাম! এই যুদ্ধ থেকে সরে দাঁড়াও। হে ভৃগুবংশ-নন্দন! তোমার পক্ষে ভীষ্ম অবধ্য, আর ভীষ্মের পক্ষে তুমিও অবধ্য।”

Verse 30

राम राम निवर्तस्व युद्धादस्माद्‌ द्विजोत्तम | अवशध्यो वै त्वया भीष्मस्त्वं च भीष्मस्य भार्गव

“রাম, রাম! নিবৃত্ত হও—হে দ্বিজোত্তম! এই যুদ্ধ থেকে সরে দাঁড়াও। হে ভার্গব! তোমার দ্বারা ভীষ্ম অবধ্য, আর ভীষ্মের দ্বারা তুমিও অবধ্য; অতএব নবনীতসম কোমল হৃদয়ী ব্রাহ্মণের মতো শান্ত হও এবং এই সংঘর্ষ থেকে বিরত হও।”

Verse 31

एवं ब्रुवन्तस्ते सर्वे प्रतिरुध्य रणाजिरम्‌ । न्यासयांचक्रिरे शस्त्र पितरो भूगुनन्दनम्‌,इस प्रकार कहते हुए उन सब लोगोंने रणस्थलीको घेर लिया और पितरोंने भृूगुनन्दन परशुरामसे अस्त्र-शस्त्र रखवा दिया

এভাবে বলতে বলতে তারা সকলে যুদ্ধক্ষেত্রকে চারদিক থেকে অবরুদ্ধ করল; আর পিতৃগণ ভৃগুনন্দন পরশুরামকে অস্ত্র-শস্ত্র নামিয়ে রাখতে বাধ্য করলেন।

Verse 32

ततोऊहं पुनरेवाथ तानष्टौ ब्रह्म॒वादिन: । अद्राक्षं दीप्यमानान्‌ वै ग्रहानष्टाविवोदितान्‌,इसी समय मैंने पुनः उन आठों ब्रह्मवादी वसुओंको आकाशमें उदित हुए आठ ग्रहोंकी भाँति प्रकाशित होते देखा

তারপর আবার আমি সেই আটজন ব্রহ্মবাদী বসুকে দেখলাম—তারা দীপ্তিমান, যেন আকাশে উদিত আটটি গ্রহ।

Verse 33

ते मां सप्रणयं वाक्यमत्रुवन्‌ समरे स्थितम्‌ । प्रैहि रामं महाबाहो गुरुं लोकहितं कुरु

যুদ্ধক্ষেত্রে অটল দাঁড়িয়ে থাকা আমাকে তারা স্নেহভরে বলল—“হে মহাবাহু! তুমি তোমার গুরু রাম (পরশুরাম)-এর কাছে যাও এবং লোককল্যাণ সাধন কর।”

Verse 34

दृष्टवा निवर्तितं राम सुहृद्वाक्येन तेन वै । लोकानां च हित॑ कुर्वन्नहमप्याददे वच:,अपने सुहृदोंके कहनेसे परशुरामजीको युद्धसे निवृत्त हुआ देख मैंने भी लोककी भलाई करनेके लिये उन महर्षियोंकी बात मान ली

সুহৃদদের কথায় পরশুরামকে যুদ্ধ থেকে নিবৃত্ত হতে দেখে, লোককল্যাণের জন্য আমিও সেই মহর্ষিদের উপদেশ মেনে নিলাম।

Verse 35

ततोऊ<हं राममासाद्य ववन्दे भृशविक्षत: । रामश्नाभ्युत्स्मयन्‌ प्रेमणा मामुवाच महातपा:

তারপর আমি পরশুরামের কাছে গিয়ে, গভীরভাবে ক্ষতবিক্ষত অবস্থায় তাঁর চরণে প্রণাম করলাম। মহাতপস্বী রাম (পরশুরাম) আমাকে দেখে মৃদু হাসলেন এবং স্নেহভরে বললেন—

Verse 36

त्वत्समो नास्ति लोके5स्मिन्‌ क्षत्रिय: पृथिवीचर: । गम्यतां भीष्म युद्धेडस्मिंस्तोषितो 5हं भृशं त्वया

এই জগতে পৃথিবীতে বিচরণকারী কোনো ক্ষত্রিয়ই তোমার সমান নয়। যাও, ভীষ্ম; এই যুদ্ধে তুমি আমাকে অত্যন্ত সন্তুষ্ট করেছ।

Verse 37

मम चैव समक्ष तां कन्यामाहूय भार्गव: । उक्तवान्‌ दीनया वाचा मध्ये तेषां महात्मनाम्‌,फिर मेरे सामने ही उन्होंने उस कन्‍्याको बुलाकर उन सब महात्माओंके बीच दीनतापूर्ण वाणीमें उससे कहा

আমার সামনেই ভার্গব সেই কন্যাকে ডেকে এনে, সেই মহাত্মাদের মাঝখানে, বিনীত ও করুণ স্বরে তাকে বললেন।

Verse 166

मानं कुरुष्व गाड़ेय ब्राह्मणस्य रणाजिरे । भृगुनन्दन! तुम्हारा कल्याण हो। दुर्धर्ष वीर! तुमने जो धनुष उठा लिया

হে গাধেয়! রণক্ষেত্রে ব্রাহ্মণের প্রতি যথোচিত সম্মান প্রদর্শন করো। হে ভৃগুনন্দন, তোমার মঙ্গল হোক। হে দুর্ধর্ষ বীর, তুমি যে ধনুক তুলেছ—এতেই যথেষ্ট; এখন তা নামিয়ে রেখে তপস্যায় প্রবৃত্ত হও। দেখো, এই সকল দেবতাই শান্তনুনন্দন ভীষ্মকেও নিবৃত্ত করেছেন। তাঁকে প্রসন্ন করে তাঁরা বলেন—‘যুদ্ধ থেকে সরে এসো। পরশুরাম তোমার গুরু; তাঁর সঙ্গে বারবার যুদ্ধ কোরো না। হে কুরুশ্রেষ্ঠ, যুদ্ধে পরশুরামকে জয় করা তোমার পক্ষে কখনোই ন্যায়সঙ্গত নয়। হে গঙ্গানন্দন, এই সমরাঙ্গণে তোমার ব্রাহ্মণ গুরুকে সম্মান করো।’

Verse 176

भीष्मो वसूनामन्यतमो दिष्ट्या जीवसि पुत्रक । बेटा परशुराम! हम जो तुम्हारे गुरुजन--आदरणीय पितर हैं। इसलिये तुम्हें रोक रहे हैं। पुत्र! भीष्म वसुओंमेंसे एक वसु हैं। तुम अपना सौभाग्य ही समझो कि उनके साथ युद्ध करके अबतक जीवित हो

আমি, ভীষ্ম, বসুদের মধ্যে একজন বসু। বৎস, সৌভাগ্যক্রমে তুমি এখনও জীবিত। আমরা তোমার গুরুজন—পূজ্য পিতৃসম—এইজন্যই তোমাকে নিবৃত্ত করছি। বৎস, এটিকে নিজের সৌভাগ্য জ্ঞান করো যে আমার মতো এক বসুর সঙ্গে যুদ্ধ করেও তুমি এখনও প্রাণে বেঁচে আছ।

Verse 185

इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि अम्बोपाख्यानपर्वणि युद्धनिवृत्तौ पज्चाशीत्यधिकशततमो< ध्याय:

এইভাবে শ্রীমহাভারতের উদ্যোগপর্বের অন্তর্গত অম্বোপাখ্যানপর্বে যুদ্ধ-নিবৃত্তি-বিষয়ক একশো পঁচাশি-তম অধ্যায় সমাপ্ত হল।

Verse 186

कथं शक्‍्यस्त्वया जेतुं निवर्तस्वेह भार्गव । भृगुनन्दन! गंगा और शान्तनुके ये महायशस्वी पुत्र भीष्म साक्षात्‌ वसु ही हैं। इन्हें तुम कैसे जीत सकते हो? अतः यहाँ युद्धसे निवृत्त हो जाओ

তুমি তাকে কীভাবে জয় করবে? হে ভার্গব, হে ভৃগুনন্দন, এখান থেকে প্রত্যাবর্তন করো। গঙ্গা ও শান্তনুর মহাযশস্বী পুত্র ভীষ্ম স্বয়ং বসুর অবতার। তুমি তাঁকে কীভাবে পরাস্ত করবে? অতএব এখানে যুদ্ধ ত্যাগ করো।

Verse 226

न त्वहं विनिवर्तिष्ये युद्धादस्मात्‌ कथंचन । “आजसे पहले भी मैं कभी किसी युद्धसे पीछे नहीं हटा हूँ। अतः: पितामहो! आपलोग अपनी इच्छाके अनुसार पहले गंगानन्दन भीष्मको ही युद्धसे निवृत्त कीजिये। मैं किसी प्रकार पहले स्वयं ही इस युद्धसे पीछे नहीं हटूँगा”

আমি কোনো অবস্থাতেই এই যুদ্ধ থেকে সরে দাঁড়াব না। আজ পর্যন্ত আমি কখনও কোনো যুদ্ধে পিছু হটিনি; অতএব আজও আমি নিজে প্রথমে সরে যাব না। যদি পিতামহগণ আমাকে যুদ্ধ থেকে সরাতে চান, তবে তাঁদের ইচ্ছানুসারে আগে গঙ্গানন্দন ভীষ্মকেই যুদ্ধ থেকে নিবৃত্ত করুন; আমি স্বেচ্ছায় রণক্ষেত্র ত্যাগ করব না।

Frequently Asked Questions

The dilemma concerns how to prevail in a high-stakes confrontation without crossing into irreversible harm: Bhīṣma is guided toward a method that secures advantage while avoiding the opponent’s destruction.

Efficacy in conflict is not equated with maximal violence; disciplined knowledge and proportional tactics can align strategic success with ethical restraint, preserving the possibility of post-conflict restoration.

No explicit phalaśruti is stated in the provided verses; the meta-level emphasis instead lies in legitimizing a non-lethal astravidyā and modeling how sanctioned counsel (even via dream-vision) can redirect action toward restraint within dharmic bounds.