Adhyaya 153
Udyoga ParvaAdhyaya 15329 Versesयुद्ध आरम्भ नहीं; परन्तु शांति-प्रयासों के निष्फल होने से पाण्डव-पक्ष का सैन्य-संकल्प निर्णायक रूप से युद्ध की ओर मुड़ता है।

Adhyaya 153

भीष्मसेनापत्याभिषेकः (Bhīṣma’s Appointment as Commander-in-Chief)

Upa-parva: Senāpati-abhisheka (Bhīṣma appointed Commander) — Udyoga Parva

Vaiśaṃpāyana narrates Duryodhana’s formal appeal to Bhīṣma, made with folded hands amid allied rulers, arguing by analogy that an army without a leader disperses in battle. He supports the claim through a didactic exemplum: disparate counsel and competing valor among leaders undermine cohesion, whereas selecting a single capable, ethically steady commander yields victory. Duryodhana then praises Bhīṣma’s protective capacity through a sequence of cosmological comparisons (sun among lights, Indra among gods, Meru among mountains), requesting him to lead the Kaurava host. Bhīṣma accepts, affirming both his duty-bound commitment to fight for the Kauravas and his continuing goodwill toward the Pāṇḍavas; he acknowledges Arjuna as the only comparable warrior and indicates restraint regarding the sons of Pāṇḍu, focusing instead on opposing fighters. He further raises the command-order issue—either Karṇa fights first or Bhīṣma does—prompting Karṇa to refuse combat while Bhīṣma commands. The chapter closes with Bhīṣma’s ritual appointment, celebratory sounds, mass gifts to Brahmins, and a cluster of ominous portents (bloody mire-like rain, tremors, meteors, fearful cries), followed by the army’s departure and the establishment of the camp at Kurukṣetra.

Chapter Arc: संकट की घड़ी में धर्मराज युधिष्ठिर अच्युत से पूछते हैं—“इस समय हमारे लिए क्या उचित है, जिससे हम स्वधर्म से न च्युत हों?” → युधिष्ठिर कृष्ण को स्मरण कराते हैं कि वे दुर्योधन, कर्ण, शकुनि और पाण्डवों—सबके मनोभाव जानते हैं; अतः अब निर्णय का भार भी उन्हीं पर है। कृष्ण धृतराष्ट्रसभा में हुए अपमान, दुर्योधन की दुष्ट-नीति और यहाँ तक कि स्वयं कृष्ण को बाँधने की आज्ञा तक का उल्लेख कर, कौरव-पक्ष की असाध्य हठधर्मिता स्पष्ट करते हैं। → कृष्ण निर्णायक स्वर में बताते हैं कि इस समय ‘समयोचित कर्तव्य’ युद्ध की तैयारी ही है—क्योंकि दुर्योधन का पाप-निश्चय, शकुनि-कर्ण-दुःशासन की उकसाहट और संधि-विरोध ने शांति के सभी द्वार बंद कर दिए हैं। → कृष्ण के वचन सुनकर पाण्डव-पक्ष का संकल्प स्थिर होता है; अर्जुन के कथन पर कृष्ण मुस्कराकर अनुमोदन करते हैं और समस्त पाण्डव योद्धाओं सहित युद्ध के लिए दृढ़ निश्चय करके उस रात्रि विश्राम करते हैं। → रात्रि का शांत विराम अगले दिन के सैन्य-निर्याण और अनिवार्य महासंग्राम की आहट बनकर रह जाता है।

Shlokas

Verse 1

हि न बा आम #ा5 चतुष्पञ्चाशर्दाधिकशततमो< ध्याय: अब भगवान्‌ श्रीकृष्णसे अपने समयोचित कर्तव्यके | पूछना, भगवान्‌का युद्धको ही कर्तव्य बताना तथा इस विषयमें युधिष्ठिरका संताप और अर्जुनद्वारा श्रीकृष्णके वचनोंका समर्थन वैशम्पायन उवाच वासुदेवस्य तद्‌ वाक्‍्यमनुस्मृत्य युधिष्ठिर: । पुन: पप्रच्छ वार्ष्णेयं कथं मन्दो5ब्रवीदिदम्‌,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! भगवान्‌ श्रीकृष्णके पूर्वोक्त कथनका स्मरण करके युधिष्ठिरने पुनः उनसे पूछा--'भगवन्‌! मन्दबुद्धि दुर्योधनने क्‍यों ऐसी बात कही?

বৈশম্পায়ন বললেন—বাসুদেবের সেই কথাগুলি স্মরণ করে যুধিষ্ঠির আবার বার্ষ্ণেয় কৃষ্ণকে জিজ্ঞাসা করলেন—“ভগবান! মন্দবুদ্ধি দুর্যোধন কেন এমন কথা বলল?”

Verse 2

अस्मिन्नभ्यागते काले कि च न: क्षममच्युत । कथं च वर्तमाना वै स्वधर्मान्न च्यवेमहि,“अच्युत! इस वर्तमान समयमें हमारे लिये क्या करना उचित है? हम कैसा बर्ताव करें? जिससे अपने धर्मसे नीचे न गिरें

“অচ্যুত! এই সংকটকাল উপস্থিত হলে আমাদের পক্ষে কী করাই যথোচিত? আমরা কীভাবে চলব, যাতে নিজেদের ধর্ম থেকে বিচ্যুত না হই?”

Verse 3

दुर्योधनस्य कर्णस्य शकुने: सौबलस्य च । वासुदेव मतज्ञोडसि मम सभ्रातृकस्य च,*वासुदेव! दुर्योधन, कर्ण और शकुनिके तथा भाइयोंसहित मेरे विचारोंको भी आप जानते हैं

“হে বাসুদেব! দুর্যোধন, কর্ণ এবং সৌবল শকুনির মতলব তুমি জান; আর আমারও—ভাইদেরসহ—মনের ভাব তুমি অবগত।”

Verse 4

विदुरस्यापि तद्‌ वाक्यं श्रुतं भीष्मस्यथ चो भयो: । कुन्त्याश्न विपुलप्रज्ञ प्रज्ञा कार्त्स्न्येन ते श्रुता,“विदुरने और भीष्मजीने भी जो बातें कही हैं, उन्हें भी आपने सुना है। विशालबुद्धे ! माता कुन्तीका विचार भी आपने पूर्णरूपसे सुन लिया है

বৈশম্পায়ন বললেন—বিদুর ও ভীষ্ম—উভয়ের কথাই তুমি শুনেছ। হে বিপুলপ্রজ্ঞ! কুন্তীর বিচক্ষণ পরামর্শও তুমি সম্পূর্ণরূপে শুনে নিয়েছ।

Verse 5

सर्वमेतदतिक्रम्य विचार्य च पुन: पुनः । क्षमं यन्नो महाबाहो तद्‌ ब्रवीह्विचारयन्‌,“महाबाहो! इन सब विचारोंको लाँधकर स्वयं ही इस विषयपर बारंबार विचार करके हमारे लिये जो उचित हो, उसे नि:संकोच कहिये'

বৈশম্পায়ন বললেন—হে মহাবাহু! এসব কথা এক পাশে রেখে, তুমি নিজে বিষয়টি বারবার ভেবে দেখো; আমাদের জন্য যা যথোচিত, তা সুপরামর্শ করে বলো।

Verse 6

श्रुत्वैतद्‌ धर्मराजस्य धर्मार्थसहितं वच: । मेघदुन्दुभिनिर्घोष: कृष्णो वाक्यमथाब्रवीत्‌,धर्मराजका यह धर्म और अर्थसे युक्त वचन सुनकर भगवान्‌ श्रीकृष्णने मेघ और दुन्दुभिके समान गम्भीर स्वरमें यह बात कही

ধর্মরাজের ধর্ম ও অর্থে সমন্বিত এই বাক্য শুনে, মেঘগর্জন ও দুন্দুভির ন্যায় গম্ভীর ধ্বনিস্বরধারী কৃষ্ণ তখন উত্তর দিলেন।

Verse 7

कृष्ण उवाच उक्तवानस्मि यद्‌ वाक्यं धर्मार्थसहितं हितम्‌ । नतु ततन्निकृतिप्रज्ञे कौरव्ये प्रतेतिष्ठति,श्रीकृष्ण बोले--मैंने जो धर्म और अर्थसे युक्त हितकर बात कही है, वह छल-कपट करनेमें ही कुशल कुरुवंशी दुर्योधनके मनमें नहीं बैठती है

কৃষ্ণ বললেন—আমি যে কথা বলেছি তা ধর্ম ও অর্থে সমন্বিত, কল্যাণকর। কিন্তু ছলচাতুর্যে পারদর্শী সেই কৌরব দুর্যোধনের মনে তা স্থির হয় না।

Verse 8

न च भीष्मस्य दुर्मेधा: शृणोति विदुरस्य वा । मम वा भाषितं किंचित्‌ सर्वमेवातिवर्तते,खोटी बुद्धिवाला वह दुष्ट न भीष्मकी, न विदुरकी और न मेरी ही कोई बात सुनता है। वह सबकी सभी बातोंको लाँघ जाता है

সে বিকৃতবুদ্ধি ব্যক্তি ভীষ্মের কথা শোনে না, বিদুরেরও নয়, এমনকি আমার কথাও নয়। সে সকলের উপদেশ অতিক্রম করে সবই উপেক্ষা করে।

Verse 9

नैष कामयते धर्म नैष कामयते यश: । जितं स मन्यते सर्व दुरात्मा कर्णमाश्रित:,दुरात्मा दुर्योधन कर्णका आश्रय लेकर सभी वस्तुओंको जीती हुई ही समझता है। इसीलिये न यह धर्मकी इच्छा रखता है और न यशकी ही कामना करता है

সে না ধর্ম চায়, না সত্য যশ কামনা করে। কর্ণের আশ্রয় নিয়ে সেই দুরাত্মা দুর্যোধন সবই জয় হয়েছে বলে মনে করে; তাই তার না ধার্মিকতার আকাঙ্ক্ষা আছে, না সম্মানজনক খ্যাতির ভাবনা।

Verse 10

बन्धमाज्ञापयामास मम चापि सुयोधन: । न चतं लब्धवान्‌ काम॑ दुरात्मा पापनिश्चय:,पापपूर्ण निश्चयवाले उस दुरात्मा दुर्योधनने तो मुझे भी कैद कर लेनेकी आज्ञा दे दी थी; परंतु वह उस मनोरथको पूर्ण न कर सका

সুয়োধন তো আমাকে পর্যন্ত ধরে বেঁধে ফেলতে আদেশ দিয়েছিল; কিন্তু পাপময় সংকল্পে স্থির সেই দুরাত্মা তার সে বাসনা পূর্ণ করতে পারেনি।

Verse 11

न च भीष्मो न च द्रोणो युक्त तत्राहतुर्वच: । सर्वे तमनुवर्तन्ते ऋते विदुरमच्युत,अच्युत! वहाँ भीष्म तथा द्रोणाचार्य भी सदा उचित बात नहीं कहते हैं। विदुरको छोड़कर अन्य सब लोग दुर्योधनका ही अनुसरण कर लेते हैं

অচ্যুত! সেখানে ভীষ্মও নয়, দ্রোণও নয়—কেউই যথোচিত কথা বলে না। বিদুরকে বাদ দিলে সকলেই দুঃযোধনেরই অনুসরণ করে, ন্যায়ের বদলে আনুগত্য বেছে নেয়।

Verse 12

शकुनि: सौबलश्चैव कर्णदुःशासनावपि । त्वय्ययुक्तान्यभाषन्त मूढा मूढममर्षणम्‌,सुबलपुत्र शकुनि, कर्ण और दुःशासन--इन तीनों मूखोंने मूढ़ और असहिष्णु दुर्योधनके समीप आपके विषयमें अनेक अनुचित बातें कही थीं

সৌবলপুত্র শকুনি, কর্ণ ও দুঃশাসন—এই তিন মূঢ়—মূঢ় ও অসহিষ্ণু দুঃযোধনের কাছে আপনার সম্বন্ধে বহু অনুচিত কথা বলেছিল।

Verse 13

कि च तेन मयोक्तेन यान्यभाषत कौरव: । संक्षेपेण दुरात्मासौ न युक्त त्वयि वर्तते,उन लोगोंने जो-जो बातें कहीं, उन्हें यदि मैं पुनः यहाँ दोहराऊँ तो इससे क्या लाभ है? थोड़ेमें इतना ही समझ लीजिये कि वह दुरात्मा कौरव आपके प्रति न्याययुक्त बर्ताव नहीं कर रहा है

কৌরব যা যা বলেছিল, তা এখানে আবার বললে লাভ কী? সংক্ষেপে এটুকুই বোঝো—সেই দুরাত্মা তোমার প্রতি ন্যায় ও শিষ্টাচার অনুযায়ী আচরণ করছে না।

Verse 14

पार्थिवेषु न सर्वेषु य इमे तव सैनिका: । यत्‌ पापं यन्नकल्याणं सर्व तस्मिन्‌ प्रतिष्ठितम्‌,इन सब राजाओंमें, जो आपकी सेनामें स्थित हैं, जो पाप और अमंगलकारक भाव नहीं है, वह सब अकेले दुर्योधनमें विद्यमान है

এই সকল রাজাদের মধ্যে, যারা তোমার সেনাদলে দাঁড়িয়ে আছে, যে পাপ ও যে অমঙ্গল আছে—তার সমস্ত ভার সেই এক জনেরই (দুর্যোধনের) মধ্যে প্রতিষ্ঠিত।

Verse 15

न चापि वयमत्यर्थ परित्यागेन कर्िचित्‌ । कौरवै: शममिच्छामस्तत्र युद्धमनन्तरम्‌,हमलोग भी बहुत अधिक त्याग करके (सर्वस्व खोकर) कभी किसी भी दशामें कौरवोंके साथ संधिकी इच्छा नहीं रखते हैं। अत: इसके बाद हमारे लिये युद्ध ही करना उचित है

আর আমরা কখনও অতিরিক্ত ত্যাগ করে—নিজ ন্যায্য অধিকার সর্বস্ব হারিয়ে—কৌরবদের সঙ্গে সন্ধি চাই না। অতএব, যখন সে সন্ধি অসম্ভব, তখন আমাদের জন্য পরিণামে যুদ্ধই যথোচিত।

Verse 16

वैशग्पायन उवाच तच्छुत्वा पार्थिवा: सर्वे वासुदेवस्य भाषितम्‌ | अब्लुवन्तो मुखं राज्ञ: समुदैक्षन्त भारत,वैशम्पायनजी कहते हैं--भरतनन्दन! भगवान्‌ श्रीकृष्णका यह कथन सुनकर सब राजा कुछ न बोलते हुए केवल महाराज युधिष्ठिरके मुँहकी ओर देखने लगे

বৈশম্পায়ন বললেন—হে ভারতনন্দন! বাসুদেবের এই বাক্য শুনে সকল রাজা নীরব হলেন; কিছু না বলে তারা রাজা যুধিষ্ঠিরের মুখের দিকে চেয়ে রইলেন।

Verse 17

युधिष्टिरस्त्वभिप्रायमभिलक्ष्य महीक्षिताम्‌ । योगमाज्ञापयामास भीमार्जुनयमै: सह,युधिष्ठिरने राजाओंका अभिप्राय समझकर भीम, अर्जुन तथा नकुल-सहदेवके साथ उन्हें युद्धके लिये तैयार हो जानेकी आज्ञा दे दी

যুধিষ্ঠির রাজাদের অভিপ্রায় বুঝে ভীম, অর্জুন এবং যমজদ্বয় (নকুল-সহদেব)-সহ যুদ্ধের প্রস্তুতির আদেশ দিলেন।

Verse 18

ततः किलकिलाभूतमनीकं पाण्डवस्य ह | आज्ञापिते तदा योगे समहृष्यन्त सैनिका:,उस समय युद्धके लिये तैयार होनेकी आज्ञा मिलते ही समस्त योद्धा हर्षसे खिल उठे, फिर तो पाण्डवोंके सैनिक किलकारियाँ करने लगे

তখন যুদ্ধবিন্যাসের আদেশ হতেই পাণ্ডবসেনায় কিলকিল ধ্বনি উঠল; নির্দেশ পেয়েই সকল সৈনিক আনন্দে উল্লসিত হল।

Verse 19

अवध्यानां वध पश्यन्‌ धर्मराजो युधिष्ठिर: । निःश्वसन्‌ भीमसेनं च विजयं चेदमब्रवीत्‌

বৈশম্পায়ন বললেন—অবধ্যদের বধ হতে দেখে ধর্মরাজ যুধিষ্ঠির দীর্ঘশ্বাস ফেললেন এবং ভীমসেন ও অর্জুন (বিজয়)-কে এই কথা বললেন।

Verse 20

धर्मराज युधिष्ठिर यह देखकर कि युद्ध छिड़नेपर अवध्य पुरुषोंका भी वध करना पड़ेगा, खेदसे लंबी साँसें खींचते हुए भीमसेन और अर्जुनसे इस प्रकार बोले ।। यदर्थ वनवासश् प्राप्तं दु:खं च यन्मया । सो<5यमस्मानुपैत्येव परो<नर्थ: प्रयत्नतः,“जिससे बचनेके लिये मैंने वनवासका कष्ट स्वीकार किया और नाना प्रकारके दुःख सहन किये, वही महान्‌ अनर्थ मेरे प्रयत्मसे भी टल न सका। वह हमलोगोंपर आना ही चाहता है

বৈশম্পায়ন বললেন—যুদ্ধ শুরু হলে অবধ্য লোকদেরও বধ করতে হবে, এ দেখে ধর্মরাজ যুধিষ্ঠির অনুতাপে দীর্ঘশ্বাস ফেলে ভীমসেন ও অর্জুনকে বললেন— “যে বিপদ এড়াতে আমি বনবাসের কষ্ট গ্রহণ করে নানা দুঃখ সহ্য করেছি, সেই মহা অনর্থ আমার সমস্ত প্রচেষ্টাতেও টলল না; সে তো আমাদের ওপর আসতেই চায়।”

Verse 21

तस्मिन्‌ यत्न: कृतो<स्माभि: स नो हीन: प्रयत्नतः । अकृते तु प्रयत्ने5स्मानुपावृत्त: कलिमहान्‌,“यद्यपि उसे टालनेके लिये हमारी ओरसे पूरा प्रयत्न किया गया, किंतु हमारे प्रयाससे उसका निवारण नहीं हो सका और जिसके लिये कोई प्रयत्न नहीं किया गया था, वह महान्‌ कलह स्वतः हमारे ऊपर आ गया

“সে বিষয়ে আমরা সর্বশক্তি দিয়ে চেষ্টা করেছি; আমাদের প্রচেষ্টায় কোনো ঘাটতি ছিল না। তবু যখন তা সফল হলো না, তখন যে মহা কলহ আমরা চাইওনি, সে আপনিই ফিরে এসে আমাদের ওপর পড়ল।”

Verse 22

कथं ह्ावध्यै: संग्राम: कार्य: सह भविष्यति । कथं हत्वा गुरून्‌ वृद्धान्‌ विजयो नो भविष्यति,“जो लोग मारने योग्य नहीं हैं, उनके साथ युद्ध करना कैसे उचित होगा? वृद्ध गुरुजनोंका वध करके हमें विजय किस प्रकार प्राप्त होगी?

“যাদের বধ করা উচিত নয়, তাদের সঙ্গে যুদ্ধ করা কীভাবে ন্যায়সঙ্গত হবে? আর বৃদ্ধ গুরুজনদের হত্যা করে আমাদের বিজয়ই বা কীভাবে হবে?”

Verse 23

तच्छुत्वा धर्मराजस्य सव्यसाची परंतप: । यदुक्त वासुदेवेन श्रावयामास तद्‌ वच:,धर्मराजकी यह बात सुनकर शत्रुओंको संताप देनेवाले सव्यसाची अर्जुनने भगवान्‌ श्रीकृष्णकी कही हुई बातोंको उनसे कह सुनाया

ধর্মরাজের এ কথা শুনে শত্রুদমনকারী সব্যসাচী অর্জুন বাসুদেব শ্রীকৃষ্ণের বলা বাণী তাঁকে শুনিয়ে দিলেন।

Verse 24

उक्तवान्‌ देवकीपुत्र: कुन्त्याश्न विदुरस्य च | वचन तत्‌ त्वया राजन्‌ निखिलेनावधारितम्‌,वे कहने लगे--“राजन्‌! देवकीनन्दन श्रीकृष्णने माता कुन्ती तथा विदुरजीके कहे हुए जो वचन आपको सुनाये थे, उनपर आपने पूर्णरूपसे विचार किया होगा

বৈশম্পায়ন বললেন—“হে রাজন! দেবকীপুত্র শ্রীকৃষ্ণ কুন্তী ও বিদুরের যে বাণী আপনাকে শুনিয়েছিলেন, তা আপনি নিশ্চয়ই সম্পূর্ণভাবে বিবেচনা করেছেন।”

Verse 25

नच तौ वक्ष्यतो5धर्ममिति मे नैछ्ठिकी मतिः । नापि युक्त च कौन्तेय निवर्तितुमयुध्यत:,“मेरा तो यह निश्चित मत है कि वे दोनों अधर्मकी बात नहीं कहेंगे। कुन्तीनन्दन! अब हमारे लिये युद्धसे निवृत्त हो जाना भी उचित नहीं है”

“আমার দৃঢ় বিশ্বাস, তাঁরা দু’জনেই অধর্মের কথা বলবেন না। আর হে কুন্তীপুত্র, যুদ্ধ আরম্ভ না করেই যুদ্ধ থেকে সরে দাঁড়ানোও আমাদের পক্ষে সমুচিত নয়।”

Verse 26

तच्छुत्वा वासुदेवो5पि सव्यसाचिवचस्तदा | स्मयमानोअ<ब्रवीद्‌ वाक्‍्यं पार्थमेवमिति ब्रुवन्‌,अर्जुनका यह वचन सुनकर भगवान्‌ श्रीकृष्ण भी युधिष्ठिरसे मुसकराते हुए बोले--'हाँ, अर्जुन ठीक कहते हैं!

অর্জুনের কথা শুনে বাসুদেব শ্রীকৃষ্ণও মৃদু হাসিতে পার্থকে বললেন—“হ্যাঁ, অর্জুনই যথার্থ বলেছে।”

Verse 27

ततस्ते धृतसंकल्पा युद्धाय सहसैनिका: । पाण्डवेया महाराज तां रात्रि सुखमावसन्‌,महाराज जनमेजय! तदनन्तर योद्धाओंसहित पाण्डव युद्धके लिये दृढ़ निश्चय करके उस रातमें वहाँ सुखपूर्वक रहे

তারপর, হে মহারাজ, পাণ্ডবরা সৈন্যসহ যুদ্ধের জন্য দৃঢ়সংকল্প হয়ে সেই রাত্রি সেখানে স্বস্তিতে কাটাল।

Verse 153

इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत सैन्यनिर्याणपर्वमें दुर्योधनका अपनी सेनाकी युसाज्जित करना” इस विषयसे सम्बन्ध रखनेवाला एक सौ तिरपनवाँ अध्याय पूरा हुआ

এইভাবে শ্রীমহাভারতের উদ্যোগপর্বের অন্তর্গত সৈন্যনির্যাণপর্বে “দুর্যোধনের নিজ সেনা যুদ্ধের জন্য সজ্জিতকরণ” বিষয়ক একশ তিপ্পান্নতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।

Verse 154

इति श्रीमहा भारते उद्योगपर्वणि सैन्यनिर्याणपर्वणि युधिष्ठिरार्जुनसंवादे चतुष्पज्चाशदधिकशततमो< ध्याय:,इस प्रकार श्रीमहा भारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत सैन्यनिर्याणपर्वमें युधिष्टिर-अजुनि- संवादविषयक एक सौ चौवनवाँ अध्याय पूरा हुआ

এইভাবে শ্রীমহাভারতের উদ্যোগপর্বের অন্তর্গত সৈন্যনির্যাণপর্বে যুধিষ্ঠির–অর্জুন সংলাপবিষয়ক একশো চুয়ান্নতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।

Frequently Asked Questions

Bhīṣma accepts the command out of pledged duty to the Kuru throne while simultaneously affirming moral regard for the Pāṇḍavas, creating a tension between allegiance-based obligation and restraint toward kin whose cause he does not frame as wholly illegitimate.

The chapter teaches that collective strength requires a single competent coordinator: unified command reduces fragmentation caused by rival counsel and competing prestige, turning numbers into effective, disciplined action.

No formal phalaśruti is stated; the chapter’s meta-commentary is conveyed narratively through portents and framing—suggesting that leadership decisions and ethical constraints operate under consequential, world-order-signaling conditions.