
उद्योगपर्व — अध्याय १५१: कृष्णस्य कौरव-अवज्ञा-निर्णयः तथा पाण्डव-योगाज्ञा (Krishna on the Kauravas’ Rejection of Counsel; Pandava Readiness Ordered)
Upa-parva: Udyoga Parva — Counsel and Mobilization (Krishna–Yudhishthira Deliberation Unit)
Vaiśaṃpāyana reports that Yudhiṣṭhira, recalling Kṛṣṇa’s earlier statements, asks what course is now proper and how the Pāṇḍavas may act without deviating from svadharma. He appeals to Kṛṣṇa’s comprehensive knowledge of the intentions of Duryodhana, Karṇa, Śakuni, and also of Vidura, Bhīṣma, and Kuntī. Kṛṣṇa responds that he has already delivered beneficial counsel grounded in dharma and artha, but it does not take root in Duryodhana, portrayed as guided by harmful calculation and reliance on Karṇa. Kṛṣṇa notes that Duryodhana disregards even Bhīṣma, Droṇa, Vidura, and Kṛṣṇa himself; most follow Duryodhana’s line except Vidura. He characterizes the negative tendencies within the Kaurava camp as concentrated around their leadership, while affirming that the Pāṇḍavas do not seek extreme renunciation; they seek peace, but if peace fails, structured engagement follows. Hearing this, allied rulers look to Yudhiṣṭhira; he orders ‘yoga’ (organized readiness/array) with Bhīma, Arjuna, and the twins. The army becomes animated. Yudhiṣṭhira voices ethical distress about conflict with ‘avadhya’ persons and the prospect of victory through harm to elders and teachers. Arjuna reiterates confidence in Kṛṣṇa’s and the elders’ counsel as non-adharmic and argues that withdrawal without engagement is improper. Kṛṣṇa affirms Arjuna. The Pāṇḍavas, resolved, pass the night in composure with their forces prepared.
Chapter Arc: कुरुक्षेत्र की सीमा पर पाण्डव-सेना का आगमन होता है—परन्तु युधिष्ठिर पहले ही आदेश देते हैं कि श्मशान, देवालय, ऋषि-आश्रम, तीर्थ और सिद्ध-क्षेत्रों से दूर ही पड़ाव डाला जाए, ताकि भूमि की पवित्रता और लोक-धर्म अक्षुण्ण रहे। → राजाओं और असंख्य वाहनों के विश्राम के बाद सेना आगे बढ़ती है; कुरुक्षेत्र के पुण्य-प्रदेश में प्रवेश करते ही शिविर-व्यवस्था का प्रश्न विशाल रूप ले लेता है—लाखों योद्धा, गज, अश्व, रथ, रसद, जल और सुरक्षा—सबका सम्यक् विन्यास आवश्यक है। → केशव (कृष्ण) स्वयं पाण्डवों के शिविर-विधान का संचालन कराते हैं; युधिष्ठिर प्रत्येक शिविर में बहुजल, सुयवस (उत्तम घास), भूसी और अग्नि-भार (ईंधन/व्यवस्था) की प्रचुर व्यवस्था कराते हैं, और पर्वत-से गजराजों की कतारें युद्ध-तत्पर दिखाई देती हैं—मानो धरती पर ‘विमान’ उतर आए हों। → पृथक्-पृथक् राजाओं के शिविर सुव्यवस्थित रूप से भूमि पर स्थापित हो जाते हैं; कुरुक्षेत्र में पाण्डव-सेना का पड़ाव पूर्ण होता है और अभियान का अगला चरण (कौरव-पक्ष के समक्ष निर्णायक स्थिति) निकट आ जाता है। → अब जब दोनों पक्षों की सेनाएँ कुरुक्षेत्र में जम चुकी हैं, अगला प्रश्न अनिवार्य बनता है—क्या शान्ति का कोई द्वार शेष है, या युद्ध का शंख अब अवश्य बजेगा?
Verse 1
[दाक्षिणात्य अधिक पाठका इं श्लोक मिलाकर कुल ७१ ३ “लोक हैं।] भीकम (2 अमान द्विपज्चाशर्दाधिकशततमो< ध्याय: कुरुक्षेत्रमें पाण्डव-सेनाका पड़ाव तथा शिविर-निर्माण वैशम्पायन उवाच ततो देशे समे स्निग्धे प्रभूतयवसेन्धने । निवेशयामास तदा सेनां राजा युधिष्ठटिर:,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! तदनन्तर राजा युधिष्ठिरने एक चिकने और समतल प्रदेशमें जहाँ घास और ईंधनकी अधिकता थी, अपनी सेनाका पड़ाव डाला
বৈশম্পায়ন বললেন—তারপর রাজা যুধিষ্ঠির সমতল ও মনোরম এক স্থানে, যেখানে প্রচুর ঘাস ও জ্বালানি ছিল, সেখানে তাঁর সেনাবাহিনীর শিবির স্থাপন করলেন।
Verse 2
परिहृत्य श्मशानानि देवतायतनानि च । आश्रमांश्व महर्षीणां तीर्थान्यायतनानि च,श्मशान, देवमन्दिर, महर्षियोंके आश्रम, तीर्थ और सिद्धक्षेत्र--इन सबका परित्याग करके उन स्थानोंसे बहुत दूर ऊसररहित मनोहर शुद्ध एवं पवित्र स्थानमें जाकर कुन्तीपुत्र महामति युधिष्ठटिरने अपनी सेनाको ठहराया
শ্মশান, দেবমন্দির, মহর্ষিদের আশ্রম, তীর্থ ও পুণ্যধাম—এসব এড়িয়ে, সেখান থেকে বহু দূরে, অনূষর, মনোরম, নির্মল ও পবিত্র দেশে কুন্তীপুত্র মহামতি যুধিষ্ঠির সেনাবাহিনীকে শিবির স্থাপন করালেন—যাতে পবিত্র স্থানের মর্যাদা লঙ্ঘিত না হয়।
Verse 3
मधुरानूषरे देशो शुचौ पुण्ये महामति: । निवेशं कारयामास कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिर:,श्मशान, देवमन्दिर, महर्षियोंके आश्रम, तीर्थ और सिद्धक्षेत्र--इन सबका परित्याग करके उन स्थानोंसे बहुत दूर ऊसररहित मनोहर शुद्ध एवं पवित्र स्थानमें जाकर कुन्तीपुत्र महामति युधिष्ठटिरने अपनी सेनाको ठहराया
মধুর, অনূষর, শুচি ও পুণ্য দেশে কুন্তীপুত্র মহামতি যুধিষ্ঠির সেনার শিবির স্থাপন করালেন। শ্মশান, দেবমন্দির, ঋষিদের আশ্রম, তীর্থ ও প্রসিদ্ধ পুণ্যধাম থেকে দূরে থেকে তিনি এই ব্যবস্থা করলেন—যাতে ধর্মমর্যাদা অক্ষুণ্ণ থাকে।
Verse 4
ततश्न पुनरुत्थाय सुखी विश्रान्तवाहन: । प्रययौ पृथिवीपालैव[त: शतसहसत्रश:,तत्पश्चात् समस्त वाहनोंके विश्राम कर लेनेपर स्वयं भी विश्रामसुखका अनुभव करके भगवान् श्रीकृष्ण उठे और सैकड़ों-हजारों भूमिपालोंसे घिरकर कुन्तीपुत्र अर्जुनके साथ आगे बढ़े। उन्होंने दुर्योधनके सैकड़ों सैनिक दलोंको दूर भगाकर वहाँ सब ओर विचरण करना प्रारम्भ किया
তারপর আবার উঠে—রথ ও অশ্ব বিশ্রান্ত, নিজেও প্রশান্ত ও সুখী—শ্রীকৃষ্ণ শত-সহস্র রাজন্যবর্গে পরিবৃত হয়ে কুন্তীপুত্র অর্জুনের সঙ্গে অগ্রসর হলেন। তিনি দুর্যোধনের বহু সৈন্যদলকে তাড়িয়ে দিয়ে সেই অঞ্চলে চারিদিকে অবাধে বিচরণ করতে লাগলেন।
Verse 5
विद्राव्य शतशो गुल्मान् धार्तराष्ट्रस्य सैनिकान् । पर्यक्रामत् समन्ताच्च पार्थेन सह केशव:,तत्पश्चात् समस्त वाहनोंके विश्राम कर लेनेपर स्वयं भी विश्रामसुखका अनुभव करके भगवान् श्रीकृष्ण उठे और सैकड़ों-हजारों भूमिपालोंसे घिरकर कुन्तीपुत्र अर्जुनके साथ आगे बढ़े। उन्होंने दुर्योधनके सैकड़ों सैनिक दलोंको दूर भगाकर वहाँ सब ओर विचरण करना प्रारम्भ किया
ধৃতরাষ্ট্রের সৈন্যদের শত শত দলকে তাড়িয়ে দিয়ে কেশব পার্থের সঙ্গে সেই স্থানে চারিদিকে বিচরণ করলেন।
Verse 6
शिबिरं मापयामास धृष्टय्युम्नश्न पार्षत: । सात्यकिश्व रथोदारो युयुधान: प्रतापवान्,द्रपदकुमार धृष्टद्युम्न तथा प्रतापशाली एवं उदाररथी सत्यकपुत्र युयुधानने शिविर बनानेयोग्य भूमि नापी
পার্ষতপুত্র ধৃষ্টদ্যুম্ন শিবিরের জন্য ভূমি মেপে নির্ধারণ করলেন; আর উদার রথধারী প্রতাপী যুযুধান সাত্যকিও শিবির-ব্যবস্থায় সহায় হলেন।
Verse 7
आसाद्य सरितं पुण्यां कुरुक्षेत्रे हिरण्वतीम् | सूपतीर्था शुचिजलां शर्करापड्कवर्जिताम्,भरतनन्दन जनमेजय! कुरुक्षेत्रमें हिरण्वती नामक एक पवित्र नदी है, जो स्वच्छ एवं विशुद्ध जलसे भरी है। उसके तटपर अनेक सुन्दर घाट हैं। उस नदीमें कंकड़, पत्थर और कीचड़का नाम नहीं है। उसके समीप पहुँचकर भगवान् श्रीकृष्णने खाईं खुदवायी और उसकी रक्षाके लिये पहरेदारोंको नियुक्त करके वहीं सेनाको ठहराया। महात्मा पाण्डवोंके लिये शिविरका निर्माण जिस विधिसे किया गया था, उसी प्रकारके भगवान् केशवने अन्य राजाओंके लिये शिविर बनवाये
বৈশম্পায়ন বললেন—হে ভরতবংশের আনন্দ জনমেজয়! কুরুক্ষেত্রে হিরণ্বতী নামে এক পুণ্য নদী আছে। তার জল নির্মল ও বিশুদ্ধ, তীরে সুন্দর স্নানঘাট, আর সেখানে কাঁকর-পাথর ও কাদা নেই। সেই নদীর কাছে পৌঁছে শ্রীকৃষ্ণ পরিখা খনন করালেন, রক্ষার জন্য প্রহরী নিযুক্ত করলেন এবং সেখানেই সেনাবাহিনীকে অবস্থান করালেন। মহাত্মা পাণ্ডবদের শিবির যে বিধিতে স্থাপিত হয়েছিল, কেশব সেই একই বিধানে অন্যান্য রাজাদের জন্যও শিবির প্রস্তুত করালেন।
Verse 8
खानयामास परिखां केशवस्तत्र भारत । गुप्त्यर्थमपि चादिश्य बल तत्र न्यवेशयत्,भरतनन्दन जनमेजय! कुरुक्षेत्रमें हिरण्वती नामक एक पवित्र नदी है, जो स्वच्छ एवं विशुद्ध जलसे भरी है। उसके तटपर अनेक सुन्दर घाट हैं। उस नदीमें कंकड़, पत्थर और कीचड़का नाम नहीं है। उसके समीप पहुँचकर भगवान् श्रीकृष्णने खाईं खुदवायी और उसकी रक्षाके लिये पहरेदारोंको नियुक्त करके वहीं सेनाको ठहराया। महात्मा पाण्डवोंके लिये शिविरका निर्माण जिस विधिसे किया गया था, उसी प्रकारके भगवान् केशवने अन्य राजाओंके लिये शिविर बनवाये
বৈশম্পায়ন বললেন—হে ভারত! কেশব সেখানে প্রতিরক্ষার পরিখা খনন করালেন; নিরাপত্তার জন্য আদেশ জারি করে সেই স্থানেই সেনাবাহিনীকে মোতায়েন করলেন।
Verse 9
विधिर्य: शिबिरस्यासीत् पाण्डवानां महात्मनाम् | तद्विधानि नरेन्द्राणां कारयामास केशव:,भरतनन्दन जनमेजय! कुरुक्षेत्रमें हिरण्वती नामक एक पवित्र नदी है, जो स्वच्छ एवं विशुद्ध जलसे भरी है। उसके तटपर अनेक सुन्दर घाट हैं। उस नदीमें कंकड़, पत्थर और कीचड़का नाम नहीं है। उसके समीप पहुँचकर भगवान् श्रीकृष्णने खाईं खुदवायी और उसकी रक्षाके लिये पहरेदारोंको नियुक्त करके वहीं सेनाको ठहराया। महात्मा पाण्डवोंके लिये शिविरका निर्माण जिस विधिसे किया गया था, उसी प्रकारके भगवान् केशवने अन्य राजाओंके लिये शिविर बनवाये
বৈশম্পায়ন বললেন—মহাত্মা পাণ্ডবদের শিবির যে বিধি ও নিয়মে স্থাপিত হয়েছিল, কেশব সেই একই বিধানে অন্যান্য নৃপতিদের শিবিরও নির্মাণ করালেন।
Verse 10
राजेन्द्र! उस समय राजाओंके लिये सैकड़ों और हजारोंकी संख्यामें दुर्धर्ष एवं बहुमूल्य शिविर पृथक्-पृथक् बनवाये गये थे। उनके भीतर बहुत-से काष्ठों तथा प्रचुर मात्रामें भक्ष्य- भोज्य अन्न एवं पान-सामग्रीका संग्रह किया गया था। वे समस्त शिविर भूतलपर रहते हुए विमानोंके समान सुशोभित हो रहे थे
বৈশম্পায়ন বললেন—হে রাজেন্দ্র! তখন রাজাদের জন্য পৃথক পৃথক শিবির নির্মিত হল—শত শত, সহস্র সহস্র; দুর্ধর্ষ এবং মহামূল্য আয়োজনসমৃদ্ধ। তাদের ভিতরে প্রচুর কাঠ, ভক্ষ্য-ভোজ্য অন্ন এবং পানীয়-সামগ্রীর বিপুল সঞ্চয় রাখা ছিল। ভূমিতে স্থাপিত হয়েও সেই সব শিবির বিমানের মতোই দীপ্তিমান হয়ে উঠেছিল।
Verse 11
राजेन्द्र! उस समय राजाओंके लिये सैकड़ों और हजारोंकी संख्यामें दुर्धर्ष एवं बहुमूल्य शिविर पृथक्-पृथक् बनवाये गये थे। उनके भीतर बहुत-से काष्ठों तथा प्रचुर मात्रामें भक्ष्य- भोज्य अन्न एवं पान-सामग्रीका संग्रह किया गया था। वे समस्त शिविर भूतलपर रहते हुए विमानोंके समान सुशोभित हो रहे थे
বৈশম্পায়ন বললেন—হে শ্রেষ্ঠ রাজা! তখন রাজাদের জন্য পৃথক পৃথক শিবির শত শত ও সহস্র সহস্র সংখ্যায় নির্মিত হয়েছিল—দুর্ধর্ষ এবং মহামূল্য আয়োজনসমৃদ্ধ। তাদের ভিতরে প্রচুর কাঠ, ভক্ষ্য-ভোজ্য অন্ন এবং নানা প্রকার পানীয় ও প্রয়োজনীয় সামগ্রী সঞ্চিত ছিল। ভূমিতে স্থাপিত হয়েও সেই শিবিরগুলি যেন দেবলোকের বিমানের মতোই অপূর্ব শোভা ছড়াচ্ছিল।
Verse 12
तत्रासन् शिल्पिन: प्राज्ञा: शतशो दत्तवेतना: । सर्वोपकरणैरयुक्ता वैद्या: शास्त्रविशारदा:,वहाँ सैकड़ों विद्वान शिल्पी और शास्त्रविशारद वैद्य वेतन देकर रखे गये थे, जो समस्त आवश्यक उपकरणोंके साथ वहाँ रहते थे
সেখানে শত শত প্রাজ্ঞ কারিগরকে বেতন দিয়ে নিয়োজিত রাখা হয়েছিল; আর শাস্ত্রে পারদর্শী বৈদ্যগণও সকল প্রয়োজনীয় উপকরণসহ সেখানে অবস্থান করতেন।
Verse 13
ज्याभनुर्वर्मशस्त्राणां तथैव मधुसर्पिषो: । ससर्जरसपांसूनां राशय: पर्वतोपमा:,प्रत्येक शिविरमें प्रत्यंचा, धनुष, कवच, अस्त्र-शस्त्र, मधु, घी तथा रालका चूरा--इन सबके पहाड़ों-जैसे ढेर लगे हुए थे
প্রত্যেক শিবিরে ধনুর্জ্যা, ধনুক, বর্ম ও অস্ত্রশস্ত্রের, তদ্রূপ মধু, ঘি এবং রালের গুঁড়োর—পর্বতসম স্তূপ জমা ছিল।
Verse 14
बहूदकं सुयवसं तुषाड्भारसमन्वितम् । शिबिरे शिबिरे राजा संचकार युधिष्ठिर:,राजा युधिष्ठिरने प्रत्येक शिविरमें प्रचुर जल, सुन्दर घास, भूसी और अग्निका संग्रह करा रखा था
রাজা যুধিষ্ঠির প্রতিটি শিবিরে প্রচুর জল, উৎকৃষ্ট পশুখাদ্য-ঘাস, এবং ভূষি ও জ্বালানির স্তূপ সংগ্রহ করে রেখেছিলেন।
Verse 15
महायन्त्राणि नाराचास्तोमराणि परकश्चधा: । धनूंषि कवचादीनि ऋष्टयस्तूणसंयुता:,बड़े-बड़े यन्त्र, नाराच, तोमर, फरसे, धनुष, कवच, ऋष्टि और तरकस--ये सब वस्तुएँ भी उन सभी शिविरोंमें संगृूहीत थीं
বৃহৎ যুদ্ধযন্ত্র, নারাচ, তোমর, পরশু, ধনুক, বর্ম প্রভৃতি, এবং তূণসহ ঋষ্টি—এসব যুদ্ধসামগ্রী সেই সব শিবিরে সঞ্চিত ছিল।
Verse 16
गजा: कण्टकसंनाहा लोहवर्मोत्तरच्छदा: । दृश्यन्ते तत्र गिर्याभा: सहस्रशतयोधिन:,वहाँ लाखों योद्धाओंके साथ युद्ध करनेमें समर्थ पर्वतोंके समान विशालकाय बहुत-से हाथी दिखायी देते थे, जो काँटेदार साज-सामान, लोहेके कवच तथा लोहेकी ही झूल धारण किये हुए थे
সেখানে কণ্টকযুক্ত সাজ-সরঞ্জামে সজ্জিত, লৌহবর্ম ও লৌহঝুল ধারণকারী—পর্বতসম বিশাল হাতিগণ দেখা যেত, যারা শত-সহস্র যোদ্ধার সঙ্গে যুদ্ধ করতে সক্ষম ছিল।
Verse 17
निविष्टान् पाण्डवांस्तत्र ज्ञात्वा मित्राणि भारत । अभिससुर्यथादेशं सबला: सहवाहना:,भारत! पाण्डवोंने कुरुक्षेत्रमें जाकर अपनी सेनाका पड़ाव डाल दिया है, यह जानकर उनसे मित्रता रखनेवाले बहुत-से राजा अपनी सेना और सवारियोंके साथ उनके पास, जहाँ वे ठहरे थे, आये
হে ভারত! পাণ্ডবরা কুরুক্ষেত্রে গিয়ে যেখানে শিবির স্থাপন করেছিলেন, তা জেনে তাঁদের মিত্র বহু রাজা নিজ নিজ সেনা ও বাহনসহ সেই স্থানে তাঁদের কাছে এসে উপস্থিত হলেন।
Verse 18
चरितन्रह्मचर्यास्ते सोमपा भूरिदक्षिणा: । जयाय पाण्दुपुत्राणां समाजम्मुर्महीक्षित:,जिन्होंने यथासमय ब्रह्मचर्यव्रतका पालन, यज्ञोंमें सोमरसका पान तथा प्रचुर दक्षिणाओंका दान किया था, ऐसे भूपालगण पाण्डवोंकी विजयके लिये कुरुक्षेत्रमें पधारे
যাঁরা যথাবিধি ব্রহ্মচর্যব্রত পালন করেছিলেন, যজ্ঞে সোমপান করেছিলেন এবং প্রচুর দক্ষিণা দান করেছিলেন—এমন রাজাগণ পাণ্ডুপুত্রদের জয়ের জন্য কুরুক্ষেত্রে সমবেত হলেন।
Verse 20
प्रभूततरकाष्ठानि दुराधर्षतराणि च । भक्ष्यभोज्यान्नपानानि शतशो5थ सहस्रश:
সেখানে জ্বালানির কাঠ ছিল অঢেল, আর এমন রসদও ছিল যা শত্রুর পক্ষে দখল করা আরও দুরূহ; এবং ভক্ষ্য, ভোজ্য, অন্ন ও পানীয়—সবই শত শত ও সহস্র সহস্র পরিমাণে মজুত ছিল।
Verse 131
शिबिराणि महाहणि राज्ञां तत्र पृथक् पृथक् । विमानानीव राजेन्द्र निविष्टानि महीतले
হে রাজেন্দ্র! সেখানে রাজাদের মহাশিবিরগুলি পৃথক পৃথক স্থানে এমনভাবে ভূমিতে স্থাপিত ছিল যেন আকাশীয় বিমান।
Verse 151
इस प्रकार श्रीमह्याभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत सैन्यनिर्याणपर्वमें पाण्डवसेनाका कुरुक्षेत्रगें प्रवेशविषयक एक सौ इक्यावनवाँ अध्याय पूरा हुआ
এইভাবে শ্রীমহাভারতের উদ্যোগপর্বের অন্তর্গত সৈন্যনির্যাণপর্বে পাণ্ডবসেনার কুরুক্ষেত্রে প্রবেশ-বিষয়ক একশ একান্নতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।
Verse 152
इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि सैन्यनिर्याणपर्वणि शिबिरादिनिर्माणे द्विपज्चाशदधिकशततमो<्ध्याय:
এইভাবে শ্রীমহাভারতের উদ্যোগপর্বে, সৈন্য-নির্যাণপর্বের অন্তর্গত শিবির-নির্মাণ ও বিন্যাস-প্রসঙ্গে একশো বাহান্নতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।
He fears deviation from svadharma if conflict proceeds, especially the ethical burden of engaging ‘avadhya’ persons and the prospect of success obtained through harm to elders and teachers.
Ethically grounded counsel should be offered and evaluated, but when governance becomes unreceptive to dharma-artha reasoning, responsible leadership may require organized preparedness while still preferring reconciliation over excess.
No explicit phalaśruti is presented in the provided passage; the meta-significance lies in documenting the transition from counsel to readiness and framing the ethical rationale for action within the epic’s broader dharma inquiry.