
Udyoga-parva Adhyāya 126 — Kṛṣṇa’s Indictment of Misrule and the Varuṇa Analogy (कृष्णवाक्यं–धर्मपाशदृष्टान्तः)
Upa-parva: Kuru-sabhā Nīti-saṃvāda (Kṛṣṇa–Duryodhana–Bhīṣma Discourse Unit)
Vaiśaṃpāyana narrates a tense Kuru-sabhā moment in which Kṛṣṇa (Dāśārha) addresses Duryodhana with a blend of irony and juridical moral critique. He predicts severe consequences (a “vīraśayana,” heroic bed) and then enumerates Duryodhana’s transgressions: the ill-counseled dice-game with Śakuni, the unjust humiliation of Draupadī, harsh speech by Duryodhana with Karṇa and Duḥśāsana, and repeated covert attempts to eliminate the Pāṇḍavas (Vāraṇāvata plot; poison and other stratagems). Kṛṣṇa frames these as cumulative violations against righteous kin who lived by dharma. Duḥśāsana then warns Duryodhana that reconciliation would lead to their being bound and delivered to the Pāṇḍavas—provoking Duryodhana’s angry departure in contempt of elders and advisers. Bhīṣma cautions that abandoning dharma and artha for rage invites derision in adversity, diagnosing Duryodhana’s governance as driven by anger and greed. Kṛṣṇa responds with exempla: the Yādavas’ removal of Kaṃsa for clan welfare and a mythic-legal precedent where Dharma binds disruptive forces and hands them to Varuṇa. He concludes with a statecraft maxim on sacrificing parts for the whole and urges that binding key instigators (Duryodhana, Karṇa, Śakuni, Duḥśāsana) and reconciling with the Pāṇḍavas could prevent widespread kṣatriya destruction.
Chapter Arc: कौरव-सभा में श्रीकृष्ण का शान्ति-संदेश अभी-अभी गूँजा है; उसी के प्रत्युत्तर में दुर्योधन उठता है—और सभा को ज्ञात हो जाता है कि अब वाणी नहीं, हठ बोलने वाला है। → दुर्योधन कृष्ण पर ‘पाण्डव-भक्ति’ के पक्षपात का आरोप लगाता है और बलाबल की समीक्षा का दावा करते हुए अपने निर्णय को क्षत्रिय-धर्म की आड़ में प्रतिष्ठित करता है। वह युद्ध को ही क्षत्रियों का प्रधान धर्म बताकर समझौते को कायरता के समान ठहराता है। → दुर्योधन का कठोरतम निष्कर्ष—पाण्डवों को राज्य-भाग लौटाना असम्भव है; वह कहता है कि भूमि का त्याग तो दूर, सूई की नोक जितनी भी भूमि पाण्डवों को नहीं देगा, जब तक वह जीवित है। → सभा में दुर्योधन का उत्तर स्पष्ट हो जाता है: शान्ति-प्रयास का द्वार उसके हठ से बन्द है। कृष्ण के दूत-कार्य के सामने अब कौरव-पक्ष की अडिग अस्वीकृति खड़ी है। → कृष्ण इस हठ का क्या प्रत्युत्तर देंगे—और कौरव-सभा में आगे कौन-सा निर्णय (या षड्यंत्र) जन्म लेगा?
Verse 1
हि. 57. 2-8 बछ। से, सप्तविशर्त्याधिकशततमो< ध्याय: श्रीकृष्णको दुर्योधनका उत्तर, उसका पाण्डवोंको राज्य न देनेका निश्चय वैशम्पायन उवाच श्र॒ुत्वा दुर्योधनो वाक्यमप्रियं कुरुसंसदि । प्रत्युवाच महाबाहुं वासुदेव॑ यशस्विनम्
বৈশম্পায়ন বললেন—কুরুসভায় উচ্চারিত অপ্রিয় বাক্য শুনে দুর্যোধন যশস্বী, মহাবাহু বাসুদেবকে প্রত্যুত্তর দিল।
Verse 2
वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! कौरवसभामें यह अप्रिय वचन सुनकर दुर्योधनने यशस्वी महाबाहु वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णको इस प्रकार उत्तर दिया-- ।। प्रसमी क्ष्य भवानेतद् वक्तुमहति केशव । मामेव हि विशेषेण विभाष्य परिगर्हसे,“केशव! आपको अच्छी तरह सोच-विचारकर ऐसी बातें कहनी चाहिये। आप तो विशेषरूपसे मुझे ही दोषी ठहराकर मेरी निन्दा कर रहे हैं
বৈশম্পায়ন বললেন—হে জনমেজয়! কৌরবসভায় সেই অপ্রিয় বাক্য শুনে দুর্যোধন যশস্বী মহাবাহু বসুদেবনন্দন শ্রীকৃষ্ণকে এইভাবে উত্তর দিল— “কেশব! ভেবে-চিন্তে তবেই এমন কথা বলা উচিত। তুমি বিশেষ করে আমাকেই লক্ষ্য করে নিন্দা ও ভর্ত্সনা করছ।”
Verse 3
भक्तिवादेन पार्थानामकस्मान्म धुसूदन । भवान् गर्हयते नित्यं कि समीक्ष्य बलाबलम्,“मधुसूदन! आप पाण्डवोंके प्रेमकी दुहाई देकर जो अकारण ही सदा हमारी निन्दा करते रहते हैं, इसका क्या कारण है? क्या आप हमलोगोंके बलाबलका विचार करके ऐसा करते हैं?
“মধুসূদন! পাণ্ডবদের ভক্তি-প্রেমের কথা অজুহাত করে তুমি কেন অকারণে সর্বদা আমাদের নিন্দা কর? আমাদের শক্তি-দুর্বলতা বিচার করেই কি তুমি এমন বলছ?”
Verse 4
भवान् क्षत्ता च राजा वाप्याचार्यो वा पितामह: । मामेव परिगर्हन्ते नान्यं कंचन पार्थिवम्,“मैं देखता हूँ, आप, विदुरजी, पिताजी, आचार्य अथवा पितामह भीष्म सभी लोग केवल मुझपर ही दोषारोपण करते हैं; दूसरे किसी राजापर नहीं
“আমি দেখছি—তুমি, বিদুর (ক্ষত্তা), রাজা (আমার পিতা), আচার্য এবং পিতামহ—সবাই কেবল আমাকেই দোষারোপ করছ; অন্য কোনো রাজাকে নয়।”
Verse 5
नचाहं लक्षये कंचिद् व्यभिचारमिहात्मन: । अथ सर्वे भवन्तो मां विद्विषन्ति सराजका:,"परंतु मुझे यहाँ अपना कोई दोष नहीं दिखायी देता है। इधर राजा धृतराष्ट्रसहित आप सब लोग अकारण ही मुझसे द्वेष रखने लगे हैं
“কিন্তু এখানে আমি নিজের মধ্যে কোনো দোষ বা আচরণভ্রষ্টতা দেখতে পাই না। তবু রাজা ধৃতরাষ্ট্রসহ তোমরা সবাই অকারণে আমার প্রতি বিদ্বেষ পোষণ করছ।”
Verse 6
न चाहं कंचिदत्यर्थमपराधमरिंदम । विचिन्तयन् प्रपश्यामि सुसूक्ष्ममपि केशव,'शत्रुदमन केशव! मैं अत्यन्त सोच-विचारकर दृष्टि डालता हूँ, तो भी मुझे अपना कोई सूक्ष्म-से-सूक्ष्म अपराध भी नहीं दृष्टिगोचर होता है
“শত্রুদমন কেশব! আমি গভীরভাবে চিন্তা করে দেখলেও আমার কোনো গুরুতর অপরাধ তো দূরের কথা, অতি সূক্ষ্মতম দোষও চোখে পড়ে না।”
Verse 7
प्रियाभ्युपगते द्यूते पाण्डवा मधुसूदन । जिता: शकुनिना राज्यं तत्र कि मम दुष्कृतम्,“मधुसूदन! पाण्डवोंको जूएका खेल बड़ा प्रिय था। इसीलिये वे उसमें प्रवृत्त हुए। फिर यदि मामा शकुनिने उनका राज्य जीत लिया तो इसमें मेरा क्या अपराध हो गया?
বৈশম্পায়ন বললেন—“মধুসূদন! পাশা-খেলা পাণ্ডবদের প্রিয় ছিল, তাই তারা তাতে প্রবৃত্ত হয়েছিল। তারপর যদি মামা শকুনি সেখানে তাদের রাজ্য জিতে নেয়, তবে এতে আমার কী দোষ?”
Verse 8
यत् पुनर्द्रविणं किंचित् तत्राजीयन्त पाण्डवा: । तेभ्य एवाभ्यनुज्ञातं तत् तदा मधुसूदन,“मधुसूदन! उस जूएमें पाण्डवोंने जो कुछ भी धन हारा था, वह सब उसी समय उन्हींको लौटा दिया गया था
বৈশম্পায়ন বললেন—“মধুসূদন! সেই পাশা-খেলায় পাণ্ডবরা যে সামান্যও ধন হারিয়েছিল, সংশ্লিষ্ট সকলের সম্মতিতেই তা তখনই তাদের ফিরিয়ে দেওয়া হয়েছিল।”
Verse 9
अपराधो न चास्माकं यत् ते द्यूते पराजिता: । अजेया जयतां श्रेष्ठ पार्था: प्रत्राजिता वनम्,“विजयी वीरोंमें श्रेष्ठ श्रीकृष्ण! यदि अजेय पाण्डव जूएमें पुन: पराजित हो गये और वनमें जानेको विवश हुए तो यह हमलोगोंका अपराध नहीं है
বৈশম্পায়ন বললেন—“বিজয়ীদের শ্রেষ্ঠ! আমাদের কোনো অপরাধ নয় যে অজেয় বলে খ্যাত সেই পাণ্ডবরা পাশা-খেলায় পরাজিত হয়ে বনে নির্বাসিত হল।”
Verse 10
केन वाप्यपराधेन विरुद्धयन्त्यरिभि: सह । अशक्ता: पाण्डवा: कृष्ण प्रह्ृष्टा: प्रत्यमित्रवत्,“कृष्ण! हमारे किस अपराधसे असमर्थ पाण्डव शत्रुओंके साथ मिलकर हमारा विरोध करते हैं और ऐसा करके भी सहज शत्रुकी भाँति प्रसन्न हो रहे हैं
বৈশম্পায়ন বললেন—“কৃষ্ণ! আমাদের কোন অপরাধে শক্তিহীন পাণ্ডবরা শত্রুদের সঙ্গে মিলিত হয়ে আমাদের বিরোধিতা করছে, আর তা করেও যেন জন্মশত্রুর মতো উল্লসিত হচ্ছে?”
Verse 11
किमस्माभि: कृतं तेषां कस्मिन् वा पुनरागसि । धार्रराष्ट्रानू जिघांसन्ति पाण्डवा: सूंजयैः सह,“हमने उनका क्या बिगाड़ा है? वे पाण्डव हमारे किस अपराधपर सूंजयोंके साथ मिलकर हम धृतराष्ट्र-पुत्रोंका वध करना चाहते हैं?
বৈশম্পায়ন বললেন—“আমরা তাদের কী অনিষ্ট করেছি? আর কোন বিষয়ে আবার অপরাধ করেছি যে পাণ্ডবরা সৃঞ্জয়দের সঙ্গে মিলিত হয়ে ধৃতরাষ্ট্রের পুত্রদের বধ করতে চায়?”
Verse 12
न चापि वयमुग्रेण कर्मणा वचनेन वा । प्रभ्रष्टा: प्रणमामेह भयादपि शतक्रतुम्,“हमलोग किसीके भयंकर कर्म अथवा भयानक वचनसे भयभीत हो क्षत्रियधर्मसे च्युत होकर साक्षात् इन्द्रके सामने भी नतमस्तक नहीं हो सकते
আমরা কারও ভয়ংকর কর্ম বা ভীতিকর বাক্যে ভয় পেয়ে ক্ষত্রিয়ধর্ম থেকে বিচ্যুত হই না; ভয়ে হলেও এখানে স্বয়ং শতক্রতু (ইন্দ্র)-এর সামনেও নত হই না।
Verse 13
नच त॑ कृष्ण पश्यामि क्षत्रधर्ममनुछितम् । उत्सहेत युधा जेतुं यो न: शत्रुनिबर्हण,'शत्रुओंका संहार करनेवाले श्रीकृष्ण! मैं क्षत्रिय-धर्मका अनुष्ठान करनेवाले किसी भी ऐसे वीरको नहीं देखता, जो युद्धमें हम सब लोगोंको जीतनेका साहस कर सके
হে শত্রুনিবর্হণ কৃষ্ণ! আমি এমন কোনো বীরকে দেখি না, যে যথার্থভাবে ক্ষত্রিয়ধর্ম পালন করেও যুদ্ধে আমাদের সকলকে জয় করার সাহস করতে পারে।
Verse 14
न हि भीष्मकृपद्रोणा: सकर्णा मधुसूदन । देवैरपि युधा जेतुं शक््या: किमुत पाण्डवै:,“मधुसूदन! भीष्म, द्रोण, कृपाचार्य और कर्णको तो देवता भी युद्धमें नहीं जीत सकते; फिर पाण्डवोंकी तो बात ही क्या है?
হে মধুসূদন! ভীষ্ম, দ্রোণ, কৃপাচার্য এবং কর্ণ—এদের তো দেবতারাও যুদ্ধে জয় করতে পারে না; তবে পাণ্ডবদের কথা আর কী বলব!
Verse 15
स्वधर्ममनुपश्यन्तो यदि माधव संयुगे । अस्त्रेण निधन काले प्राप्स्याम: स्वरग्यमेव तत्,“माधव! अपने धर्मपर दृष्टि रखते हुए यदि हमलोग युद्धमें किसी समय अस्त्रोंके आघातसे मृत्युको प्राप्त हो जायँ तो वह भी हमारे लिये स्वर्गकी ही प्राप्ति करानेवाली होगी
হে মাধব! স্বধর্মের প্রতি দৃষ্টি রেখে যদি আমরা যুদ্ধে কোনো সময় অস্ত্রাঘাতে মৃত্যু বরণ করি, তবে সেই মৃত্যুও আমাদের জন্য স্বর্গলাভেরই কারণ হবে।
Verse 16
मुख्यश्वैवैष नो धर्म: क्षत्रियाणां जनार्दन । यच्छयीमहि संग्रामे शरतल्पगता वयम्,“'जनार्दन! हम क्षत्रियोंका यही प्रधान धर्म है कि संग्राममें हमें बाण-शय्यापर सोनेका अवसर प्राप्त हो
হে জনার্দন! আমাদের ক্ষত্রিয়দের এটাই প্রধান ধর্ম—যে আমরা সংগ্রামে বাণশয্যায় শয়ন করার সুযোগ লাভ করি।
Verse 17
ते वयं वीरशयन प्राप्स्यामो यदि संयुगे । अप्रणम्यैव शत्रूणां न नस्तप्स्यन्ति माधव,“अतः माधव! हम अपने शत्रुओंके सामने नतमस्तक न होकर यदि युद्धमें वीरशय्याको प्राप्त हों तो इससे हमारे भाई-बन्धुओंको संताप नहीं होगा
বৈশম্পায়ন বললেন— “হে মাধব! যদি আমরা যুদ্ধে শত্রুদের কাছে কখনও নত না হয়ে বীরশয্যা লাভ করি, তবে আমাদের স্বজনেরা আমাদের কারণে লজ্জা বা শোকে দগ্ধ হবে না।”
Verse 18
कश्न जातु कुले जात: क्षत्रधर्मेण वर्तयन् भयाद् वृत्तिं समीक्ष्यैवं प्रणणेदिह कहिचित्
বৈশম্পায়ন বললেন— “উচ্চকুলে জন্ম নিয়ে ক্ষত্রধর্মে চলতে থাকা কে-ই বা ভয়ে, এভাবে জীবিকার হিসাব কষে, এখানে কোনো সাধারণ মানুষের মতো আত্মসমর্পণ করবে?”
Verse 19
“उत्तम कुलमें उत्पन्न होकर क्षत्रियधर्मके अनुसार जीवननिर्वाह करनेवाला कौन ऐसा महापुरुष होगा, जो क्षत्रियोचित वृत्तिपर दृष्टि रखते हुए भी इस प्रकार भयके कारण कभी शत्रुके सामने मस्तक झुकायेगा? ।। उद्यच्छेदेव न नमेदुद्यमो होव पौरुषम् । अप्यपर्वणि भज्येत न नमेदिह कहिचित्,“वीर पुरुषको चाहिये कि वह सदा उद्योग ही करे, किसीके सामने नतमस्तक न हो; क्योंकि उद्योग करना ही पुरुषका कर्तव्य-पुरुषार्थ है। वीर पुरुष असमयमें ही नष्ट भले ही हो जाय, परंतु कभी शत्रुके सामने सिर न झुकावे
বৈশম্পায়ন বললেন— “উচ্চকুলে জন্ম নিয়ে ক্ষত্রধর্মে জীবনধারণকারী কোন মহাপুরুষ, ক্ষত্রিয়োচিত আচরণ জেনেও, ভয়ে শত্রুর সামনে মাথা নত করবে? বীরের উচিত সদা উদ্যোগী থাকা, কখনও নত না হওয়া; কারণ উদ্যোগই পুরুষার্থ। অসময়ে ভেঙে পড়লেও, এখানে কোনো মুহূর্তে শত্রুর কাছে নত হবে না।”
Verse 20
इति मातड्भवचन परीप्सन्ति हितेप्सव: । धर्माय चैव प्रणमेद् ब्राह्मुणेभ्यश्व मद्विध:,“अपना हित चाहनेवाले मनुष्य मातंग मुनिके उपर्युक्त वचनको ही ग्रहण करते हैं; अतः मेरे-जैसा पुरुष केवल धर्म तथा ब्राह्मणको ही प्रणाम कर सकता है (शत्रुओंको नहीं)
বৈশম্পায়ন বললেন— “যারা নিজের মঙ্গল চায়, তারা মুনি মাতঙ্গের এই উপদেশই গ্রহণ করে। অতএব আমার মতো ব্যক্তি কেবল ধর্ম ও ব্রাহ্মণদেরই প্রণাম করে—শত্রুদের নয়।”
Verse 21
अचिन्तयन् कंचिदन्यं यावज्जीवं तथा5<चरेत् । एष धर्म: क्षत्रियाणां मतमेतच्च मे सदा,“वह दूसरे किसीको कुछ भी न समझकर जीवनभर ऐसा ही आचरण (उद्योग) करता रहे; यही क्षत्रियोंका धर्म है और सदाके लिये मेरा मत भी यही है
বৈশম্পায়ন বললেন— “অন্য কারও কথা না ভেবে সে আজীবন এইভাবেই আচরণ করুক। এটাই ক্ষত্রিয়দের ধর্ম—এবং চিরকাল এটাই আমার স্থির মত।”
Verse 22
राज्यांशश्वाभ्यनुज्ञातो यो मे पित्रा पुराभवत् | न स लभ्य: पुनर्जातु मयि जीवति केशव,“केशव! मेरे पिताजीने पूर्वकालमें जो राज्यभाग मेरे अधीन कर दिया है, उसे कोई मेरे जीते-जी फिर कदापि नहीं पा सकता
বৈশম্পায়ন বললেন—হে কেশব! আমার পিতা পূর্বকালে যে রাজ্যাংশ আমাকে অনুমোদন করে দিয়েছিলেন, আমি জীবিত থাকলে তা আর কখনও কারও দ্বারা লাভ করা সম্ভব নয়।
Verse 23
यावच्च राजा धप्रियते धृतराष्ट्रो जनार्दन । न्यस्तशस्त्रा वयं ते वाप्पयुपजीवाम माधव । अप्रदेयं पुरा दत्तं राज्यं परवतो मम,“जनार्दन! जबतक राजा धृतराष्ट्र जीवित हैं, तबतक हमें और पाण्डवोंको हथियार न उठाकर शान्तिपूर्वक जीवन बिताना चाहिये। वृष्णिनन्दन श्रीकृष्ण! पहले भी जो पाण्डवोंको राज्यका अंश दिया गया था, वह उन्हें देना उचित नहीं था; परंतु मैं उन दिनों बालक एवं पराधीन था, अत: अज्ञान अथवा भयसे जो कुछ उन्हें दे दिया गया था, उसे अब पाण्डव पुन: नहीं पा सकते
বৈশম্পায়ন বললেন—হে জনার্দন! যতদিন রাজা ধৃতরাষ্ট্র জীবিত, ততদিন আমাদের ও পাণ্ডবদের অস্ত্র নামিয়ে, হে মাধব, তোমার আশ্রয়ে শান্তিতে জীবন যাপন করা উচিত। পূর্বে যে রাজ্যাংশ দেওয়া হয়েছিল, তা প্রকৃতপক্ষে দেওয়ার যোগ্য ছিল না; তখন আমি শিশু ও পরাধীন ছিলাম—অজ্ঞতা বা ভয়ে যা দেওয়া হয়েছিল, পাণ্ডবরা এখন তা আর পুনরায় পেতে পারে না।
Verse 24
अज्ञानाद् वा भयाद् वापि मयि बाले जनार्दन । न तदद्य पुनर्लभ्यं पाण्डवैर्वष्णिनन्दन,“जनार्दन! जबतक राजा धृतराष्ट्र जीवित हैं, तबतक हमें और पाण्डवोंको हथियार न उठाकर शान्तिपूर्वक जीवन बिताना चाहिये। वृष्णिनन्दन श्रीकृष्ण! पहले भी जो पाण्डवोंको राज्यका अंश दिया गया था, वह उन्हें देना उचित नहीं था; परंतु मैं उन दिनों बालक एवं पराधीन था, अत: अज्ञान अथवा भयसे जो कुछ उन्हें दे दिया गया था, उसे अब पाण्डव पुन: नहीं पा सकते
বৈশম্পায়ন বললেন—হে জনার্দন! অজ্ঞতা বা ভয়ে, যখন আমি শিশু ছিলাম, আমার নামে যা দেওয়া হয়েছিল, হে বৃষ্ণিনন্দন, আজ তা পাণ্ডবরা আর পুনরায় পেতে পারে না।
Verse 25
प्रियमाणे महाबाहौ मयि सम्प्रति केशव । यावद्धि तीक्षणया सूच्या विध्येदग्रेण केशव । तावदप्यपरित्याज्यं भूमेर्न: पाण्डवान् प्रति,“केशव! इस समय मुझ महाबाहु दुर्योधनके जीते-जी पाण्डवोंको भूमिका उतना अंश भी नहीं दिया जा सकता, जितना कि एक बारीक सूईकी नोकसे छिद सकता है
বৈশম্পায়ন বললেন—হে কেশব! আমি মহাবাহু দুর্যোধন জীবিত থাকতে পাণ্ডবদের জন্য আমাদের ভূমির ত্যাগ করা যাবে না; ধারালো সূচের অগ্রভাগে যতটুকু ভূমি বিদ্ধ হতে পারে, ততটুকুও দেওয়া হবে না।
Verse 126
इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत भगवद्यानपर्वमें भीष्म और द्रोणके वाक्यसे सम्बन्ध रखनेवाला एक सौ छब्बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ
এইভাবে শ্রীমহাভারতের উদ্যোগপর্বের অন্তর্গত ভগবদ্যানপর্বে ভীষ্ম ও দ্রোণের উক্তির সঙ্গে সম্পর্কিত একশো ছাব্বিশতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।
Verse 127
इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि भगवद्यानपर्वणि दुर्योधनवाक्ये सप्तविंशत्यधिकशततमो<ध्याय:
এইভাবে শ্রীমহাভারতের উদ্যোগপর্বে, ভগবদ্যানপর্বের অন্তর্গত, দুর্যোধনের বাক্য-প্রসঙ্গে একশ সাতাশতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।
Whether the court should prioritize immediate prestige and factional loyalty or enforce corrective accountability for prior harms—accepting restraint and reparative reconciliation to prevent broader social destruction.
Sovereignty without self-control collapses: anger and greed corrode counsel, and unaddressed wrongdoing multiplies into collective catastrophe; therefore, prudent rule requires listening to elders, limiting instigators, and restoring justice.
No explicit phalaśruti appears in this chapter; its meta-function is historiographic and didactic—preserving a record of counsel rejected and illustrating how ethical failure in deliberation accelerates systemic conflict.