Adhyaya 110
Udyoga ParvaAdhyaya 11036 Verses

Adhyaya 110

Gālava’s Eastern Ascent with Garuḍa; Counsel on Kāla and Upāya (उद्योगपर्व, अध्याय ११०)

Upa-parva: Gālava–Garuḍa Saṃvāda (Episode within Udyoga Parva)

Adhyāya 110 stages a dialogue-led journey motif. Gālava petitions Garuḍa—described with epithets emphasizing his cosmic stature (suparṇa, vinatātmaja, pannagāśana)—to carry him eastward, where Gālava associates the region with the ‘eyes of dharma’ and with divine proximity. As the flight accelerates, Gālava reports perceptual distortions and sensory overload: the landscape appears dragged by wing-wind; ocean waters churn upward; aquatic beings and nāgas seem violently displaced; roaring sound dulls hearing; darkness obscures sun, directions, and sky; only Garuḍa’s gem-like eyes remain visible. Gālava then requests restraint and cessation, stating he cannot endure the velocity. He reveals his underlying anxiety: a pledged obligation to his guru—eight hundred horses of specific description—seems impossible, and he momentarily frames death as an escape route. Garuḍa responds with corrective instruction: self-abandonment is unintelligent; kāla is not fabricated but supreme (parameśvara); and a viable upāya exists that Gālava failed to request earlier. The chapter closes with a practical transition point: the sighting of Ṛṣabha mountain in the ocean, where they will rest and then return, shifting from overwhelming motion to planned action.

Chapter Arc: युपर्ण (गरुड़) गालव से कहता है कि अब वह उस दिशा का वर्णन करेगा जिसका नाम ही ‘उत्तर’ है—जो पाप से ‘उत्तार’ करती है और निःश्रेयस की ओर ले जाती है। → उत्तर दिशा को स्वर्ण-निधियों, श्रेष्ठ मार्गों और धर्म-निवास के रूप में चित्रित किया जाता है—जहाँ असौम्य, अविधेय और अधर्मी जन नहीं टिकते। वर्णन आगे बढ़ते-बढ़ते वहाँ की दिव्य भौगोलिकता (मन्दाकिनी, मन्दराचल, सौगन्धिक वन) और राक्षस-रक्षा जैसे विरोधी तत्त्वों को भी जोड़ देता है, जिससे यह दिशा केवल रमणीय नहीं, परीक्षा-स्थल भी बनती है। → ‘धामा’ नामक सत्यवादी महात्मा मुनियों का रहस्यपूर्ण उल्लेख—उनकी मूर्ति/आकृति तक ज्ञात नहीं, फिर भी वे गंगामहाद्वार की रक्षा करते हैं; साथ ही यह उद्घोष कि उत्तर दिशा ‘सर्वकर्मसु चोत्तरा’ है—समस्त शुभ कर्मों के लिए सर्वोत्तम। → वर्णन उत्तर दिशा की उत्कृष्टता पर ठहरता है—धन, तप, सत्य और रक्षण-व्यवस्था का संगम; और संकेत मिलता है कि यहाँ दिक्पाल प्रातः-सायं एकत्र होकर ‘किसका कार्य क्या है’ पूछते हैं—अर्थात् ब्रह्माण्डीय कर्तव्य-चक्र निरन्तर चलता है। → युपर्ण चारों दिशाओं का क्रमशः वर्णन पूरा कर गालव से निर्णायक प्रश्न करता है—‘अब बताओ, किस दिशा में जाना चाहते हो?’

Shlokas

Verse 1

अपन का छा 2 एकादरशाधिकशततमोड< ध्याय: उत्तर दिशाका वर्णन युपर्ण उवाच यस्मादुत्तार्यते पापाद्‌ यस्मान्नि:श्रेयसो 5 ्षुते । अस्मादुत्तारणबलादुत्तरेत्युच्यते द्विज,गरुड़ कहते हैं--गालव! इस मार्गसे जानेपर मनुष्यका पापसे उद्धार हो जाता है और वह कल्याणमय स्वर्गीय सुखोंका उपभोग करता है; अतः इस उत्तारण (संसारसागरसे पार उतारने)-के बलसे इस दिशाको उत्तरदिशा कहते हैं

যুপর্ণ বললেন—হে গালব! এই পথে গেলে মানুষ পাপ থেকে পার হয়ে যায় এবং পরম কল্যাণ লাভ করে তা ভোগ করে; অতএব, হে দ্বিজ, এই ‘উত্তারণ’-শক্তির কারণেই এই দিককে ‘উত্তর’ বলা হয়।

Verse 2

उत्तरस्य हिरण्यस्य परिवापश्ष गालव । मार्ग: पश्चिमपूर्वाभ्यां दिग्भ्यां वै मध्यम: स्मृत:,गालव! यह उत्तर दिशा उत्कृष्ट सुवर्ण आदि निधियोंकी अधिष्ठान है (इसलिये भी इसका नाम उत्तर है)। यह उत्तर मार्ग पश्चिम और पूर्व दिशाओंका मध्यवर्ती बताया गया है

যুপর্ণ বললেন—হে গালব! উত্তর দিক উৎকৃষ্ট স্বর্ণ ও অন্যান্য ধন-নিধির আসন ও উৎস বলে গণ্য। ‘উত্তর পথ’ পশ্চিম ও পূর্ব দিকের মধ্যবর্তী মধ্যম পথ বলেই স্মৃত।

Verse 3

अस्यां दिशि वरिष्ठायामुत्तरायां द्विजर्षभ । नासौम्यो नाविधेयात्मा नाधर्मो वसते जन:,द्विजश्रेष्ठ) इस गौरवशालिनी दिशामें ऐसे लोगोंका वास नहीं है, जो सौम्य स्वभावके न हों, जिन्होंने अपने मनको वशमें न किया हो तथा जो धर्मका पालन न करते हों

হে দ্বিজশ্রেষ্ঠ! এই সর্বোৎকৃষ্ট, গৌরবময় উত্তর দিশায় এমন কোনো জন বাস করে না যে কোমলস্বভাব নয়, যে মনকে সংযত করেনি, অথবা যে ধর্মে স্থিত নয়।

Verse 4

अत्र नारायण: कृष्णो जिष्णुश्वैव नरोत्तम: । बदर्यामाश्रमपदे तथा ब्रह्मा च शाश्वत:,इसी दिशामें बदरिकाश्रमतीर्थ है, जहाँ सच्चिदानन्दस्वरूप श्रीनारायण, विजयशील नरश्रेष्ठ नर और सनातन ब्रह्माजी निवास करते हैं

এই দিকেই বদরীর পবিত্র আশ্রমভূমি আছে; সেখানে নারায়ণ—স্বয়ং কৃষ্ণ—বিজয়ী নরশ্রেষ্ঠ ‘নর’ এবং শাশ্বত ব্রহ্মা অধিষ্ঠান করেন।

Verse 5

अत्र वै हिमवत्पृष्ठे नित्यमास्ते महेश्वर: । प्रकृत्या पुरुष: सार्थ युगान्ताग्निसमप्रभ:,उत्तरमें ही हिमालयके शिखरपर प्रलयकालीन अग्निके समान तेजस्वी अन्तर्यामी भगवान्‌ महेश्वर भगवती उमाके साथ नित्य निवास करते हैं

এখানেই হিমবতের উচ্চ পৃষ্ঠদেশে মহেশ্বর নিত্য অধিষ্ঠান করেন—স্বভাবতই যুগান্তের অগ্নির ন্যায় দীপ্তিমান, অন্তর্যামী; দেবী উমার সহিত।

Verse 6

न स दृश्यो मुनिगणैस्तथा देवै: सवासवै: । गन्धर्वयक्षसिद्धिर्वा नरनारायणादूृते,वे भगवान्‌ नर और नारायणके सिवा और किसीकी दृष्टिमें नहीं आते। समस्त मुनिगण, गन्धर्व, यक्ष, सिद्ध अथवा देवताओंसहित इन्द्र भी उनका दर्शन नहीं कर पाते हैं

নর-নারায়ণ ব্যতীত তিনি কারও দৃষ্টিগোচর নন। মুনিগণ, গন্ধর্ব, যক্ষ, সিদ্ধ—এমনকি ইন্দ্রসহ দেবতারাও তাঁর দর্শন লাভ করতে পারে না।

Verse 7

अत्र विष्णु: सहस्राक्ष: सहस्नरचरणोडव्यय: । सहस्रशिरस: श्रीमानेक: पश्यति मायया

এখানেই বিষ্ণু—সহস্রনয়ন, সহস্রপদ, অব্যয়; সহস্রশির, দীপ্তিমান, তবু এক। তিনি তাঁর মায়াশক্তিতে বহুরূপ জগতকে দর্শন ও নিয়ন্ত্রণ করেন—প্রকাশ করেন যে দৃশ্যমান বহুত্বের অন্তরালে এক অক্ষয় প্রভুই বিরাজমান, যার দৃষ্টি সর্বব্যাপী।

Verse 8

यहाँ सहस्ौ्रों नेत्रों, सहस्रों चरणों और सहस्रों मस्तकोंवाले एकमात्र अविनाशी श्रीमान्‌ भगवान्‌ विष्णु ही उन मायाविशिष्ट महेश्वरका साक्षात्कार करते हैं ।। अत्र राज्येन विप्राणां चन्द्रमा क्षाभ्यषिच्यत । अत्र गड़ां महादेव: पतन्तीं गगनाच्च्युताम्‌

এখানে সহস্রনয়ন, সহস্রপদ ও সহস্রশিরবিশিষ্ট, একমাত্র অবিনাশী দীপ্তিমান ভগবান বিষ্ণুই মায়াবিশিষ্ট মহেশ্বরকে প্রত্যক্ষ উপলব্ধি করেন। এখানেই ব্রাহ্মণদের রাজ্যাভিষেকে চন্দ্রের অভিষেক হয়েছিল। এখানেই মহাদেব আকাশ থেকে পতিত গঙ্গাকে ধারণ করেছিলেন।

Verse 9

प्रतिगृह्य ददौ लोके मानुषे ब्रह्म॒वित्तम । उत्तर दिशामें ही चन्द्रमाका द्विजराजके पदपर अभिषेक हुआ था। वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ गालव! यहीं आकाशसे गिरती हुई गंगाको महादेवजीने अपने मस्तकपर धारण किया और उन्हें मनुष्यलोकमें छोड़ दिया ।। अत्र देव्या तपस्तप्तं महेश्वरपरीप्सया

তা গ্রহণ করে, হে ব্রহ্মবিদ্যায় শ্রেষ্ঠ, তিনি মানবলোকে দান করেছিলেন। উত্তর দিকেই দ্বিজরাজ চন্দ্রের নিজ পদে অভিষেক হয়েছিল। হে বেদজ্ঞদের অগ্রগণ্য গালব! এখানেই মহাদেব আকাশ থেকে পতিত গঙ্গাকে শিরে ধারণ করে পরে মানবলোকে প্রবাহিত করেছিলেন। এখানেই দেবী মহেশ্বরলাভের আকাঙ্ক্ষায় তপস্যা করেছিলেন।

Verse 10

अत्र राक्षसयक्षाणां गन्धर्वाणां च गालव,गालव! इसी दिशामें कैलास पर्वतपर राक्षस, यक्ष और गन्धर्वोका आधिपत्य करनेके लिये धनदाता कुबेरका अभिषेक हुआ था। उत्तर दिशामें ही रमणीय चैत्ररथवन और वैखानस ऋषियोंका आश्रम है

হে গালব! এই অঞ্চলেই, কৈলাস পর্বতে, রাক্ষস, যক্ষ ও গন্ধর্বদের উপর আধিপত্যের জন্য ধনদাতা কুবেরের অভিষেক হয়েছিল। আর উত্তর দিকেই রয়েছে মনোরম চৈত্ররথ বন এবং বৈখানস ঋষিদের আশ্রম।

Verse 11

आधिपत्येन कैलासे धनदो<प्यभिषेचित: । अत्र चैत्ररथं रम्यमत्र वैखानसाश्रम:,गालव! इसी दिशामें कैलास पर्वतपर राक्षस, यक्ष और गन्धर्वोका आधिपत्य करनेके लिये धनदाता कुबेरका अभिषेक हुआ था। उत्तर दिशामें ही रमणीय चैत्ररथवन और वैखानस ऋषियोंका आश्रम है

ইউপরাণ বললেন—“কৈলাসে আধিপত্যের জন্য ধনদাতা কুবেরেরও অভিষেক হয়েছিল। এখানেই মনোরম চৈত্ররথ বন, এখানেই বৈখানস ঋষিদের আশ্রম—হে গালব!”

Verse 12

अत्र मन्दाकिनी चैव मन्दरक्ष द्विजर्षभ । अत्र सौगन्धिकवन नैर्ऋतैरभिरक्ष्यते,द्विजश्रेष्ठड. यहीं मन्दाकिनी नदी और मन्दराचल हैं। इसी दिशामें राक्षसगण सौगन्धिकवनकी रक्षा करते हैं

হে দ্বিজশ্রেষ্ঠ! এখানে মন্দাকিনী নদী ও মন্দর পর্বত আছে। এই অঞ্চলেই নৈঋত (রাক্ষসগণ) সৌগন্ধিক বন রক্ষা করে।

Verse 13

शाद्वलं कदलीस्कन्धमत्र संतानका नगा: । अत्र संयमनित्यानां सिद्धानां स्वैरचारिणाम्‌

যুপর্ণ বললেন—এখানে সবুজ শ্যাদ্বল ভূমি; এখানে কলাগাছের কাণ্ডের গুচ্ছ; আর এখানে সান্তানক বৃক্ষসমূহ দাঁড়িয়ে আছে। এ সেই অঞ্চল, যেখানে সংযমে নিত্যস্থিত সিদ্ধগণ স্বচ্ছন্দে বিচরণ করেন।

Verse 14

विमानान्यनुरूपाणि कामभोग्यानि गालव । यहीं हरी-हरी घासोंसे सुशोभित कदलीवन है और यहीं कल्पवृक्ष शोभा पाते हैं। गालव! इसी दिशामें सदा संयम-नियमका पालन करनेवाले स्वच्छन्दचारी सिद्धोंके इच्छानुसार भोगोंसे सम्पन्न एवं मनोनुकूल विमान विचरते हैं ।। १३ $ ।। अत्र ते ऋषय: सप्त देवी चारुन्धती तथा

যুপর্ণ বললেন—হে গালব! এখানে স্বভাবানুরূপ, কাম্য ভোগ দানকারী বিমানসমূহ বিচরণ করে। এখানে তাজা সবুজ ঘাসে শোভিত কলাবন আছে এবং এখানে কল্পবৃক্ষসমূহ দীপ্তিমান। এই দিকেই সংযম-নিয়মে নিত্যস্থিত, স্বচ্ছন্দবিহারী সিদ্ধগণ মনোহর বিমানে ইচ্ছামতো বিচরণ করে এবং অন্তরের কামনা-সঙ্গত সিদ্ধি ভোগ করে। এখানে সপ্তর্ষি ও দেবী অরুন্ধতীও আছেন।

Verse 15

अत्र यज्ञं समासाद्य ध्रुवं स्थाता पितामह:

এখানে এই যজ্ঞে উপস্থিত হয়ে পিতামহ নিশ্চয়ই ধ্রুবের ন্যায় অচল হয়ে অবস্থান করবেন।

Verse 16

ज्योतींषि चन्द्रसूर्यों च परिवर्तन्ति नित्यश: । इसी दिशामें ब्रह्माजी यज्ञानुष्ठानमें प्रवृत्त होकर नियमितरूपसे निवास करते हैं। नक्षत्र, चन्द्रमा तथा सूर्य भी सदा इसीमें परिभ्रमण करते हैं ।। १५ ह ।। अत्र गड़ामहाद्ारं रक्षन्ति द्विजसत्तम

যুপর্ণ বললেন—নক্ষত্র, চন্দ্র ও সূর্য নিত্যই তাদের নির্ধারিত পথে পরিভ্রমণ করে। হে দ্বিজসত্তম! এখানে এই মহাদ্বারে সতর্ক প্রহরীরা পাহারা দেয়।

Verse 17

धामा नाम महात्मानो मुनय: सत्यवादिन: । न तेषां ज्ञायते मूर्तिनाकृतिर्न तपश्चितम्‌

যুপর্ণ বললেন—“ধামা নামে মহাত্মা মুনিগণ সত্যবাদী; কিন্তু তাঁদের দেহরূপ, আকৃতি এবং তপস্যার দৃশ্যমান লক্ষণ কারও জানা যায় না।”

Verse 18

परिवर्तसहस्राणि कामभोज्यानि गालव । द्विजश्रेष्ठ! इसी दिशामें धाम नामसे प्रसिद्ध सत्यवादी महात्मा मुनि श्रीगंगामहाद्वारकी रक्षा करते हैं। उनकी मूर्ति, आकृति तथा संचित तपस्याका परिमाण किसीको ज्ञात नहीं होता है। गालव! वे सहस्रों युगान्‍्तकालतककी आयु इच्छानुसार भोगते हैं ।। यथा यथा प्रविशति तस्मात्‌ परतरं नर:,द्विजश्रेष्ठ! मनुष्य ज्यों-ज्यों गंगामहाद्वारसे आगे बढ़ता है, वैसे-ही-वैसे वहाँकी हिमराशिमें गलता जाता है। विप्रवर गालव! साक्षात्‌ भगवान्‌ नारायण तथा विजयशील अविनाशी महात्मा नरको छोड़कर दूसरा कोई मनुष्य पहले कभी गंगामहाद्वारसे आगे नहीं गया है। इसी दिशामें कैलासपर्वत है, जो कुबेरका स्थान बताया गया है

যুপর্ণ বললেন—“হে গালব, দ্বিজশ্রেষ্ঠ! এই দিকেই ধামন নামে প্রসিদ্ধ সত্যবাদী মহাত্মা মুনি গঙ্গার মহাদ্বার রক্ষা করেন। তাঁর মূর্তি, আকৃতি এবং সঞ্চিত তপস্যার পরিমাণ কারও জানা নেই। হে গালব, তিনি সহস্র সহস্র যুগান্ত পর্যন্ত ইচ্ছামতো আয়ু ভোগ করেন। আর, হে ব্রাহ্মণশ্রেষ্ঠ, যে মানুষ গঙ্গার সেই মহাদ্বারের পর এগোয়, সে সেখানে তুষাররাশির মধ্যে ক্রমে ক্রমে গলে যায়। হে বিপ্রবর গালব, স্বয়ং ভগবান নারায়ণ এবং বিজয়শীল, অবিনাশী মহাত্মা নর ব্যতীত আর কোনো মানুষ কখনও গঙ্গার মহাদ্বারের পর যায়নি। এই দিকেই কৈলাস পর্বত—কুবেরের আবাস বলে খ্যাত।”

Verse 19

तथा तथा द्विजश्रेष्ठ प्रविलियति गालव । नैतत्‌ केनचिदन्येन गतपूर्व द्विजर्षभ,द्विजश्रेष्ठ! मनुष्य ज्यों-ज्यों गंगामहाद्वारसे आगे बढ़ता है, वैसे-ही-वैसे वहाँकी हिमराशिमें गलता जाता है। विप्रवर गालव! साक्षात्‌ भगवान्‌ नारायण तथा विजयशील अविनाशी महात्मा नरको छोड़कर दूसरा कोई मनुष्य पहले कभी गंगामहाद्वारसे आगे नहीं गया है। इसी दिशामें कैलासपर्वत है, जो कुबेरका स्थान बताया गया है

যুপর্ণ বললেন—“হে ব্রাহ্মণশ্রেষ্ঠ, হে গালব! ঠিক তেমনই সেখানে তুষাররাশি ক্রমে ক্রমে গলে যায়। হে দ্বিজর্ষভ, ভগবান নারায়ণ এবং বিজয়শীল, অবিনাশী মহাত্মা নর ব্যতীত আর কেউ পূর্বে গঙ্গার মহাদ্বারের পর গমন করেনি। এই দিকেই কৈলাস পর্বত—কুবেরের আবাস বলে স্মৃত।”

Verse 20

ऋते नारायण देवं नरं वा जिष्णुमव्ययम्‌ । अत्र कैलासमित्युक्त स्थानमैलविलस्य तत्‌,द्विजश्रेष्ठ! मनुष्य ज्यों-ज्यों गंगामहाद्वारसे आगे बढ़ता है, वैसे-ही-वैसे वहाँकी हिमराशिमें गलता जाता है। विप्रवर गालव! साक्षात्‌ भगवान्‌ नारायण तथा विजयशील अविनाशी महात्मा नरको छोड़कर दूसरा कोई मनुष्य पहले कभी गंगामहाद्वारसे आगे नहीं गया है। इसी दिशामें कैलासपर्वत है, जो कुबेरका स्थान बताया गया है

যুপর্ণ বললেন—“দিব্য নারায়ণদেব এবং জিষ্ণু, অবিনাশী নর ব্যতীত কোনো মানুষ পূর্বে গঙ্গার মহাদ্বারের পর যায়নি। হে দ্বিজশ্রেষ্ঠ, এই দিকেই ‘কৈলাস’ নামে পর্বত—ঐলবিল (কুবের)-এর আবাস বলে ঘোষিত।”

Verse 21

अत्र विद्युत्प्रभा नाम जज्ञिरेडप्सरसो दश । अत्र विष्णुपदं नाम क्रमता विष्णुना कृतम्‌,उशीरबीजे विप्रर्षे यत्र जाम्बूनदं सर: । यहीं विद्युत्प्रभा नामसे प्रसिद्ध दस अप्सराएँ उत्पन्न हुई थीं। ब्रह्मन्‌! त्रिलोकीको नापते समय भगवान्‌ विष्णुने इसी दिशामें अपना चरण रखा था। उत्तर दिशामें भगवान्‌ विष्णुका वह चरणचिह्न (हरिकी पैंड़ी) आज भी मौजूद है। द्विजश्रेष्ठ! ब्रह्मर्ष! उत्तर-दिशाके ही उशीरबीज नामक स्थानमें, जहाँ सुवर्णमय सरोवर है, राजा मरुत्तने यज्ञ किया था

যুপর্ণ বললেন—“এখানেই ‘বিদ্যুৎপ্রভা’ নামে দশ অপ্সরা জন্মেছিল। এখানেই ‘বিষ্ণুপদ’ নামে সেই পদচিহ্ন, যা ত্রিলোক পরিমাপ করতে গিয়ে ভগবান বিষ্ণু স্থাপন করেছিলেন। হে বিপ্রর্ষি, উত্তরে উশীরবীজ নামক স্থানে—যেখানে জাম্বূনদ-সম স্বর্ণময় সরোবর—সেখানে মহাত্মা রাজা মরুত্ত এক যজ্ঞ সম্পন্ন করেছিলেন।”

Verse 22

त्रिलोककिक्रमे ब्रह्मन्नुत्तरां दिशमाश्रितम्‌ । अत्र राज्ञा मरुत्तेन यज्ञेनेष्ट द्विजोत्तम

যুপর্ণ বললেন— হে ব্রাহ্মণ, এই অঞ্চল উত্তর দিকাভিমুখে অবস্থিত এবং ‘ত্রিলোক-বিক্রমী’ নামে প্রসিদ্ধ। হে দ্বিজোত্তম, এখানেই রাজা মরুত্ত এক মহাযজ্ঞ সম্পন্ন করেছিলেন।

Verse 23

जीमूतस्यात्र विप्रर्षेरुपतस्थे महात्मन:

এখানে সেই মহাত্মা ব্রহ্মর্ষি জীমূতের নিকট উপস্থিত হয়ে শ্রদ্ধাভরে তাঁর সেবায় দাঁড়ালেন।

Verse 24

साक्षाद्धमवत: पुण्यो विमल: कनकाकर: । इसी दिशामें ब्रह्मर्षि महात्मा जीमूतके समक्ष हिमालयकी पवित्र एवं निर्मल स्वर्णनिधि (सोनेकी खान) प्रकट हुई थी ।। २३ इ ।। ब्राह्मणेषु च यत्‌ कृत्स्नं स्वन्तं कृत्वा धनं महत्‌

ধর্মপরায়ণ জনের জন্য পুণ্য ও নির্মল স্বর্ণখনি যেন প্রত্যক্ষই প্রকাশ পায়। আর যে মহাধন মানুষ নিজের করে লাভ করে, তা সম্পূর্ণই ব্রাহ্মণদের কল্যাণে নিয়োজিত করা উচিত।

Verse 25

अत्र नित्यं दिशाम्पाला: सायम्प्रातर्द्धिजर्षभ

হে দ্বিজশ্রেষ্ঠ, এখানে দিক্‌পালগণ নিত্য উপস্থিত; সন্ধ্যা ও প্রাতে—উভয় সময়েই—তাঁরা এখানে প্রহরা দেন।

Verse 26

एवमेषा द्विजश्रेष्ठ गुणैरन्यैर्दिगुत्तरा

এইরূপে, হে দ্বিজশ্রেষ্ঠ, এই দিকটি তার বহু গুণে সকল দিকের ঊর্ধ্বে।

Verse 27

उत्तरेति परिख्याता सर्वकर्मसु चोत्तरा । द्विजश्रेष्ठल इन सब कारणोंसे तथा अन्यान्य गुणोंके कारण यह दिशा उत्कृष्ट है और समस्त शुभ कर्मोके लिये भी यही उत्तम मानी गयी है। इसलिये इसे उत्तर कहते हैं ।। २६ # || एता विस्तरशस्तात तव संकीर्तिता दिश:

এই দিক ‘উত্তরা’ নামে প্রসিদ্ধ এবং সকল কর্মে শ্রেষ্ঠ বলে গণ্য। হে দ্বিজশ্রেষ্ঠ! এই সকল কারণ এবং আরও নানা গুণের জন্য এই দিক উৎকৃষ্ট; সকল শুভকর্মের জন্যও এটিই সর্বোত্তম বলে মানা হয়। তাই একে ‘উত্তর’ বলা হয়।

Verse 28

उद्यतोडहं द्विजश्रेष्ठ तव दर्शयितुं दिश: । पृथिवीं चाखिलां ब्रह्मुंस्तस्मादारोह मां द्विज,द्विजश्रेष्ठ! मैं तुम्हें सम्पूर्ण पृथ्वी तथा समस्त दिशाओंका दर्शन करानेके लिये उद्यत हूँ; अतः तुम मेरी पीठपर बैठ जाओ

হে দ্বিজশ্রেষ্ঠ! আমি তোমাকে সকল দিক এবং সমগ্র পৃথিবী দেখাতে প্রস্তুত; অতএব, হে ব্রাহ্মণ, আমার পিঠে আরোহন করো।

Verse 96

अत्र कामश्न रोषश्व शैलश्लोमा च सम्बभु: | यहीं पार्वतीदेवीने भगवान्‌ महेश्वरको पतिरूपमें प्राप्त करनेके लिये कठोर तपस्या की थी और इसी दिशामें महादेवजीको मोहित करनेके लिये काम प्रकट हुआ। फिर उसके ऊपर भगवान्‌ शंकरका क्रोध हुआ। उस अवसरपर गिरिराज हिमालय और उमा भी वहाँ विद्यमान थीं (इस प्रकार ये सब लोग वहाँ एक ही समयमें प्रकाशित हुए)

এখানেই কাম ও রোষ প্রকাশ পেল, এবং শৈলশ্লোমাও আবির্ভূত হল। এই স্থানেই দেবী পার্বতী ভগবান মহেশ্বরকে পতিরূপে লাভ করতে কঠোর তপস্যা করেছিলেন; এই দিকেই মহাদেবকে মোহিত করতে কাম উদ্ভূত হয়েছিল, এবং তারপর শঙ্করের ক্রোধ তার উপর নেমে এসেছিল। সেই সময় পর্বতরাজ হিমালয় ও উমাও সেখানে উপস্থিত ছিলেন—এইভাবে এক দৃশ্যে সকলেই একসঙ্গে প্রকাশিত হয়েছিল।

Verse 110

इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत भगवद्यानपर्वमें गालवचरित्रविषयक एक सौ दसवाँ अध्याय पूरा हुआ

এইভাবে শ্রীমহাভারতের উদ্যোগপর্বের অন্তর্গত ভগবদ্যানপর্বে গালবচরিত-বিষয়ক একশো দশম অধ্যায় সমাপ্ত হল।

Verse 111

इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि भगवद्यानपर्वणि गालवचरिते एकादशाधिकशततमो<ध्याय:

ইতি শ্রীমহাভারতে উদ্যোগপর্বে ভগবদ্যানপর্বে গালবচরিতে একশো এগারোতম অধ্যায়।

Verse 146

अत्र तिष्ठति वै स्वातिरत्रास्या उदय: स्मृत: । इसी दिशामें अरुन्धतीदेवी और सप्तर्षि प्रकाशित होते हैं। इसीमें स्वाती नक्षत्रका निवास है और यहीं उसका उदय होता है

যুপর্ণ বললেন—“এখানেই স্বাতী নক্ষত্রের নিবাস, এবং এখানেই তার উদয় ঘটে বলে জানা যায়। এই দিকেই অরুন্ধতী দেবী ও সপ্তর্ষি দীপ্তিমান হয়ে দেখা দেন—যথার্থ বোধ ও সংযত পর্যবেক্ষণের জন্য আকাশীয় দিকনির্ণয়ের চিহ্নস্বরূপ।”

Verse 226

उशीरबीजे विप्रर्षे यत्र जाम्बूनदं सर: । यहीं विद्युत्प्रभा नामसे प्रसिद्ध दस अप्सराएँ उत्पन्न हुई थीं। ब्रह्मन्‌! त्रिलोकीको नापते समय भगवान्‌ विष्णुने इसी दिशामें अपना चरण रखा था। उत्तर दिशामें भगवान्‌ विष्णुका वह चरणचिह्न (हरिकी पैंड़ी) आज भी मौजूद है। द्विजश्रेष्ठ! ब्रह्मर्ष! उत्तर-दिशाके ही उशीरबीज नामक स्थानमें, जहाँ सुवर्णमय सरोवर है, राजा मरुत्तने यज्ञ किया था

যুপর্ণ বললেন—“হে ব্রাহ্মণশ্রেষ্ঠ, হে ঋষি! উশীরবীজ নামে যে দেশে জাম্বূনদ-সোনার এক সরোবর আছে। সেখানেই বিদ্যুৎপ্রভা নামে প্রসিদ্ধ দশ অপ্সরা জন্মেছিল। ব্রহ্মন! ত্রিলোক পরিমাপের সময় ভগবান বিষ্ণু এই দিকেই পদ স্থাপন করেছিলেন। উত্তর দিশায় বিষ্ণুর সেই পদচিহ্ন ‘হরিকী পৈণ্ডী’ নামে আজও বিদ্যমান। হে দ্বিজশ্রেষ্ঠ, হে ব্রহ্মর্ষি! সেই উত্তরদেশের উশীরবীজেই, যেখানে স্বর্ণময় সরোবর, রাজা মরুত্ত এক মহাযজ্ঞ সম্পন্ন করেছিলেন।”

Verse 246

वव्रे धनं महर्षि: स जैमूतं तद्‌ धनं ततः । उस सम्पूर्ण विशाल धनराशिको उन्होंने ब्राह्मणोंमें बाँ.कठर उसका सदुपयोग किया और ब्राह्मणोंसे यह वर माँगा कि यह धन मेरे नामसे प्रसिद्ध हो। इस कारण वह धन 'जैमूत' नामसे प्रसिद्ध हुआ

যুপর্ণ বললেন—“সেই মহর্ষি ধন প্রার্থনা করেছিলেন; আর তখন থেকেই সেই ধন ‘জৈমূত’ নামে প্রসিদ্ধ হলো। তিনি বিপুল ধনরাশি সম্পূর্ণভাবে ব্রাহ্মণদের মধ্যে বিতরণ করলেন, কঠোর সংযমে তার সদ্ব্যবহার করলেন, এবং তাঁদের কাছে বর চাইলেন—এই ধন যেন আমার নামেই খ্যাত হয়; তাই তা ‘জৈমূত’ নামে পরিচিত হলো।”

Verse 256

कस्य कार्य किमिति वै परिक्रोशन्ति गालव । विप्रवर गालव! यहाँ प्रतिदिन सबेरे और संध्याके समय सभी दिक्‌पाल एकत्र हो उच्च स्वरसे यह पूछते हैं कि किसको क्‍या काम है?

যুপর্ণ বললেন—“হে গালব, হে বিপ্রবর! এখানে প্রতিদিন প্রভাতে ও সন্ধ্যায় সকল দিক্‌পাল একত্র হয়ে উচ্চস্বরে জিজ্ঞাসা করেন—‘কার কী কাজ, আর কী করণীয়?’”

Verse 276

चतस्र: क्रमयोगेन कामाशां गन्तुमिच्छसि । तात! इस प्रकार मैंने क्रमश: चारों दिशाओंका तुम्हारे सामने विस्तारपूर्वक वर्णन किया है। कहो, किस दिशामें चलना चाहते हो?

“বৎস! এভাবে আমি ক্রমানুসারে চার দিকই তোমার সামনে বিস্তারে বর্ণনা করলাম। এখন বলো—তুমি কোন দিকেই যেতে চাও?”

Frequently Asked Questions

Gālava confronts a dharma-sankat between sustaining life while facing an apparently impossible guru-obligation (the promised horses) and the temptation to treat self-abandonment as a solution; the text rejects despair as an ethical exit.

The chapter teaches that kāla (time) is an overriding reality rather than a convenient fiction, and that disciplined recourse to upāya—seeking and applying workable means—should replace panic, fatalism, or self-destructive impulses.

No explicit phalaśruti is stated here; the meta-commentary is implicit through Garuḍa’s instruction that aligning action with kāla and upāya preserves dharma and keeps obligations within a solvable human horizon.