
अभिमन्युविलापः (Abhimanyu-vilāpa) — Uttarā’s lament, observed and framed by Gandhārī
Upa-parva: Strī-vilāpa (Lamentations of the Women) — Abhimanyu and Virāṭa mourning episode
Gandhārī addresses Kṛṣṇa, identifying Abhimanyu as a warrior praised for strength and valor, once a terror to others yet now subject to death (1–3). She points out Uttarā, Virāṭa’s daughter and Abhimanyu’s wife, mourning beside the fallen hero (4–5). Uttarā performs intimate gestures of grief—touching, embracing, smelling his face, removing armor, and inspecting wounds—while speaking to Kṛṣṇa and comparing Abhimanyu’s qualities to Kṛṣṇa’s radiance and appearance (6–12). Her speech shifts from tender address to accusatory astonishment at the circumstances of his killing by multiple elite fighters, naming figures associated with the act (15–18). The lament expands into reflections on the hollowness of political gain without him, and on her desire to follow him to the world attained by the virtuous (19–26). Other women restrain and remove the distraught Uttarā (27–28). The scene then turns to Virāṭa’s body, described as attacked by scavenging birds and animals, while the women are unable to prevent it, underscoring post-war disorder and helplessness (29–31). The chapter closes by directing attention to multiple slain figures, reinforcing the scale of loss (32).
Chapter Arc: युद्ध-भूमि के शवों के बीच गान्धारी केशव से प्रश्न करती है—जिसे बल-शौर्य में अतुल कहा गया, वह वीर अब मृत्यु के वश कैसे पड़ा है? → गान्धारी की दृष्टि एक-एक शव पर ठहरती है; वह उन योद्धाओं को पहचानती है जो कभी ‘दुर्भेद्य’ थे, और अब निःशब्द हैं। वह कृष्ण से पूछती है कि जिनके लिए सेनाएँ चीरना खेल था, वे स्वयं कैसे कट गए। → गान्धारी का विलाप अभिमन्यु पर केंद्रित हो जाता है—वह उसके मुख की कमल-सी शोभा, शंख-सी ग्रीवा और मारे जाने पर भी न बुझती प्रभा देखती है; फिर मृत अभिमन्यु से ही बोल उठती है—‘तुम थककर सुख-नींद में हो क्या? तुम मुझे उत्तर क्यों नहीं देते?’ → वह अभिमन्यु की ‘अनाथ-सा’ मारे जाने की पीड़ा को शब्द देती है—पाण्डव-पांचालों के देखते हुए भी उसे घेरकर क्यों मारा गया; शोक का स्वर व्यक्तिगत मातृत्व से उठकर युद्ध-नीति और सामूहिक अपराध-बोध तक फैल जाता है। → गान्धारी का प्रश्न कृष्ण पर टिकता है—ऐसे वधों का उत्तर कौन देगा, और इस शोक का फल किस पर गिरेगा?
Verse 1
गान्धारी बोलीं--दशा्ईनन्दन केशव! जिसे बल और शौर्यमें अपने पितासे तथा तुमसे भी डेढ़ गुना बताया जाता था
গান্ধারী বললেন—দাশার্হনন্দন কেশব! যাঁকে বলা হত বল ও শৌর্যে পিতাকেও, এমনকি তোমাকেও, দেড় গুণে অতিক্রম করেন; যিনি প্রচণ্ড সিংহের মতো গর্বে উন্মত্ত ছিলেন; যিনি একাই আমার পুত্রদের দুর্ভেদ্য ব্যূহ ভেঙে দিয়েছিলেন—সেই অভিমন্যু, অন্যদের জন্য মৃত্যু হয়ে, আজ নিজেই মৃত্যুর অধীন হলেন।
Verse 2
यो बिभेद चमूमेको मम पुत्रस्य दुर्भिदाम् । स भूत्वा मृत्युरन्येषां स्वयं मृत्युवशं गत:
যিনি একাই আমার পুত্রদের দুর্ভেদ্য সেনাবিন্যাস ভেঙে দিয়েছিলেন, যিনি অন্যদের জন্য মৃত্যু হয়েছিলেন—সেই তিনি আজ নিজেই মৃত্যুর অধীন হয়ে গেলেন।
Verse 3
तस्योपलक्षये कृष्ण कार्ष्णेरमिततेजस: । अभिमन्योहतस्यथापि प्रभा नैवोपशाम्यति,श्रीकृष्ण! मैं देख रही हूँ कि मारे जानेपर भी अमिततेजस्वी अर्जुनपुत्र अभिमन्युकी कान्ति अभी बुझ नहीं पा रही है
হে কৃষ্ণ! আমি স্পষ্টই দেখছি—অপরিমেয় তেজস্বী অর্জুনপুত্র অভিমন্যুর দীপ্তি, নিহত হয়েও, একটুও ম্লান হয়নি।
Verse 4
एषा विराटदुहिता स्नुषा गाण्डीवधन्चन: । आर्ता बालं पतिं वीर दृष्टवा शोचत्यनिन्दिता
এ হলেন রাজা বিরাটের কন্যা, গাণ্ডীবধারী অর্জুনের পুত্রবধূ, নিষ্কলঙ্কা সাধ্বী উত্তরার। কিশোর স্বামী বীর অভিমন্যুকে নিহত দেখে তিনি ব্যাকুল হয়ে শোক করছেন।
Verse 5
तमेषा हि समागम्य भार्या भर्तारमन्तिके । विराटदुहिता कृष्ण पाणिना परिमार्जति,श्रीकृष्ण! यह विराटकी पुत्री और अभिमन्युकी पत्नी उत्तरा अपने पतिके निकट जा उसके शरीरपर हाथ फेर रही है
হে কৃষ্ণ! বিরাটের কন্যা, অভিমন্যুর পত্নী উত্তরার, স্বামীর কাছে গিয়ে নিজের হাতে স্নেহভরে তাঁর দেহ স্পর্শ করে মুছিয়ে দিচ্ছেন।
Verse 6
तस्य वकक्त्रमुपाप्राय सौभद्रस्य मनस्विनी । विबुद्धकमलाकारं कम्बुवृत्तशिरोधरम्
বৈশম্পায়ন বললেন—মনস্বিনী সাধ্বী উত্তরার সৌভদ্র (অভিমন্যু)-এর মুখের কাছে এগিয়ে গেল। প্রস্ফুটিত পদ্মের মতো মুখ ও শঙ্খবৎ গোল গ্রীবা দেখে সে সেই পদ্মসম মুখের গন্ধ নিল এবং বুকে জড়িয়ে ধরল। যুদ্ধোত্তর শোকে তরুণী পত্নীর লজ্জা-সংযমও প্রেম ও বেদনার প্রবলতায় আচ্ছন্ন হয়ে গেল।
Verse 7
काम्यरूपवती चैषा परिष्वजति भामिनी । लज्जमाना पुरा चैनं माध्वीकमदमूर्च्छिता
বৈশম্পায়ন বললেন—কাম্যরূপবতী সেই ভামিনী তাকে আলিঙ্গন করছে। যেন পূর্বেও লজ্জায় নত হয়ে, মধুমদের নেশায় মূর্ছিত-সদৃশ হয়ে, সে তাকে বাহুবন্ধনে আঁকড়ে ধরত—তেমনি আজও স্নেহের বেগে তাকে শক্ত করে জড়িয়ে ধরল।
Verse 8
तस्य क्षतजसंदिग्ध॑ जातरूपपरिष्कृतम् । विमुच्य कवचं कृष्ण शरीरमभिवीक्षते,श्रीकृष्ण! अभिमन्युका सुवर्णभूषित कवच खूनसे रँग गया है। बालिका उत्तरा उस कवचको खोलकर पतिके शरीरको देख रही है
বৈশম্পায়ন বললেন—তার স্বর্ণখচিত সুগঠিত কবচ রক্তে কলুষিত হয়ে গিয়েছিল। সেই বর্ম খুলে সরিয়ে কৃষ্ণা (উত্তরা) শায়িত স্বামীর দেহের দিকে তাকিয়ে রইল।
Verse 9
अवेक्षमाणा तं बाला कृष्ण त्वामभिभाषते । अयं ते पुण्डरीकाक्ष सदृशाक्षो निपातित:
বৈশম্পায়ন বললেন—তাকে দেখতে দেখতে সেই বালিকা কৃষ্ণা তোমাকে ডেকে বলল—“পুণ্ডরীকাক্ষ! তোমার মতোই চোখ যার, সে (তোমার) ভাগ্নে এখানে নিপাতিত হয়েছে।”
Verse 10
बले वीर्ये च सदृशस्तेजसा चैव तेडनघ । रूपेण च तथात्यर्थ शेते भुवि निपातित:,“अनघ! जो बल, वीर्य, तेज और रूपमें सर्वधा आपके समान थे, वे ही सुभद्राकुमार शत्रुओंद्वारा मारे जाकर पृथ्वीपर सो रहे हैं!
বৈশম্পায়ন বললেন—“অনঘ! যে বল, বীর্য ও তেজে তোমার সদৃশ, এবং রূপেও অতিশয় তেমনই—সেই সুবদ্রাপুত্র শত্রুদের হাতে নিপাতিত হয়ে ভূমিতে শুয়ে আছে।”
Verse 11
अत्यन्तं सुकुमारस्य राड़ुकवाजिनशायिन: । कच्चिदद्य शरीरं ते भूमौ न परितप्यते
প্রিয়তম! তোমার দেহ অতি সুকোমল। তুমি রুরু-মৃগচর্মের নরম শয্যায় শয়ন করতে। আজ এই অনাবৃত ভূমিতে এভাবে পড়ে থাকলে কি তোমার দেহ কষ্ট পায় না?
Verse 12
मातड़'भुजवर्ष्माणौ ज्याक्षेपकठिनत्वचौ । काज्चनाज्दिनौ शेते निक्षिप्प विपुलौ भुजी
হাতির শুঁড়ের মতো বৃহৎ, ধনুকের জ্যা টানতে টানতে ঘর্ষণে যাদের ত্বক কঠিন হয়ে গেছে, আর যারা স্বর্ণের বাহুবন্ধ ধারণ করত—সেই বিপুল বাহু দু’টি প্রসারিত করে তুমি আজ শুয়ে আছ।
Verse 13
व्यायम्य बहुधा नूनं सुखसुप्त: श्रमादिव । एवं विलपतीमार्ता न हि मामभिभाषसे
নিশ্চয়ই নানা প্রকার পরিশ্রম করে, যেন ক্লান্তিতে, তুমি এখন সুখনিদ্রায় মগ্ন। আমি এভাবে আর্ত হয়ে বিলাপ করছি, তবু তুমি আমার সঙ্গে একটিও কথা বলছ না।
Verse 14
न स्मराम्यपराधं ते कि मां न प्रतिभाषसे । ननु मां त्वं पुरा दूरादभिवीक्ष्याभिभाषसे
আমার মনে পড়ে না যে আমি তোমার কোনো অপরাধ করেছি; তবে কেন তুমি আমাকে উত্তর দিচ্ছ না? আগে তো তুমি দূর থেকে আমাকে দেখলেই কথা বলতে, এক মুহূর্তও নীরব থাকতে না।
Verse 15
आर्यामार्य सुभद्रां त्वमिमांश्व त्रिदशोपमान् | पितृन् मां चैव दुःखार्ता विहाय क्व गमिष्यसि
আর্য! তুমি মাতা সুভদ্রাকে, দেবসম এই জ্যেষ্ঠজনদের—কাকা-তাউ ও পিতৃতুল্য বৃদ্ধদের—এবং দুঃখে কাতর আমাকে, তোমার পত্নীকেও, ত্যাগ করে কোথায় যাবে?
Verse 16
तस्य शोणितदिग्धान् वै केशानुद्यम्य पाणिना । उत्सड़े वक्त्रमाधाय जीवन्तमिव पृच्छति
বৈশম্পায়ন বললেন—সে রক্তে সিক্ত তার কেশ হাত দিয়ে তুলে, মুখটি কোলে রেখে, যেন সে এখনও জীবিত—এইভাবে তাকে প্রশ্ন করতে লাগল।
Verse 17
स्वस्त्रीयं वासुदेवस्य पुत्र गाण्डीवधन्चन: । कथं त्वां रणमध्यस्थं जघ्नुरेते महारथा:
বৈশম্পায়ন বললেন—“হে প্রাণনাথ! তুমি বাসুদেবের ভাগ্নে এবং গাণ্ডীবধারী অর্জুনের পুত্র। রণক্ষেত্রের মধ্যভাগে দাঁড়িয়ে থাকা তোমাকে এই মহারথীরা কীভাবে বধ করল?”
Verse 18
धिगस्तु क्रूरकर्तृस्तान् कृपकर्णजयद्रथान् । द्रोणद्रौणायनी चोभौ यैरहं विधवा कृता
বৈশম্পায়ন বললেন—“ধিক্ সেই নিষ্ঠুরকর্মা কৃপ, কর্ণ ও জয়দ্রথকে! ধিক্ দ্রোণ ও দ্রোণপুত্রকেও! তাদেরই দ্বারা আমি যৌবনেই বিধবা হলাম।”
Verse 19
रथर्षभाणां सर्वेषां कथमासीत् तदा मन: । बालं त्वां परिवार्यक॑ मम दुःखाय जघ्नुषाम्
বৈশম্পায়ন বললেন—“যে সকল শ্রেষ্ঠ রথী তোমাকে—একটি বালককে—চারদিক থেকে ঘিরে, আমার দুঃখের জন্য বধ করল, সেই সময় তাদের সবার মনোভাব কেমন ছিল?”
Verse 20
कथं नु पाण्डवानां च पठ्चालानां तु पश्यताम् | त्वं वीर निधन प्राप्तो नाथवान् सन्ननाथवत्,माधव! उत्तर, अभिमन्यु, काम्बोजनिवासी सुदक्षिण और सुन्दर दिखायी देनेवाले लक्ष्मण--ये सभी बालक थे। इन मारे गये बालकोंको देखो। युद्धके मुहानेपर सोये हुए परम सुन्दर कुमार लक्ष्मणपर भी दृष्टिपात करो ।।
পাণ্ডব ও পাঞ্চালদের চোখের সামনেই, হে বীর, তুমি কীভাবে মৃত্যুবরণ করলে—রক্ষক থাকা সত্ত্বেও কীভাবে তুমি আশ্রয়হীনর মতো পতিত হলে?
Verse 21
“आपको युद्धस्थलमें बहुत-से महारथियोंद्वारा मारा गया देख आपके पिता पुरुषसिंह वीर पाण्डव अर्जुन कैसे जी रहे हैं?
যুদ্ধক্ষেত্রে বহু মহারথীর হাতে তোমাকে নিহত হতে দেখে তোমার পিতা—পুরুষসিংহ, বীর পাণ্ডব অর্জুন—কেমন করে এখনও প্রাণ ধারণ করছেন?
Verse 22
न राज्यलाभो विपुल: शत्रूणां च पराभव: । प्रीतिं धास्यति पार्थानां त्वामृते पुष्करेक्षण
হে কমলনয়ন! তোমাকে ছাড়া না বিশাল রাজ্যলাভ, না শত্রুদের পরাজয়—কোনোটাই পাণ্ডবদের হৃদয়ে সত্য আনন্দ আনতে পারবে না।
Verse 23
तव शस्त्रजिताल्लोकान् धर्मेण च दमेन च । क्षिप्रमन््वागमिष्यामि तत्र मां प्रतिपालय
আর্যপুত্র! তোমার অস্ত্রে জয় করা পুণ্যলোকসমূহে আমি ধর্ম ও ইন্দ্রিয়সংযমের বলেই শীঘ্রই অনুসরণ করে পৌঁছাব; সেখানে আমার জন্য অপেক্ষা কোরো, আমার আগমন লক্ষ রেখো।
Verse 24
दुर्मरं पुनरप्राप्ते काले भवति केनचित् । यदहं त्वां रणे दृष्टवा हतं जीवामि दुर्भगा
নির্ধারিত সময় না এলে কারও পক্ষে মরাও অত্যন্ত কঠিন; তাই আমি দুর্ভাগিনী, রণে তোমাকে নিহত দেখে তবু আজও বেঁচে আছি।
Verse 25
कामिदानीं नरव्याप्र शलक्षणया स्मितया गिरा । पितृलोके समेत्यान्यां मामिवामन्त्रयिष्यसि,“नरश्रेष्ठूल आप पितृलोकमें जाकर इस समय मेरी ही तरह दूसरी किस स्त्रीको मन्द मुसकानके साथ मीठी वाणीद्वारा बुलायेंगे?
হে নরশ্রেষ্ঠ! পিতৃলোকে গিয়ে এখন তুমি কোন অন্য নারীকে—আমারই মতো—মৃদু হাসি আর মধুর, শোভন বাক্যে আহ্বান করবে?
Verse 26
नूनमप्सरसां स्वर्गे मनांसि प्रमथिष्यसि । परमेण च रूपेण गिरा च स्मितपूर्वया,“निश्चय ही स्वर्गमें जाकर आप अपने सुन्दर रूप और मन्द मुसकानयुक्त मधुर वाणीके द्वारा वहाँकी अप्सराओंके मनको मथ डालेंगे
নিশ্চয়ই স্বর্গে গিয়ে তুমি তোমার অতুল রূপে এবং মৃদু হাসি-প্রসূত মধুর বাক্যে সেখানকার অপ্সরাদের হৃদয়কে আলোড়িত ও অস্থির করে তুলবে।
Verse 27
प्राप्प पुण्यकृताललोकानप्सरोभि: समेयिवान् | सौभद्र विहरन् काले स्मरेथा: सुकृतानि मे
সুভদ্রানন্দন! পুণ্যবানদের লোক প্রাপ্ত হয়ে, অপ্সরাদের সঙ্গে মিলিত হয়ে, যথাকালে সেখানে ক্রীড়া-বিহার করতে করতে আমার কৃত সুকৃতগুলিও স্মরণ কোরো।
Verse 28
एतावानिह संवासो विहितस्ते मया सह । षण्मासान् सप्तमे मासि त्वं वीर निधनं गत:,“वीर! इस लोकमें तो मेरे साथ आपका कुल छः: महीनोंतक ही सहवास रहा है। सातवें महीनेमें ही आप वीरगतिको प्राप्त हो गये”
হে বীর! এই লোকেতে আমার সঙ্গে তোমার সহবাস বিধাতা এতটুকুই নির্ধারিত করেছিলেন—মাত্র ছয় মাস। সপ্তম মাসেই তুমি বীরগতি লাভ করে পরলোকগমন করলে।
Verse 29
इत्युक्तवचनामेतामपकर्षन्ति दु:खिताम् । उत्तरां मोघसंकल्पां मत्स्यराजकुलस्त्रिय:
এই কথা বলে, দুঃখে নিমগ্ন, যার সমস্ত সংকল্প ব্যর্থ হয়ে গেছে—সেই উত্তরাকে মৎস্যরাজ বিরাটের কুলবধূরা টেনে সরিয়ে নিয়ে যাচ্ছিল।
Verse 30
उत्तरामपकृष्यैनामार्तामार्ततरा: स्वयम् । विराट निहतं दृष्टवा क्रोशन्ति विलपन्ति च
শোকে কাতর উত্তরাকে টেনে সরিয়ে নিতে নিতে, তারা নিজেরাও আরও অধিক আর্ত হয়ে উঠল; নিহত রাজা বিরাটকে দেখে তারা চিৎকার করে কাঁদতে ও বিলাপ করতে লাগল।
Verse 31
द्रोणास्त्रशरसंकृत्तं शयानं रुधिरोक्षितम् | विराटं वितुदन्त्येते गृध्रगोमायुवायसा:
দ্রোণাস্ত্রের বাণে ছিন্নভিন্ন, রক্তে সিক্ত হয়ে রণক্ষেত্রে শায়িত রাজা বিরাটকে এই শকুন, শেয়াল ও কাকেরা ঠোকরাতে ও ছিঁড়ে খেতে লাগল।
Verse 32
वितुद्यमानं विहगैरविराटमसितेक्षणा: । न शवनुवन्ति विहगान् निवारयितुमातुरा:
কালো-চোখা নারীরা ব্যাকুল হয়ে পাখিদের ঠোকরাতে থাকা সেই (বিরাটের) দেহ থেকে পাখিদের তাড়াতে পারল না।
Verse 33
विराटको उन विहंगमोंद्वारा नोचे जाते देख कजरारी आँखोंवाली उनकी रानियाँ आतुर हो-होकर उन्हें हटानेकी चेष्टा करती हैं, पर हटा नहीं पाती हैं ।।
রোদে দগ্ধ হয়ে, ক্লান্তি ও পরিশ্রমে বিবর্ণ হয়ে পড়া সেই নারীদের মুখমণ্ডলের শোভা ম্লান হলো, আর তাদের দেহাবয়বও এলোমেলো হয়ে গেল।
Verse 34
उत्तरं चाभिमन्युं च काम्बोजं च सुदक्षिणम् । शिशूनेतान् हतान् पश्य लक्ष्मणं च सुदर्शनम्
উত্তর ও অভিমন্যুকে, আর কাম্বোজ ও সুদক্ষিণকেও দেখো—এই শিশুরা নিহত হয়েছে; আর সুদর্শন লক্ষ্মণকেও দেখো।
Verse 35
आयोधनशिरोमध्ये शयानं पश्य माधव
হে মাধব, দেখো—সে রণক্ষেত্রের একেবারে মধ্যভাগে শায়িত।
Verse 231
“वीर! आप पाण्डवों और पांचालोंके देखते-देखते सनाथ होते हुए भी अनाथकी भाँति कैसे मारे गये? ।। दृष्टवा बहुभिराक्रन्दे निहतं त्वां पिता तव । वीर: पुरुषशार्दटूल: कथं जीवति पाण्डव:
হে বীর! পাণ্ডব ও পাঞ্চালদের চোখের সামনেই, রক্ষক থাকা সত্ত্বেও তুমি কীভাবে অনাথের মতো নিহত হলে? বহুজনের ক্রন্দনের মধ্যে তোমাকে নিহত দেখে তোমার পিতা কীভাবে বেঁচে থাকবেন? সেই পাণ্ডব—বীর, পুরুষসিংহ—কীভাবে শ্বাস ধরে রাখবে?
The chapter raises the ethical problem of disproportionate force and collective responsibility: a celebrated young warrior is portrayed as surrounded and killed by multiple elite combatants, prompting questions about fairness, duty, and the moral legitimacy of wartime means.
The discourse teaches that worldly achievements—victory, territory, or prestige—are rendered fragile by impermanence and relational loss; grief becomes a lens for evaluating action beyond immediate outcomes, emphasizing the human cost embedded in policy and warfare.
No explicit phalaśruti is presented here; the chapter functions as narrative-ethical documentation whose significance lies in its role as evidentiary groundwork for subsequent ritual, reconciliation, and the later instructional parvans.
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