Vāmadeva’s Rājadharma: Norm-Setting, Counsel, and the Prevention of Rāṣṭra-Vināśa (वामदेव-प्रोक्तं राजधर्मम्)
अग्राम्यचरितां वृत्ति यो न सेवेत नित्यदा | जितानामजितानां च क्षत्रधर्मादपैति सः,जो मनके प्रतिकूल होनेके कारण अपने ही प्रयोजनकी सिद्धि चाहनेवाले सुहृदकी बात नहीं सहन करता और अपनी अर्थसिद्धिके विरोधी वचनोंको भी सुनता है, सदा अनमना- सा रहता है, जो बुद्धिमान् शिष्ट पुरुषोंद्वारा आचरणमें लाये हुए बर्तावका सदा सेवन नहीं करता एवं पराजित या अपराजित व्यक्तियोंको उनके परम्परागत आचारका पालन नहीं करने देता, वह क्षत्रिय-धर्मसे गिर जाता है
agrāmyacaritāṁ vṛttiṁ yo na seveta nityadā | jitānām ajitānāṁ ca kṣatradharmād apaiti saḥ ||
যে ব্যক্তি সর্বদা শিষ্টজন-আচরিত, অশ্লীলতাবর্জিত (অগ্রাম্য) আচরণ পালন করে না, এবং জয়ী ও অজয়ী—উভয়কেই তাদের পরম্পরাগত আচার মানতে দেয় না, সে ক্ষত্রিয়ধর্ম থেকে পতিত হয়।
वामदेव उवाच