अरण्यवृत्ति-वैराग्योपदेशः | Forest Discipline and the Program of Non-Attachment
न चाप्यवहसन् कज्वचिन्न कुर्वन् भ्रुकुटी: क्वचित् । प्रसन्नवदनो नित्य सर्वेन्द्रियसुसंयत:,न तो किसीकी हँसी उड़ाऊँगा और न किसीके प्रति भौंहोंको ही टेढ़ी करूँगा। सदा मेरे मुखपर प्रसन्नता छायी रहेगी और मैं सम्पूर्ण इन्द्रियोंकोी पूर्णतः संयममें रखूँगा
আমি কারও উপহাস করব না, আর কারও প্রতি কখনও ভ্রূকুটি করব না। সর্বদা প্রসন্নমুখ থাকব এবং সকল ইন্দ্রিয়কে সুসংযত রাখব।
युधिछिर उवाच