अरण्यवृत्ति-वैराग्योपदेशः | Forest Discipline and the Program of Non-Attachment
अत नवमो<्ध्याय: युधिष्ठटिरका वानप्रस्थ एवं संन्यासीके अनुसार जीवन व्यतीत करनेका निश्चय युधिछिर उवाच मुहूर्त तावदेकाग्रो मन:श्रोत्रेडन्तरात्मनि । धारयन्नपि तच्छुत्वा रोचेत वचनं मम,युधिष्ठिरने कहा--अर्जुन! तुम अपने मन और कानोंको अन्तःकरणमें स्थापित करके दो घड़ीतक एकाग्र हो जाओ, तब मेरी बात सुनकर तुम इसे पसंद करोगे
Yudhiṣṭhira uvāca: muhūrta-tāvad ekāgro manaḥ-śrotre ’ntarātmani dhārayan api tac chrutvā roceta vacanaṁ mama.
যুধিষ্ঠির বললেন— অর্জুন! এক মুহূর্তকাল তোমার মন ও শ্রবণশক্তিকে অন্তঃকরণে স্থির করে একাগ্র হও। আমার কথা শুনে, তা ধারণ করলে, আমার বাক্য তোমার কাছে প্রীতিকর হবে।
युधिछिर उवाच