Daṇḍanīti and the King as the Cause of Yuga-Order (दण्डनीतिः राजधर्मश्च युगकारणत्वम्)
(श्लोकाश्लोशनसा गीतास्तान् निबोध युधिष्छिर । दण्डनीतेश्व यन्मूलं त्रिवर्गस्थ च भूपते ।। भार्गवाज्धिरसं कर्म षोडशाड़ुं च यद् बलम् । विषं माया च दैवं च पौरुषं चार्थसिद्धये ।। प्रागुदक्प्रवर्ण दुर्ग समासाद्य महीपति: । त्रिवर्गत्रयसम्पूर्णमुपादाय तमुद्धहेत् ।। युधिष्ठिर! इस विषयमें शुक्राचार्यके कहे हुए कुछ श्लोक हैं, उन्हें सुनो। राजन! उन श्लोकोंमें जो भाव है, वह दण्डनीति तथा त्रिवर्गका मूल है। भार्गवाड्लि-रसकर्म, षोडशाड़ बल, विष, माया, दैव और पुरुषार्थ--ये सभी वस्तुएँ राजाकी अर्थसिद्धिके कारण हैं। राजाको चाहिये, जिसमें पूर्व और उत्तर दिशाकी भूमि नीची हो तथा जो तीनों प्रकारके त्रिवर्गोंसे परिपूर्ण हो उस दुर्गका आश्रय ले राज्यकार्यका भार वहन करे ।। षट् पञ्च च विनिर्जित्य दश चाष्टौ च भूपति: । त्रिवर्गैर्देशभिर्युक्त: सुरैरपि न जीयते ।। षडवर्ग5, पञ्चवर्ग5, दस दोष और आठ दोष*-.-इन सबको जीतकर त्रिवर्गयुक्त* एवं दस वर्गोकेः ज्ञानसे सम्पन्न हुआ राजा देवताओंद्वारा भी जीता नहीं जा सकता ।। न बुद्धि परिगृह्नीत स्त्रीणां मूर्खजनस्य च । दैवोपहतबुद्धीनां ये च वेदैरविवर्जिता: ।। न तेषां शृणुयाद् राजा बुद्धिस्तेषां पराड्मुखी । राजा कभी स्त्रियों और मूर्खोंसे सलाह न ले। जिनकी बुद्धि दैवसे मारी गयी है तथा जो वेदोंके ज्ञानसे शून्य हैं, उनकी बात राजा कभी न सुने; क्योंकि उन लोगोंकी बुद्धि नीतिसे विमुख होती है ।। स्त्रीप्रधानानि राज्यानि विद्वद्धिर्वर्जितानि च ।। मूर्खामात्यप्रतप्तानि शुष्यन्ते जलबिन्दुवत् जिन राज्योंमें स्त्रियोंकी प्रधानता हो और जिन्हें विद्वानोंने छोड़ रखा हो; वे राज्य मूर्ख मन्त्रियोंसे संतप्त होकर पानीकी बूँदके समान सूख जाते हैं ।। विद्वांस: प्रथिता ये च ये चाप्ता: सर्वकर्मसु ।। युद्धेषु दृष्टकर्माणस्तेषां च शृणुयान्नूप: । जो अपनी दिद्वत्ताके लिये विख्यात हों, सभी कार्योंमें विश्वासके योग्य हों तथा युद्धके अवसरोंपर जिनके कार्य देखे गये हों, ऐसे मन्त्रियोंकी ही बात राजाको सुननी चाहिये ।। दैवं पुरुषकारं च त्रिवर्ग च समाश्रित: ।। दैवतानि च विदप्रांश्व प्रणम्य विजयी भवेत् ।) दैव, पुरुषार्थ और त्रिवर्गका आश्रय ले देवताओं तथा ब्राह्मणोंको प्रणाम करके युद्धकी यात्रा करनेवाला राजा विजयी होता है ।। युधिछिर उवाच दण्डनीतिश्न राजा च समस्तौ तावुभावपि | कस्य किं कुर्वतः सिद्ध्येत् तन्मे ब्रूहि पितामह,युधिष्ठिरने पूछा--पितामह! दण्डनीति तथा राजा दोनों मिलकर ही कार्य करते हैं। इनमेंसे किसके क्या करनेसे कार्य-सिद्धि होती है? यह मुझे बताइये
yudhiṣṭhira uvāca |
daṇḍanītiś ca rājā ca samastau tāv ubhāv api |
kasyā kiṁ kurvataḥ siddhyet tan me brūhi pitāmaha ||
যুধিষ্ঠির বললেন—পিতামহ! দণ্ডনীতি ও রাজা—উভয়েই মিলিত হয়ে কার্য সম্পাদন করে। এদের মধ্যে কে কী করলে রাজকার্যে সিদ্ধি হয়, তা আমাকে বলুন।
युधिछिर उवाच
Effective rule is not achieved by a king alone or by abstract policy alone: success arises from their coordinated functioning—personal leadership and moral agency on one side, and the structured system of law, discipline, and measured punishment on the other.
In the Śānti Parva dialogue on kingship, Yudhiṣṭhira asks Bhīṣma to clarify the division of responsibility between the ruler and daṇḍanīti: which of the two must do what so that governance and its aims are actually fulfilled.