निर्मर्यादान् नित्यमर्थे निविष्टा- नाहुस्तांस्तान् वै पशुभूतान् मनुष्यान् । यथा नीति गमयत्यर्थयोगा- च्छेयस्तस्मादाश्रमात् क्षत्रधर्म:,जो लोग सदा अर्थसाधनमें ही आसक्त होकर मर्यादा छोड़ बैठते हैं, उन मनुष्योंको पशु कहा गया है। क्षत्रिय-धर्म अर्थकी प्राप्ति करानेके साथ-साथ उत्तम नीतिका ज्ञान प्रदान करता है; इसलिये वह आश्रम-धर्मोसे भी श्रेष्ठ है
যারা সর্বদা অর্থসাধনেই আসক্ত থেকে মর্যাদা ত্যাগ করে, সেই মানুষদের পশুতুল্য বলা হয়েছে। ক্ষত্রধর্ম অর্থপ্রাপ্তির সঙ্গে সঙ্গে উত্তম নীতিবোধ দিয়ে কল্যাণের পথে নিয়ে যায়; তাই তা আশ্রমধর্মসমূহের চেয়েও শ্রেষ্ঠ।
इन्द्र उवाच