Kṣātra-dharma as the Public Foundation of Dharma (क्षात्रधर्म-प्रशंसा)
पालयित्वा प्रजा: सर्वा धर्मेण वदतां वर । राजसूयाश्बदमेधादीन् मखानन्यांस्तथैव च,निष्पाप नरेश! राजाको चाहिये कि पहले धर्माचरण-पूर्वक वेदों तथा राजशास्त्रोंका अध्ययन करे। फिर संतानोत्पादन आदि कर्म करके यज्ञमें सोमरसका सेवन करे। समस्त प्रजाओंका धर्मके अनुसार पालन करके राजसूय, अश्वमेध तथा दूसरे-दूसरे यज्ञोंका अनुष्ठान करे। शास्त्रोंकी आज्ञाके अनुसार सब सामग्री एकत्र करके ब्राह्मणोंको दक्षिणा दे। संग्राममें अल्प या महान् विजय पाकर राज्यपर प्रजाकी रक्षाके लिये अपने पुत्रको स्थापित कर दे। पुत्र न हो तो दूसरे गोत्रके किसी श्रेष्ठ क्षत्रियको राज्यसिंहासनपर अभिषिक्त कर दे। वक्ताओंमें श्रेष्ठ क्षत्रियशिरोमणि पाण्डुनन्दन! पितृयज्ञों-द्वारा विधिपूर्वक पितरोंका, देवयज्ञोंद्वारा देवताओंका तथा वेदोंके स्वाध्यायद्वारा ऋषियोंका यत्नपूर्वक भली-भाँति पूजन करके अन्तकाल आनेपर जो क्षत्रिय दूसरे आश्रमोंको ग्रहण करनेकी इच्छा करता है, वह क्रमश: आश्रमोंको अपनाकर परम सिद्धिको प्राप्त होता है
bhīṣma uvāca | pālayitvā prajāḥ sarvā dharmeṇa vadatāṃ vara | rājasūyāśvamedhādīn makhān anyāṃs tathaiva ca ||
ভীষ্ম বললেন—হে বক্তাদের শ্রেষ্ঠ! ধর্ম অনুসারে সকল প্রজাকে পালন করে রাজা রাজসূয়, অশ্বমেধ প্রভৃতি মহাক্রতু এবং অন্যান্য যজ্ঞও বিধিমতো সম্পন্ন করবে। কারণ রাজশক্তি কেবল জয়ের দ্বারা নয়; ধর্মনিয়মে প্রজারক্ষা করে এবং বৈদিক ক্রিয়ায় দায়িত্ব, দান ও লোকশৃঙ্খলা প্রতিষ্ঠা করে তবেই তা ন্যায্য হয়।
भीष्म उवाच