Adhyāya 352: Brāhmaṇa–Nāga Saṃvāda — Uñchavrata-niścaya
Dialogue and the Resolve to Practice Uñchavrata
नित्यमुग्रतपास्त्वं हि ततः पृच्छामि ते पुन:,ब्रह्माजी बोले--महाबाहो! तुम्हारा स्वागत है। सौभाग्यसे मेरे निकट आये हो। बेटा! तुम्हारा स्वाध्याय और तप सदा सकुशल चल रहा है न? तुम सर्वदा कठोर तपस्यामें ही लगे रहते हो; इसलिये मैं तुमसे बारंबार तपके विषयमें पूछता हूँ
তুমি তো সর্বদা কঠোর তপস্যায় নিয়োজিত; তাই আমি বারবার তোমার তপস্যার বিষয়ে জিজ্ঞাসা করি।
पितामह उवाच