Atithi-prāpti and the Brāhmaṇa’s Deliberation on Triadic Dharma (अतिथिप्राप्तिः धर्मत्रयविचारश्च)
सर्वार्थचिन्तका लोके यथाधीकारनिर्मिता: । “तुमलोग यज्ञमें भाग लेकर यजमानको उसका फल देनेमें प्रवृत्त हो जगतमें अपने अधिकारके अनुसार सबके सभी मनोरथोंका चिन्तन करते हुए सब लोगोंको उन्नतिशील बनाओ ।। ६३ $ || या: क्रिया: प्रचरिष्यन्ति प्रवृत्तिफलसत्कृता:
তোমরা জগতে নিজ নিজ অধিকারের অনুসারে সকলের সকল অভিপ্রায়ের চিন্তা করো। যজ্ঞে অংশ গ্রহণ করে যজমানকে তার ফল প্রদান করতে প্রবৃত্ত হও; এবং সকলকে উন্নতির পথে অগ্রসর করো। যে যে ক্রিয়াসমূহ প্রবৃত্তির ফল দ্বারা সম্মানিত হয়ে চলতে থাকবে, সেগুলিও এই বিধানের অন্তর্গত।
वैशम्पायन उवाच