धर्मस्य बहुद्वारत्वम् — Nārada’s Audience with Indra (Śānti-parva 340)
यत् त्वया प्राप्तमद्येह एकान्तगतबुद्धिना । वे अवतार लोकहितके कार्य सम्पन्न करके पुन: अपने मूलस्वरूपमें मिल गये हैं। मुझमें अनन्य भक्ति रखनेके कारण आज तुमने यहाँ जिस स्वरूपका दर्शन पाया है
একান্তনিষ্ঠ বুদ্ধি নিয়ে আজ এখানে তুমি যা লাভ করেছ—অবতারগণ লোকহিতের কার্য সম্পন্ন করে পুনরায় নিজ মূলস্বরূপে লীন হয়ে গেছেন। আমার প্রতি অনন্য ভক্তির ফলে আজ তুমি যে রূপের দর্শন পেয়েছ, তেমন দর্শন ব্রহ্মাও আজ পর্যন্ত লাভ করতে পারেননি।
(भीष्म उवाच