Nārada’s Darśana of Viśvarūpa Nārāyaṇa and the Caturmūrti Doctrine (नारदस्य नारायणदर्शनं चतुर्मूर्तिविचारश्च)
अनामयं च राजेन्द्र शुक: सानुचरस्य ह | अनुशिष्टस्तु तेनासौ निषसाद सहानुग:,राजेन्द्र! सेवकोंसहित राजाके आरोग्यका समाचार भी उन्होंने पूछा। फिर उनकी आज्ञा ले राजा अपने अनुचरवर्गके साथ वहाँ हाथ जोड़े हुए भूमिपर ही बैठ गये। राजाका हृदय तो उदार था ही, उनका कुल भी परम उदार था। उन पृथ्वीपति नरेशने व्यासनन्दन शुकसे उनके कुशल-मंगलकी जिज्ञासा करके पूछा--'ब्रह्मम! किस निमित्तसे यहाँ आपका शुभागमन हुआ है?”
anāmayaṃ ca rājendra śukaḥ sānucarasya ha | anuśiṣṭas tu tenāsau niṣasāda sahānugaḥ ||
ভীষ্ম বললেন—হে রাজেন্দ্র! শুক রাজাকে তাঁর অনুচরসহ আরোগ্যের সংবাদও জিজ্ঞাসা করলেন। তাঁর উপদেশ পেয়ে রাজা অনুগামীদের সঙ্গে করজোড়ে সেখানেই ভূমিতে বসে পড়লেন। উদারচিত্ত ও মহৎ বংশধর সেই নৃপতি ব্যাসপুত্র শুকের কুশল-মঙ্গল জেনে বললেন—“হে ব্রাহ্মণ! কোন উদ্দেশ্যে আপনার এই শুভ আগমন?”
भीष्म उवाच