Nārada’s Darśana of Viśvarūpa Nārāyaṇa and the Caturmūrti Doctrine (नारदस्य नारायणदर्शनं चतुर्मूर्तिविचारश्च)
सचवतां मन्त्रवत्पूजां प्रत्यगृह्लाद् यथाविधि । प्रतिगृहा तु तां पूजां जनकाद् द्विजसत्तम:,द्विजश्रेष्ठ शुकदेवजीने राजा जनककी ओरसे प्राप्त हुई वह मन्त्रयुक्त सविधि पूजा स्वीकार की। पूजा ग्रहण करनेके पश्चात् गोदान स्वीकार करके राजाको आदर देते हुए महातेजस्वी शुकने उनका सदा बना रहनेवाला कुशल-समाचार पूछा
sacchavatāṁ mantravat-pūjāṁ pratyagṛhlād yathāvidhi | pratigṛhā tu tāṁ pūjāṁ janakād dvija-sattamaḥ ||
দ্বিজশ্রেষ্ঠ শুকদেব রাজা জনকের পক্ষ থেকে প্রদত্ত মন্ত্রসহ বিধিপূর্বক সেই পূজা যথাযথভাবে গ্রহণ করলেন। পূজা ও গোদান গ্রহণ করে মহাতেজস্বী শুক রাজাকে সম্মান জানিয়ে তাঁর স্থায়ী কুশল-সংবাদ জিজ্ঞাসা করলেন।
भीष्म उवाच