अव्यक्तस्य पर प्राहुर्विद्यां वै पडचविंशकम् । सर्वस्य सर्वमित्युक्तं ज्ञेयं ज्ञानस्य पार्थिव,पचीसवें तत्त्वके रूपमें जिस परम पुरुष परमात्माकी चर्चा की गयी है, उसीको अव्यक्त प्रकृतिकी परम विद्या बताया गया है। राजन! वही सम्पूर्ण ज्ञानका सर्वरूप ज्ञेय है
অব্যক্তের পরম বিদ্যা ‘পঞ্চবিংশক’—পঁচিশতম তত্ত্ব, পরম পুরুষ—বলে কথিত। হে রাজন, তাকেই ‘সকলের সকল’ বলা হয়; তিনিই সমগ্র জ্ঞানের পরম জ্ঞেয়।
वसिष्ठ उवाच