Jarā-Mṛtyu-anatikrama: Janaka–Pañcaśikha-saṃvāda
Aging and Death Cannot Be Overstepped
यदा तु गुणजाल तत् प्राकृतं वै जुगुप्सते । पश्यते च परं पश्यं तदा पश्यन्न संत्यजेत्,जब वह प्राकृत गुणसमुदायको कुत्सित समझकर उससे विरत हो जाता है, उस समय वह परम दर्शनीय परमात्माका दर्शन पा जाता है और उसको देखकर फिर भी उसका त्याग नहीं करता अर्थात् उससे अलग नहीं होता
যখন সে প্রাকৃত গুণসমষ্টিকে ঘৃণ্য জেনে তা থেকে বিরত হয়, তখন সে পরম দর্শনীয় পরমাত্মার দর্শন লাভ করে; এবং তাঁকে দর্শন করেও আর তাঁকে ত্যাগ করে না—অর্থাৎ তাঁর থেকে বিচ্ছিন্ন হয় না।
वसिष्ठ उवाच