Aśmagīta: Janaka’s Inquiry on Loss, Kāla, and the Limits of Control (अश्मगीता)
कुर्वीत पितृदैवत्यं धर्माणि च समाचरेत् । यजेच्च विद्वान् विधिवत त्रिवर्ग चाप्युपाचरेत्,विज्ञ पुरुष पितरोंका श्राद्ध और देवताओंका यजन करे। धर्मानुकूल कार्योंका अनुष्ठान और यज्ञ करे तथा विधिपूर्वक धर्म, अर्थ और कामका भी सेवन करे
kurvīta pitṛdaivatyaṁ dharmāṇi ca samācaret | yajec ca vidvān vidhivat trivargaṁ cāpy upācaret ||
জনক বললেন—জ্ঞানী ব্যক্তি পিতৃদের উদ্দেশে শ্রাদ্ধ এবং দেবতাদের উদ্দেশে যজন করুক। ধর্মসম্মত কর্ম পালন করুক, বিধিমতো যজ্ঞ করুক; এবং ধর্ম, অর্থ ও কাম—এই ত্রিবর্গও সংযম ও বিধি মেনে অনুসরণ করুক।
जनक उवाच