Aśmagīta: Janaka’s Inquiry on Loss, Kāla, and the Limits of Control (अश्मगीता)
पूर्वे वयसि मध्ये वाप्युत्तरे वा नराधिप । अवर्जनीयास्ते<र्था वै कांक्षिता ये ततो5न्यथा,नरेश्वर! पूर्वावस्था, मध्यावस्था अथवा उत्तरावस्थामें कभी-न-कभी वे क्लेश अनिवार्यरूपसे प्राप्त होते ही हैं, जिन्हें मनुष्य उनके विपरीतरूपमें चाहता है (अर्थात् सुख- ही-सुखकी इच्छा करता है; परंतु उसे कष्ट भी प्राप्त होते ही हैं)
janaka uvāca | pūrve vayasi madhye vāpy uttare vā narādhipa | avarjanīyās te 'rthā vai kāṅkṣitā ye tato 'nyathā nareśvara ||
হে নরাধিপ! যৌবনে, মধ্যবয়সে বা বার্ধক্যে—কখনও না কখনও সেই অনিবার্য ঘটনাই এসে পড়ে, যাকে মানুষ উল্টোভাবে কামনা করে; সে তো কেবল সুখ চায়, তবু দুঃখও আসে।
जनक उवाच