Adhyāya 272: Vṛtrasya Dharmiṣṭhatā, Indrasya Mohaḥ, Vasiṣṭha-upadeśaḥ
Vṛtra’s dharmic stature; Indra’s disorientation; Vasiṣṭha’s counsel
व्याजेन चरते धर्ममर्थ व्याजेन रोचते । व्याजेन सिद्धयमानेषु धनेषु कुरुनन्दन,उत्तर न्यायसम्बद्धं ब्रवीति विधिचोदितम् । कुरुनन्दन! वह कोई बहाना लेकर ही धर्म करता है, कपटसे ही धन कमानेकी रुचि रखता है और यदि कपटसे धन प्राप्त करनेमें सफलता मिल गयी तो वह उसीमें अपनी सारी बुद्धि लगा देता है। भरतनन्दन! फिर तो विद्वानों और सुहृदोंके मना करनेपर भी वह केवल पाप ही करना चाहता है तथा मना करनेवालोंको थधर्मशास्त्रके वाक्योंके द्वारा प्रतिपादित न्याययुक्त उत्तर दे देता है
bhīṣma uvāca | vyājena carate dharmam arthaṁ vyājena rocate | vyājena siddhyamāneṣu dhaneṣu kurunandana, uttaraṁ nyāyasambaddhaṁ bravīti vidhicoditam ||
কুরুনন্দন! সে অজুহাত করে ধর্মাচরণ করে, ছলনার পথেই অর্থলাভে আসক্ত হয়; আর ছলনায় ধনসিদ্ধি হলে সে তাতেই সমস্ত বুদ্ধি স্থির করে। তখন পণ্ডিত সুহৃদরা বাধা দিলেও সে পাপই করতে চায়, আর বাধাদানকারীদের শাস্ত্রবাক্য জুড়ে ‘ন্যায়সঙ্গত’ ও ‘বিধিসম্মত’ উত্তর দিয়ে দেয়।
भीष्म उवाच