पापात्म-धर्मात्म-लक्षणम् तथा निर्वेदेन मोक्षमार्गः | Marks of the Sinful and the Righteous; Dispassion (Nirveda) as a Path to Liberation
आशिषस्ता भजन्त्येनं परुषं प्राह यत् पिता । निष्कृति: सर्वपापानां पिता यच्चाभिनन्दति,'पिता पुत्रसे यदि कुछ कठोर बातें कह देता है तो वे आशीर्वाद बनकर उसे अपना लेती हैं और पिता यदि पुत्रका अभिनन्दन करता है--मीठे वचन बोलकर उसके प्रति प्यार और आदर दिखाता है तो इससे पुत्रके सम्पूर्ण पापोंका प्रायश्चित्त हो जाता है
āśiṣastā bhajanty enaṃ paruṣaṃ prāha yat pitā | niṣkṛtiḥ sarvapāpānāṃ pitā yaccābhinandati ||
ভীষ্ম বললেন— পিতা যদি পুত্রকে কঠোর কথাও বলেন, তাও পুত্রের কাছে আশীর্বাদরূপে পরিগৃহীত হয়। আর পিতা যদি মধুর বাক্যে পুত্রকে অভিনন্দন করেন—স্নেহ ও সম্মান প্রকাশ করেন—তাই পুত্রের সকল পাপের প্রায়শ্চিত্ত হয়ে দাঁড়ায়।
भीष्म उवाच