कामबन्धन-निवृत्ति तथा शान्तिलक्षण-उपदेशः | Release from Desire-Bondage and the Marks of Peace
न भुज्जीतान्तरा काले नानृतावाद्नयेत् स्त्रियम् नास्यानश्रन् गृहे विप्रो वसेत् कश्चिदपूजित:,सबेरे और शाम दो ही समय भोजन करे, बीचमें न खाय। ऋतुकालके सिवा अन्य समयमें स्त्रीको अपनी शय्यापर न बुलावे। उसके घरपर आया हुआ कोई ब्राह्मण अतिथि आदर-सत्कार और भोजन पाये बिना न रह जाय
মানুষের উচিত কেবল প্রাতে ও সায়ং—এই দুই সময়েই আহার করা; মাঝখানে না খাওয়া। ঋতুকাল ব্যতীত অন্য সময়ে স্ত্রীকে শয্যায় আহ্বান না করা। আর তার গৃহে আগত কোনো ব্রাহ্মণ অতিথি যেন পূজা-সৎকার ও আহার না পেয়ে না থাকে।
व्यास उवाच