भिक्षुलक्षणम्—एकचर्याः, अहिंसा, कैवल्याश्रमः
Marks of the Mendicant: Solitary Wandering, Non-Injury, and the Kaivalya-Discipline
आक्रीडानां गृहाणां च गदानामगदस्य च । प्रज्ञावन्त: प्रयोक्तारो ज्ञानवद्धिरनुछिता:,बेटा! चेतन प्राणी क्रीडाके लिये स्थान और रहनेके लिये घर बनाते हैं। वे ही रोगोंको पहचानकर उनपर ठीक-ठीक दवाका प्रयोग करते हैं। बुद्धिमान पुरुषोंद्वारा ही इन सब कार्योंका यथावत् अनुष्ठान होता है (स्वभावसे--अपने-आप नहीं)
ākrīḍānāṁ gṛhāṇāṁ ca gadānām agadasya ca | prajñāvantaḥ prayoktāro jñānavaddhir anucchitāḥ ||
ব্যাস বললেন—বৎস! খেলাধুলার স্থান ও বসবাসের গৃহ সচেতন প্রাণীরাই নির্মাণ করে। তারাই রোগ চিনে নিয়ে যথাযথ ঔষধ প্রয়োগ করে। এসব কাজ স্বভাবত আপনাআপনি হয় না; জ্ঞানী ও বিবেকী মানুষেরাই সঠিকভাবে তা সম্পন্ন করে।
व्यास उवाच