Adhyāya 2: Nārada’s Disclosure—Karṇa’s Training and the Brahmin’s Curse (Śānti-parva)
उस पर्वतपर भृगुश्रेष्ठ परशुरामजीसे विधिपूर्वक धनुर्वेद सीखकर कर्ण उसका अभ्यास करने लगा। वह देवताओं, दानवों एवं राक्षसोंका अत्यन्त प्रिय हो गया ।। स कदाचित् समुद्रान्ते विचरन्नाश्रमान्तिके । एक: खड््गधनुष्पाणि: परिचक्राम सूर्यज:,एक दिनकी बात है, सूर्यपुत्र कर्ण हाथमें धनुष बाण और तलवार ले समुद्रके तटपर आश्रमके पास ही अकेला टहल रहा था
sa kadācit samudrānte vicarann āśramāntike | ekaḥ khaḍga-dhanuṣ-pāṇiḥ paricakrāma sūryajaḥ ||
সেই পর্বতে ভৃগুশ্রেষ্ঠ পরশুরামের কাছে বিধিমতো ধনুর্বেদ শিখে কর্ণ তার অনুশীলনে রত হলো। সে দেবতা, দানব ও রাক্ষসদের অত্যন্ত প্রিয় হয়ে উঠল। একদিন সূর্যপুত্র কর্ণ ধনুক-বাণ ও খড়্গ হাতে নিয়ে সমুদ্রতটে আশ্রমের নিকটে একা একা বিচরণ করছিল।
नारद उवाच