अव्यक्त-मानस-सृष्टिवादः
Doctrine of Creation from the Unmanifest ‘Mānasa’
एवं पुत्राश्न पौत्राश्न ज्ञातयो बान्धवास्तथा | तेषां स्नेहो न कर्तव्यो विप्रयोगो ध्रुवो हि तैः,इसी तरह पुत्र, पौत्र, जाति-बान्धव और सम्बन्धी भी मिल जाते हैं। उनके प्रति कभी आसक्ति नहीं बढ़ानी चाहिये; क्योंकि एक दिन उनसे बिछोह होना निश्चित है
evaṁ putrāś ca pautrāś ca jñātayo bāndhavās tathā | teṣāṁ sneho na kartavyo viprayogo dhruvo hi taiḥ ||
এইভাবেই পুত্র, পৌত্র, জ্ঞাতি-বান্ধব ও আত্মীয়স্বজনের সঙ্গও জীবনে ঘটে। কিন্তু তাদের প্রতি আঁকড়ে ধরা আসক্তি বাড়ানো উচিত নয়; কারণ তাদের থেকে বিচ্ছেদ অবশ্যম্ভাবী।
ब्राह्मण उवाच