न प्रियं नाप्यनुक्रोशं चक्रुर्भूतेषु भारत । त्रीनुपायानतिक्रम्य दण्डेन रुरुधु: प्रजा:,भरतनन्दन! वे न तो प्राणियोंका प्रिय करते थे और न उनपर दयाभाव ही रखते थे। वे साम, दाम और भेद--इन तीनों उपायोंको लाँचकर केवल दण्डके द्वारा समस्त प्रजाओंको पीड़ा देने लगे
ভীষ্ম বললেন—হে ভারতনন্দন! তারা জীবদের প্রতি না প্রীতিব্যবহার করত, না করুণা দেখাত। সাম, দাম ও ভেদ—এই তিন উপায় পরিত্যাগ করে তারা কেবল দণ্ডের জোরে সমস্ত প্রজাকে পীড়িত ও বশীভূত করতে লাগল।
भीष्म उवाच