Śaraṇāgata-Atithi-Dharma in the Kapota Narrative (कपोत-आख्यानम्—शरणागतधर्मः)
बुद्धयात्मके व्यक्तमस्तीति पुण्यं मोहात्मके यत्र यथा श्वृभक्ष्ये । यद्यप्येतत् संशयात्मा चरामि नाहं भविष्यामि यथा त्वमेव,यह कुत्तेका मांस-भक्षण दो प्रकारसे हो सकता है--एक बुद्धि और विचारपूर्वक तथा दूसरा अज्ञान एवं आमसत्तिपूर्वक। बुद्धि एवं विचारद्वारा सोचकर धर्मके मूल तथा ज्ञानप्राप्तिके साधनभूत शरीरकी रक्षामें पुण्य है, यह बात स्वतः स्पष्ट हो जाती है। इसी तरह मोह एवं आसक्तिपूर्वक उस कार्यमें प्रवृत्त होनेसे दोषका होना भी स्पष्ट ही है। यद्यपि मैं मनमें संशय लेकर यह कार्य करने जा रहा हूँ तथापि मेरा विश्वास है कि मैं इस मांसको खाकर तुम्हारे-जैसा चाण्डाल नहीं बन जाऊँगा। (तपस्याद्वारा इसके दोषका मार्जन कर लूँगा)
buddhy-ātmake vyaktam astīti puṇyaṁ mohātmake yatra yathā śvṛbhakṣye | yady apy etat saṁśayātmā carāmi nāhaṁ bhaviṣyāmi yathā tvam eva ||
বিশ্বামিত্র বললেন— কুকুরের মাংস ভক্ষণ দুইভাবে হতে পারে: এক, বুদ্ধি ও বিবেচনা সহকারে; দুই, মোহ ও আসক্তিবশে। বুদ্ধি দিয়ে বিচার করলে স্পষ্ট হয় যে ধর্মের মূল এবং জ্ঞানলাভের উপায়স্বরূপ দেহ রক্ষা করা পুণ্য; আর মোহ-আসক্তিতে একই কাজে প্রবৃত্ত হলে দোষও স্পষ্ট। যদিও আমি সন্দেহ নিয়ে এ কাজ করছি, তবু আমার বিশ্বাস—এ মাংস খেয়ে আমি তোমার মতো চাণ্ডাল হব না; তপস্যা দ্বারা এর কলুষ শোধন করব।
विश्वामित्र उवाच