गान्धारी-प्रशमनम् — Pacification of Gāndhārī and Kṛṣṇa’s Counsel at Hāstinapura
दिष्टया जयसि कौन्तेय दिष्ट्या ते शत्रवो जिता: । दिष्ट्या गाण्डीवधन्वा च भीमसेनश्नू पाण्डव:,“कुन्तीनन्दन! सौभाग्यसे आपकी विजय हुई और सारे शत्रु परास्त हो गये। राजन! गाण्डीवधारी अर्जुन, पाण्डुकुमार भीमसेन, आप और माद्रीपुत्र पाण्डुनन्दन नकुल-सहदेव --ये सब-के-सब सकुशल हैं तथा जहाँ वीरोंका विनाश हुआ और तुम्हारे सारे शत्रु कालके गालमें चले गये, उस घोर संग्रामसे तुमलोग जीवित बच गये, यह बड़े सौभाग्यकी बात है
diṣṭyā jayasi kaunteya diṣṭyā te śatravo jitāḥ | diṣṭyā gāṇḍīvadhanvā ca bhīmasenaś ca pāṇḍavaḥ ||
বায়ু বললেন—হে কৌন্তেয়! সৌভাগ্যে তুমি বিজয়ী হয়েছ; সৌভাগ্যে তোমার শত্রুরা পরাজিত হয়েছে। সৌভাগ্যে গাণ্ডীবধারী অর্জুন ও পাণ্ডব ভীমসেনও কুশল আছে।
वायुदेव उवाच