Sarasvatī-Śāpavimokṣa, Rākṣasa-Mokṣa, and Aruṇā-Tīrtha
Indra–Namuci Expiation
तस्य तद् वचन श्रुत्वा कृपाशीलस्य सा सरित् | चिन्तयामास कौरव्य कि कृत्वा सुकृतं भवेत्,कुरुनन्दन! उन कृपाशील महर्षिका वह वचन सुनकर सरस्वती सोचने लगी, “क्या करनेसे शुभ होगा?”
tasya tad vacanaṁ śrutvā kṛpāśīlasya sā sarit | cintayāmāsa kauravya kiṁ kṛtvā sukṛtaṁ bhavet, kurunandana |
করুণাশীল মহর্ষির সেই বাক্য শুনে সরস্বতী নদী ভাবতে লাগল—“কী করলে সত্যিই পুণ্য হবে?”
वसिष्ठ उवाच