Saptasārasvata-tīrtha-prasaṅgaḥ | The Saptasārasvata Pilgrimage Account and the Maṅkaṇaka Narrative
अदृश्यमाना मनुजैर्व्यचरन् पुरुषर्षभ । एवं ख्यातो नरव्यापत्र लोके5स्मिन् स वनस्पति:,पुरुषश्रेष्ठल वे उन स्वीकृत नियमोंके अनुसार पृथक्-पृथक् विचरते हुए मनुष्योंसे अदृश्य रहकर घूमते थे। नरव्याप्र! इस प्रकार वह वनस्पति इस विश्वमें विख्यात था
হে পুরুষর্ষভ! মানুষের দৃষ্টির অগোচরে থেকে তারা বিচরণ করত। হে নরব্যাঘ্র! এইভাবে সেই বনস্পতি এই লোকেতে প্রসিদ্ধ হল।
वैशम्पायन उवाच