धृतराष्ट्रविलापः — Dhṛtarāṣṭra’s Lament and Inquiry (Śalya-parva, Adhyāya 2)
अनेत्रत्वाद् यदेतेषां न मे रूपनिदर्शनम् । पुत्रस्नेहकृता प्रीतिर्नित्यमेतेषु धारिता,यद्यपि नेत्रहीन होनेके कारण मैंने उनका रूप कभी नहीं देखा था, तथापि इन सबके प्रति पुत्रस्नेह-जनित प्रेमका भाव सदा ही रखा है
anetritvād yad eteṣāṃ na me rūpa-nidarśanam | putra-sneha-kṛtā prītir nityam eteṣu dhāritā ||
ধৃতরাষ্ট্র বললেন—অন্ধত্বের কারণে আমি তাদের রূপ কখনও দেখিনি; তবু পিতৃস্নেহজাত প্রেম আমি সর্বদা তাদের প্রতি ধারণ করে এসেছি।
धघतयाट्र उवाच