Aśvatthāmā’s Stuti of Rudra and Śiva’s Empowerment (सौप्तिकपर्व, अध्याय ७)
इस प्रकार श्रीमह्याभारत सौप्तिकपर्वमों अश्वत्थामाकी चिन्ताविषयक छठा अध्याय पूरा हुआ,स्तुतं स्तुत्यं स््तूयमानममोघं कृत्तिवाससम् | विलोहितं नीलकण्ठमसहां दुर्निवारणम् पूर्वकालमें आपकी स्तुति की गयी है, भविष्यमें भी आप स्तुतिके योग्य बने रहेंगे और वर्तमानकालमें भी आपकी स्तुति की जाती है। आपका कोई भी संकल्प या प्रयत्न व्यर्थ नहीं होता। आप व्याप्र-चर्ममय वस्त्र धारण करते हैं, लोहितवर्ण और नीलकण्ठ हैं। आपके वेगको सहन करना असम्भव है और आपको रोकना सर्वथा कठिन है। आप शुद्धस्वरूप ब्रह्म हैं। आपने ही ब्रह्माजीकी सृष्टि की है। आप ब्रह्मचारी, व्रतधारी तथा तपोनिष्ठ हैं, आपका कहीं अन्त नहीं है। आप तपस्वी जनोंके आश्रय, बहुत-से रूप धारण करनेवाले तथा गणपति हैं। आपके तीन नेत्र हैं। अपने पार्षदोंको आप बहुत प्रिय हैं। धनाध्यक्ष कुबेर सदा आपका मुख निहारा करते हैं। आप गौरांगिनी गिरिराजनन्दिनीके हृदय-वल्लभ हैं। कुमार कार्तिकेयके पिता भी आप ही हैं। आपका वर्ण पिंगल है। वृषभ आपका श्रेष्ठ वाहन है। आप अत्यन्त सूक्ष्म वस्त्र धारण करनेवाले और अत्यन्त उग्र हैं। उमादेवीको विभूषित करनेमें तत्पर रहते हैं। ब्रह्मा आदि देवताओंसे श्रेष्ठ और परात्पर हैं। आपसे श्रेष्ठ दूसरा कोई नहीं है। आप उत्तम धनुष धारण करनेवाले, दिगन्तव्यापी तथा सब देशोंके रक्षक हैं। आपके श्रीअंगोंमें सुवर्णमय कवच शोभा पाता है। आपका स्वरूप दिव्य है तथा आप चन्द्रमय मुकुटसे विभूषित होते हैं। मैं अपने चित्तको पूर्णतः एकाग्र करके आप परमेश्वरकी शरणमें आता हूँ
stutaṁ stutyaṁ stūyamānam amoghaṁ kṛttivāsasam | vilohitaṁ nīlakaṇṭham asahaṁ durnivāraṇam ||
সঞ্জয় বললেন—অতীতে আপনার স্তব হয়েছে; ভবিষ্যতেও আপনি চিরস্তবযোগ্য থাকবেন; এবং বর্তমানেও আপনার স্তব করা হচ্ছে। আপনার কোনো সংকল্পই নিষ্ফল হয় না। আপনি কৃত্তিবাস, লোহিতবর্ণ ও নীলকণ্ঠ; আপনার বেগ অসহনীয় এবং আপনার গতি রোধ করা দুঃসাধ্য। এভাবে স্তোত্রটি প্রভুর অপ্রতিরোধ্য শক্তি ও অমোঘ ইচ্ছাকে ঘোষণা করে; আর সৌপ্তিক পর্বের হিংসা ও নৈতিক ভাঙনের মধ্যে শরণাগতিকেই আশ্রয় বলে স্থাপন করে।
संजय उवाच
The verse teaches that the Lord’s will is unfailing (amogha) and irresistible (asaha, durnivāraṇa); therefore, in times of moral crisis and violence, the proper ethical posture is humility and surrender to the divine order rather than reliance on mere human power.
In the Sauptika context, amid the aftermath of the night-raid and its grievous consequences, the narration turns to a stuti (hymn) praising Śiva through characteristic epithets, emphasizing his unstoppable might and ever-praiseworthy nature.