अध्याय १ — न्यग्रोधवनोपवेशनम् तथा द्रौणिनिश्चयः
Night at the Banyan and Drauṇi’s Resolve
उपेत्य तु तदा राजन न्यग्रोधं॑ ते महारथा: । ददृशुर्दिपदां श्रेष्ठा: श्रेष्ठ तं वै वनस्पतिम्,राजन! मनुष्योंमें श्रेष्ठ उन महारथियोंने पास जाकर उस उत्तम वनस्पति (बरगद)-को देखा
upetya tu tadā rājan nyagrodhaṁ te mahārathāḥ | dadṛśur dvipadāṁ śreṣṭhāḥ śreṣṭhaṁ taṁ vai vanaspatim ||
রাজন! তখন সেই মহারথীরা—মানুষদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ—নিকটে গিয়ে সেই উৎকৃষ্ট বনস্পতিকে, অর্থাৎ বটবৃক্ষকে দেখল।
संजय उवाच