धृतराष्ट्र रवाच अजाततशत्रो भद्र|ं ते अरिष्टं स्वस्ति गच्छत । अनुज्ञाता: सहधना: स्वराज्यमनुशासत,धृतराष्ट्रने कहा--अजातशत्रो! तुम्हारा कल्याण हो। तुम मेरी आज्ञासे हारे हुए धनके साथ बिना किसी विषघ्न-बाधाके कुशलपूर्वक अपनी राजधानीको जाओ और अपने राज्यका शासन करो
ধৃতরাষ্ট্র বললেন—অজাতশত্রো! তোমার মঙ্গল হোক। আমার অনুমতিতে পরাজিত ধনসহ, কোনো বিঘ্ন-বাধা ছাড়াই কুশলে নিজ রাজধানীতে গিয়ে নিজের রাজ্য শাসন করো।
युधिछिर उवाच