असम्भधिन्नार्थमर्यादा: साधव: प्रियदर्शना: । तथा चरितमार्येण त्वयास्मिन् सत्समागमे,सत्पुरुष आर्यमर्यादाको कभी भंग नहीं करते। उनके दर्शनसे सभी लोग प्रसन्न हो जाते हैं। युधिष्ठि!! कौरव-पाण्डवोंके समागममें तुमने श्रेष्ठ पुरुषोंके समान ही आचरण किया है
সাধুরা অর্থ ও মর্যাদার সীমা ভঙ্গ করে না; তাদের দর্শনে সকলেই প্রীত হয়। এই সৎসঙ্গমে তুমিও আর্যজনোচিত আচরণ করেছ।
युधिछिर उवाच