
Kuntī’s Consolation to Draupadī and Lament for the Dispossessed Pandavas (सभा पर्व, अध्याय 70)
Upa-parva: Vanapravēśa (Departure for the Forest) — Kuntī–Draupadī Lament Sequence
Vaiśaṃpāyana narrates that as the departure for exile proceeds, Draupadī (Kṛṣṇā) approaches Kuntī (Pṛthā) and other women to take leave with appropriate salutations and embraces. A loud lament rises within the Pandavas’ inner quarters. Seeing Draupadī leaving in distress, Kuntī—overwhelmed—addresses her with effortful speech: she discourages despair, affirms Draupadī’s knowledge of women’s duties and conduct, and urges her to travel safely with steadfast remembrance and protection through adherence to elder-duty (guru-dharma). Kuntī then turns to her sons, seeing them deprived of ornaments and garments, covered with animal skins, downcast with shame and surrounded by hostile onlookers and grieving friends; she embraces them and laments the reversal of order and fortune, attributing blame to destiny and to her own misfortune in having borne sons now forced into hardship. She worries about their life in difficult forests and regrets having remained in the city had she known exile was certain. The Pandavas console and bow to Kuntī and proceed to the forest. Vidura and others comfort Kuntī and lead her home, while Dhṛtarāṣṭra, mentally shaken by grief, sends for Vidura; Vidura goes to the king, who anxiously questions him.
Chapter Arc: सभामण्डप में द्रौपदी के अपमान और करुण क्रन्दन को देखकर भी वातावरण काँप उठता है—वह कुररी-सी आर्त होकर रोती है, और राजसभा मौन-सा हो जाता है। → धृतराष्ट्र-पुत्र दुर्योधन, अन्य राजाओं और कुरुवृद्धों की उपस्थिति में, द्रौपदी को छल-कपटयुक्त वचनों से घेरता है और उसे प्रश्नों में बाँधकर अपमान को ‘न्याय’ का रूप देने का प्रयास करता है। सबकी दृष्टि धर्मज्ञ युधिष्ठिर पर टिकती है कि वे क्या उत्तर देंगे। → कोलाहल थमते ही भीमसेन चन्दनचर्चित भुजा उठाकर गर्जना करता है—यदि धर्मराज की मर्यादा बाधक न होती तो वह धार्तराष्ट्रों को सिंह की भाँति कुचल देता; वह अपनी परिघ-सी भुजाओं के बीच से इन्द्र तक के न बच पाने की प्रतिज्ञा-सी घोषणा करता है और द्यूत-धर्म के नाम पर हुए अन्याय को असह्य बताता है। → भीष्म, द्रोण और विदुर भीम को संयम का उपदेश देते हैं—सभा में अभी क्षमा और धैर्य ही उचित है; भीम का रोष रोका तो जाता है, पर शान्त नहीं होता। → भीम का प्रतिशोध-वचन सभा के ऊपर काले बादल की तरह टिक जाता है—धर्म और क्रोध के इस संघर्ष का परिणाम आगे किस रूप में फूटेगा, यह अनिश्चित रह जाता है।
Verse 1
अफ्--णक+ सप्ततितमो< ध्याय: दुर्योधनके छल-कपटयुक्त वचन और भीमसेनका रोषपूर्ण उद्गार वैशम्पायन उवाच तथा तु दृष्टवा बहु तत्र देवीं रोरूयमाणां कुररीमिवार्ताम् । नोचुर्वच: साध्वथ वाप्यसाधु महीक्षितो धार्तराष्ट्रस्य भीता:,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! महारानी द्रौपदीको वहाँ आर्त होकर कुररीकी भाँति बहुत विलाप करती देखकर भी सभामें बैठे हुए राजालोग दुर्योधनके भयसे भला या बुरा कुछ भी नहीं कह सके
বৈশম্পায়ন বললেন—জনমেজয়! সেখানে মহারাণী দ্রৌপদীকে কুররী পাখির মতো ব্যাকুল হয়ে উচ্চস্বরে বিলাপ করতে দেখেও সভায় বসা রাজারা ধৃতরাষ্ট্রপুত্র দুর্যোধনের ভয়ে কোনো কথা বলল না—না সৎপক্ষের সমর্থনে, না অসৎকর্মের নিন্দায়।
Verse 2
दृष्टवा तथा पार्थिवपुत्रपौत्रां- स्तृष्णी भूतान् धृतराष्ट्रस्य पुत्र: । स्मयन्निवेदं वचनं बभाषे पाञ्चालराजस्य सुतां तदानीम्,राजाओंके बेटों और पोतोंको मौन देखकर धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधनने उस समय मुसकराते हुए पांचालराजकुमारी द्रौपदीसे यह बात कही
রাজাদের পুত্র-পৌত্রদের নীরব দেখে ধৃতরাষ্ট্রপুত্র দুর্যোধন তখন মৃদু হাসিতে পাঞ্চালরাজকন্যা দ্রৌপদীকে এই কথা বলল।
Verse 3
दुर्योधन उवाच तिष्ठत्वयं प्रश्न उदारसत्त्वे भीमे<र्जुने सहदेवे तथैव । पत्यौ च ते नकुले याज्ञसेनि वदन्त्वेते वचन त्वत्प्रसूतम्
দুর্যোধন বলল—“উদারচিত্তে, এই প্রশ্নটি থাক; ভীম, অর্জুন, সহদেব এবং তোমার স্বামী নকুল—হে যাজ্ঞসেনী—এরা তোমার থেকেই উদ্ভূত কথার উত্তর দিক।”
Verse 4
दुर्योधन बोला--द्रौपदी! तुम्हारा यह प्रश्न तुम्हारे ही पति महाबली भीम, अर्जुन, सहदेव और नकुलपर छोड़ दिया जाता है। ये ही तुम्हारी पूछी हुई बातका उत्तर दें ।। अनीशथ्ररं विब्रुवन्त्वार्यम ध्ये युधिष्ठिरं तव पाज्चालि हेतो: । कुर्वन्तु सर्वे चानृतं धर्मराजं पाज्चालि त्वं मोक्ष्यसे दासभावात्,पांचालि! इन श्रेष्ठ राजाओंके बीच ये लोग यह स्पष्ट कह दें कि युधिष्ठिरको तुम्हें दाँवपर रखनेका कोई अधिकार नहीं था। सभी पाण्डव मिलकर धर्मराज युधिष्ठिरको झूठा ठहरा दें। फिर पांचालि! तुम दास्यभावसे मुक्त कर दी जाओगी
দুর্যোধন বলল—“দ্রৌপদী! তোমার এই প্রশ্ন তোমারই স্বামী—মহাবলী ভীম, অর্জুন, সহদেব ও নকুল—এদের উপরেই থাক। তোমার জিজ্ঞাসার উত্তর তারাই দিক। হে পাঞ্চালী, এই শ্রেষ্ঠ রাজাদের সম্মুখে তারা স্পষ্ট করে বলুক—যুধিষ্ঠিরের তোমাকে পণ রাখার কোনো অধিকার ছিল না। সকল পাণ্ডব একত্রে ধর্মরাজ যুধিষ্ঠিরকে মিথ্যাবাদী প্রমাণ করুক; তবে, হে পাঞ্চালী, তুমি দাসত্ব থেকে মুক্ত হবে।”
Verse 5
धर्मे स्थितो धर्मसुतो महात्मा स्वयं चेद॑ कथयव्विन्द्रकल्प: । ईशो वा ते ह्नीशो5थ वैष वाक्यादस्य क्षिप्रमेके भजस्व,ये धर्मपुत्र महात्मा युधिष्ठिर इन्द्रके समान तेजस्वी तथा सदा धर्ममें स्थित रहनेवाले हैं। तुमको दाँवपर रखनेका इन्हें अधिकार था या नहीं? ये स्वयं ही कह दें; फिर इन्हींके कथनानुसार तुम शीघ्र दासीपन या अदासीपन किसी एकका आश्रय लो
দুর্যোধন বলল—“ধর্মে স্থিত মহাত্মা ধর্মপুত্র যুধিষ্ঠির, ইন্দ্রসম তেজস্বী, তিনি নিজেই বলুন—তোমাকে পণ রাখার অধিকার তাঁর ছিল কি না। তাঁর কথামতো তুমি শীঘ্রই দুই অবস্থার একটিকে গ্রহণ করো—দাসত্ব বা দাসত্বমুক্তি।”
Verse 6
सर्वे हीमे कौरवेया: सभायां दुःखान्तरे वर्तमानास्तवैव । न वि्लुवन्त्यार्यसत्त्वा यथावत् पतींश्व ते समवेक्ष्याल्पभाग्यान्,द्रौपदी! ये सभी उत्तम स्वभाववाले कुरुवंशी इस सभामें तुम्हारे लिये ही दुःखी हैं और तुम्हारे मन्दभाग्य पतियोंको देखकर तुम्हारे प्रश्चका ठीक-ठीक उत्तर नहीं दे पाते हैं
দুর্যোধন বলল—“দ্রৌপদী! এই সভায় আমার সকল কৌরব তোমার কারণেই দুঃখে নিমগ্ন। তোমার দুর্ভাগা স্বামীদের দিকে চেয়ে এই আর্যস্বভাব লোকেরা তোমার প্রশ্নের যথাযথ উত্তর দিতে পারছে না।”
Verse 7
वैशम्पायन उवाच ततः सभ्या: कुरुराजस्य तस्य वाक्यं सर्वे प्रशशंसुस्तथोच्चै: । चेलावेधांश्वापि चक्रुर्नदन्तो हाहेत्यासीदपि चैवार्तनाद:,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! तदनन्तर एक ओर सभी सभासदोंने कुरुराज दुर्योधनके उस कथनकी उच्च स्वरसे भूरि-भूरि प्रशंसा की और गर्जना करते हुए वे वस्त्र हिलाने लगे तथा वहीं दूसरी ओर हाहाकार और आर्तनाद होने लगा
বৈশম্পায়ন বললেন—জনমেজয়! তারপর সভাস্থ সকলেই কুরু-রাজ দুর্যোধনের সেই বাক্য উচ্চস্বরে ভূরি-ভূরি প্রশংসা করল। উল্লাসে চিৎকার করতে করতে তারা বস্ত্র নাড়াতে লাগল; কিন্তু একই সঙ্গে ‘হা হা’ ধ্বনি ও আর্তনাদের বিলাপও উঠল।
Verse 8
श्रुत्वा तु वाक््यं सुमनोहरं त- दर्षश्वासीत् कौरवाणां सभायाम् | सर्वे चासन् पार्थिवा: प्रीतिमन्तः कुरुश्रेष्ठ धार्मिकं पूजयन्त:,दुर्योधनका वह मनोहर वचन सुनकर उस समय सभामें कौरवोंको बड़ा हर्ष हुआ। अन्य सब राजा भी बड़े प्रसन्न हुए तथा दुर्योधनको कौरवोंमें श्रेष्ठ और धार्मिक कहते हुए उसका आदर करने लगे
বৈশম্পায়ন বললেন—সেই অতিশয় মনোহর বাক্য শুনে তখন রাজসভায় কৌরবদের মহা আনন্দ হল। অন্যান্য রাজাগণও প্রসন্ন হলেন এবং দুর্যোধনকে কুরুদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ ও ধর্মপরায়ণ বলে প্রশংসা করে তাঁকে সম্মান জানাতে লাগলেন।
Verse 9
युधिष्ठिरं च ते सर्वे समुदैक्षन्त पार्थिवा: । कि नु वक्ष्यति धर्मज्ञ इति साचीकृतानना:,फिर वे सब नरेश मुँह घुमाकर राजा युधिष्ठिरकी ओर इस आशासे देखने लगे कि देखें, ये धर्मज्ञ पाण्डुकुमार क्या कहते हैं?
তখন সেই সকল রাজা মুখ ঘুরিয়ে রাজা যুধিষ্ঠিরের দিকে তাকাতে লাগলেন—“এই ধর্মজ্ঞ এখন কী বলবেন?”
Verse 10
कि नु वक्ष्यति बीभत्सुरजितो युधि पाण्डव: । भीमसेनो यमौ चोभौ भृशं कौतूहलान्विता:,युद्धमें कभी पराजित न होनेवाले पाण्डुनन्दन अर्जुन किस प्रकार अपना मत व्यक्त करते हैं? भीमसेन, नकुल तथा सहदेव भी क्या कहते हैं? इसके लिये उन राजाओंके मनमें बड़ी उत्कण्ठा थी
তাদের মনে প্রবল কৌতূহল জাগল—“যুদ্ধে অজেয় পাণ্ডুনন্দন বিভৎসু অর্জুন কী মত প্রকাশ করবেন? আর ভীমসেন ও যমজ দুই ভাই নকুল-সহদেবই বা কী বলবেন?”
Verse 11
तस्मिन्नुपरते शब्दे भीमसेनो<ब्रवीदिदम् । प्रगृह्म रुचिरं दिव्यं भुजं चन्दनचर्चितम्,वह कोलाहल शान्त होनेपर भीमसेन अपनी चन्दनचर्चित सुन्दर दिव्य भुजा उठाकर इस प्रकार बोले
যখন সেই কোলাহল স্তব্ধ হল, তখন ভীমসেন চন্দনলেপিত তাঁর সুন্দর, দীপ্তিমান বাহু তুলে এভাবে বললেন।
Verse 12
भीमसेन उवाच यद्येष गुरुरस्माकं धर्मराजो महामना: । न प्रभु: स्थात् कुलस्यास्य न वयं मर्षयेमहि
ভীমসেন বললেন—যদি এই মহামনা ধর্মরাজ, যিনি আমাদের পূজ্য অগ্রজ ও পাণ্ডবকুলের অধিপতি-রক্ষক, তিনি এই কুলের স্বামী না হতেন, তবে আমরা এ অবস্থা কখনও সহ্য করতাম না; আমরা তা মেনে নিতাম না।
Verse 13
भीमसेनने कहा--यदि ये महामना धर्मराज युधिष्छिर हमारे पितृतुल्य तथा इस पाण्डुकुलके स्वामी न होते तो हम कौरवोंका यह अत्याचार कदापि सहन नहीं करते ।। ईशो नः पुण्यतपसां प्राणानामपि चेश्वर: । मन्यतेडजितमात्मानं यद्येष विजिता वयम्,ये हमारे पुण्य, तप और प्राणोंके भी प्रभु हैं। यदि ये द्रौपदीको दाँवपर लगानेसे पूर्व अपनेको हारा हुआ नहीं मानते हैं तो हम सब लोग इनके द्वारा दाँवपर रखे जानेके कारण हारे जा चुके हैं। यदि मैं हारा गया न होता तो अपने पैरोंसे पृथ्वीका स्पर्श करनेवाला कोई भी मरणथधर्मा मनुष्य द्रौपदीके इन केशोंको छू लेनेपर मेरे हाथसे जीवित नहीं बच सकता था। राजाओ! परिघके समान मोटी और गोलाकार मेरी इन विशाल भुजाओंकी ओर तो देखो। इनके बीचमें आकर इन्द्र भी जीवित नहीं बच सकता
ভীম বললেন—যদি এই মহামনা ধর্মরাজ যুধিষ্ঠির, যিনি আমাদের পিতৃতুল্য এবং পাণ্ডবকুলের অধিপতি, এমন না হতেন, তবে আমরা কৌরবদের এই অত্যাচার কখনও সহ্য করতাম না। তিনি আমাদের পুণ্য, তপস্যা এবং প্রাণেরও অধীশ্বর। যদি দ্রৌপদীকে পণ রাখার আগে তিনি নিজেকে পরাজিত বলে না মানেন, তবু আমরা—যাদের তিনি পণ হিসেবে রেখেছেন—ইতিমধ্যেই পরাজিত গণ্য। আমি যদি পরাজিত না হতাম, তবে পৃথিবীতে পদচারণা করা কোনো মর্ত্য, যে পাঞ্চালীর এই কেশ স্পর্শ করত, আমার হাত থেকে জীবিত রেহাই পেত না। হে রাজাগণ, আমার এই বিশাল বাহুদ্বয় দেখ—লোহার গদার মতো মোটা ও গোল; এদের মাঝখানে এলে শতক্রতু ইন্দ্রও জীবিত বেরোতে পারত না।
Verse 14
न हि मुच्येत मे जीवन् पदा भूमिमुपस्पृशन् | मर्त्यधर्मा परामृश्य पाज्चाल्या मूर्थजानिमान्,ये हमारे पुण्य, तप और प्राणोंके भी प्रभु हैं। यदि ये द्रौपदीको दाँवपर लगानेसे पूर्व अपनेको हारा हुआ नहीं मानते हैं तो हम सब लोग इनके द्वारा दाँवपर रखे जानेके कारण हारे जा चुके हैं। यदि मैं हारा गया न होता तो अपने पैरोंसे पृथ्वीका स्पर्श करनेवाला कोई भी मरणथधर्मा मनुष्य द्रौपदीके इन केशोंको छू लेनेपर मेरे हाथसे जीवित नहीं बच सकता था। राजाओ! परिघके समान मोटी और गोलाकार मेरी इन विशाल भुजाओंकी ओर तो देखो। इनके बीचमें आकर इन्द्र भी जीवित नहीं बच सकता
ভীমসেন বললেন—পৃথিবীতে পদচারণা করা কোনো মর্ত্য, যদি পাঞ্চালীর এই কেশ স্পর্শ করত, তবে সে আমার হাত থেকে জীবিত রেহাই পেত না। আমি যদি পরাজয়ের লাঞ্ছনায় আবদ্ধ না থাকতাম, তবে এ অপরাধ শাস্তিহীন থাকত না।
Verse 15
पश्यध्वं ह्वायतौ वृत्तौ भुजी मे परिघाविव । नैतयोरन्तरं प्राप्प मुच्येतापि शतक्रतु:,ये हमारे पुण्य, तप और प्राणोंके भी प्रभु हैं। यदि ये द्रौपदीको दाँवपर लगानेसे पूर्व अपनेको हारा हुआ नहीं मानते हैं तो हम सब लोग इनके द्वारा दाँवपर रखे जानेके कारण हारे जा चुके हैं। यदि मैं हारा गया न होता तो अपने पैरोंसे पृथ्वीका स्पर्श करनेवाला कोई भी मरणथधर्मा मनुष्य द्रौपदीके इन केशोंको छू लेनेपर मेरे हाथसे जीवित नहीं बच सकता था। राजाओ! परिघके समान मोटी और गोलाकार मेरी इन विशाल भुजाओंकी ओर तो देखो। इनके बीचमें आकर इन्द्र भी जीवित नहीं बच सकता
ভীমসেন বললেন—দেখো, আমার এই দুই বাহু লোহার গদার মতো দীর্ঘ, মোটা ও গোল। এদের মাঝখানে এলে শতক্রতু ইন্দ্রও জীবিত রেহাই পেত না।
Verse 16
धर्मपाशसितत्त्वेवं नाधिगच्छामि संकटम् । गौरवेण विरुद्धश्न निग्रहादर्जुनस्य च,मैं धर्मके बन्धनमें बँधा हूँ, बड़े भाईके गौरवने मुझे रोक रखा है और अर्जुन भी मना कर रहा है, इसीलिये मैं इस संकटसे पार नहीं हो पाता
ভীমসেন বললেন—আমি ধর্মের পাশে আবদ্ধ; জ্যেষ্ঠ ভ্রাতার প্রতি শ্রদ্ধা আমাকে রোধ করে, আর অর্জুনও আমাকে সংযত করছে। তাই আমি এই সংকট অতিক্রম করতে পারছি না।
Verse 17
धर्मराजनिसृष्टस्तु सिंह: क्षुद्रमृगानिव । धार्तराष्ट्रानिमान् पापान् निष्पिषेयं तलासिभि:,यदि धर्मराज मुझे आज्ञा दे दें तो जैसे सिंह छोटे मृगोंको दबोच लेता है, उसी प्रकार मैं धृतराष्ट्रके इन पापी पुत्रोंको तलवारकी जगह हाथोंके तलवोंसे ही मसल डालूँ
ধর্মরাজ যুধিষ্ঠির যদি আমাকে আজ্ঞা দেন, তবে যেমন সিংহ ক্ষুদ্র মৃগদের ধরে চূর্ণ করে, তেমনই আমি ধৃতরাষ্ট্রের এই পাপী পুত্রদের তলোয়ার নয়—নিজ হাতের তালু দিয়েই পিষে ফেলব।
Verse 18
वैशम्पायन उवाच तमुवाच तदा भीष्मो द्रोणो विदुर एव च । क्षम्यतामिदमित्येवं सर्व सम्भाव्यते त्वयि,वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन्! तब भीष्म, द्रोण और विदुरने भीमसेनको शान्त करते हुए कहा--“भीम! क्षमा करो, तुम सब कुछ कर सकते हो”
বৈশম্পায়ন বললেন—তখন ভীষ্ম, দ্রোণ এবং বিদুর ভীমসেনকে শান্ত করতে বললেন—“এটি ক্ষমা করো; তোমার দ্বারা তো সবই সম্ভব।”
Verse 70
इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि द्यूतपर्वणि भीमवाक्ये सप्ततितमो5ध्याय:
এইভাবে শ্রীমহাভারতের সভাপর্বের দ্যূতপর্বে ‘ভীমবাক্য’ নামে সত্তরতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।
The dilemma is how to preserve dharma and composure when authority and procedure have produced unjust outcomes—especially how Draupadī and Kuntī negotiate duty, dignity, and emotional truth during forced exile.
The chapter models disciplined resilience: grief is acknowledged but should not disable duty; adherence to ethical conduct and protective norms (guru-dharma/strī-dharma) is presented as a stabilizing strategy amid political collapse.
No explicit phalaśruti appears here; the meta-significance is narrative and ethical—this farewell sequence functions as a moral bridge from courtly injustice to exile, sharpening the epic’s inquiry into dharma’s endurance under coercion.