Adhyaya 66
Sabha ParvaAdhyaya 6613 Verses

Adhyaya 66

अध्याय ६६: पुनर्द्यूत-प्रस्तावः (Proposal for a Renewed Dice Game)

Upa-parva: Dyūta-anuvṛtti (Renewed Dice-Counsel Episode)

Janamejaya asks how the minds of both Pāṇḍavas and Dhārtarāṣṭras stood after the Pāṇḍavas were permitted to depart with wealth. Vaiśaṃpāyana reports that Duḥśāsana quickly approaches Duryodhana in distress, asserting that the elder (Dhṛtarāṣṭra) is allowing assets to pass to rivals and urging immediate strategic recognition. Duryodhana, Karṇa, and Śakuni then address Dhṛtarāṣṭra with polished speech, invoking Bṛhaspati’s counsel on statecraft: enemies should be subdued by every method before they become dangerous. They describe the Pāṇḍavas as aroused and prepared, using vivid analogies (angered serpents) to argue that delay invites retaliation and public ridicule. Their proposed solution is a second dice match engineered through Śakuni’s expertise, with a structured exile condition (twelve years forest dwelling and a thirteenth year in concealment), aiming to secure control without open battle. Dhṛtarāṣṭra orders the Pāṇḍavas recalled despite widespread objections by elders and well-wishers who urge peace. Gāndhārī, grieving yet principled, reminds Dhṛtarāṣṭra of earlier omens and warnings about Duryodhana’s birth and character, cautioning that provoking restrained Pāṇḍavas is like breaking a dam or rekindling a quenched fire. Dhṛtarāṣṭra admits inability to restrain the dynasty’s internal drive and authorizes the renewed dice engagement, closing the chapter with institutional endorsement of a high-risk policy choice.

Chapter Arc: द्यूतसभा की धूल अभी बैठी भी नहीं कि दुर्योधन विदुर को पुकारकर द्रौपदी के विषय में कठोर वचन छेड़ देता है—और सभा में नीति का वज्रपात होने वाला है। → विदुर दुर्योधन के दुर्वचन को ‘कालपाश’ से बँधे मन की पहचान बताकर उसे चेताते हैं कि जो ऊँचाई पर लटक रहा हो, वह गिरने से पहले अपना संकट नहीं देख पाता। वे द्रौपदी को ‘दासी’ कहे जाने का खंडन करते हैं और द्यूत के नैतिक-वैधानिक आधार पर प्रहार करते हैं। → विदुर का निर्णायक उद्घोष—द्रौपदी दासी नहीं हो सकती; अनीश (स्वयं पर अधिकार खो चुके) राजा द्वारा उसे पणे पर रखना ही अधर्म है—और दुर्योधन का यह द्यूत-आसक्ति कुरुवंश के सर्वनाश का बीज है। → विदुर कटुवचन के परिणाम बताते हैं—कटु वाणी बाण बनकर पहले बोलने वाले को ही जलाती है; सुहृदों की पथ्य वाणी न सुनी जाए तो लोभ ही बढ़ता है। अध्याय का स्वर दुर्योधन के भविष्य-नाश की भविष्यवाणी पर टिकता है। → सुहृदों की नीति-अवज्ञा और लोभ-वृद्धि के बीच संकेत स्पष्ट है—सभा का अधर्म अब वंश-विनाश की ओर अपरिहार्य गति पकड़ चुका है।

Shlokas

Verse 1

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके १६३ “लोक मिलाकर कुल ४६३ “लोक हैं) निज जा धन #* षट्षष्टितमो<5 ध्याय: विदुरका दुर्योधनको फटकारना दुर्योधन उवाच एहि क्षत्तद्रौपदीमानयस्व प्रियां भार्या सम्मतां पाण्डवानाम्‌ | सम्मार्जतां वेश्म परैतु शीघ्र तत्रास्तु दासीभिरपुण्यशीला,दुर्योधन बोला--विदुर! यहाँ आओ। तुम जाकर पाण्डवोंकी प्यारी और मनोनुकूल पत्नी द्रौपदीको यहाँ ले आओ। वह पापाचारिणी शीघ्र यहाँ आये और मेरे महलमें झाड़ू लगाये। उसे वहीं दासियोंके साथ रहना होगा

দুর্যোধন বলল—এসো, ক্ষত্তা (বিদুর)! তুমি গিয়ে পাণ্ডবদের প্রিয় ও সম্মত স্ত্রী দ্রৌপদীকে এখানে নিয়ে এসো। সেই পাপাচারিণী তৎক্ষণাৎ আমার প্রাসাদ ঝাঁট দিক; আর সেখানেই দাসীদের সঙ্গে থাকুক।

Verse 2

विदुर उवाच दुर्विभाषं भाषितं त्वादृशेन न मन्द सम्बुध्यसि पाशबद्ध: । प्रपाते त्वं लम्बमानो न वेत्सि व्याप्रान मृरः कोपयसे5तिवेलम्‌

বিদুর বললেন—তোমার মতো লোকের মুখে এমন কঠোর ও অশোভন বাক্যই মানায়; কিন্তু মোহের ফাঁসে আবদ্ধ বলে তুমি বুঝতে পারছ না। তুমি খাদের উপর ঝুলে আছ, তবু বিপদ টের পাও না; এক মৃগের মতো তুমি ব্যাঘ্রদের ক্রোধ সীমা ছাড়িয়ে উসকে দিচ্ছ।

Verse 3

विदुर बोले--ओ मूर्ख! तेरे-जैसे नीचके मुखसे ही ऐसा दुर्वचन निकल सकता है। अरे! तू कालपाशसे बँँधा हुआ है, इसीलिये कुछ समझ नहीं पाता। तू ऐसे ऊँचे स्थानमें लटक रहा है जहाँसे गिरकर प्राण जानेमें अधिक विलम्ब नहीं; किंतु तुझे इस बातका पता नहीं है। तू एक साधारण मृग होकर व्याप्रोंको अत्यन्त क़ुद्ध कर रहा है ।। आशीविषास्ते शिरसि पूर्णकोपा महाविषा: | मा कोपिष्ठा: सुमन्दात्मन्‌ मा गमस्त्वं यमक्षयम्‌,मन्दात्मन्‌! तेरे सिरपर कोपमें भरे हुए महान्‌ विषधर सर्प चढ़ आये हैं। तू उनका क्रोध न बढ़ा, यमलोकमें जानेको उद्यत न हो

বিদুর বললেন—হে মূঢ়! তোর মতো নীচের মুখ থেকেই এমন কদর্য বাক্য বেরোয়। তুই কালপাশে আবদ্ধ, তাই কিছুই বুঝিস না। তুই উঁচু স্থান থেকে ঝুলে আছিস; পড়লে প্রাণ যেতে দেরি নেই—তবু টের পাচ্ছিস না। তুচ্ছ মৃগের মতো তুই ব্যাঘ্রদের ক্রোধ সীমা ছাড়িয়ে উসকে দিচ্ছিস। তোর মাথায় মহাবিষধর আশীবিষ সাপেরা পূর্ণ ক্রোধে উঠে বসেছে; হে মন্দবুদ্ধি, তাদের ক্রোধ আর বাড়াস না—যমলোকের দিকে ধাবিত হোস না।

Verse 4

न हि दासीत्वमापन्ना कृष्णा भवितुमहति । अनीशेन हि राज्जैषा पणे न्यस्तेति मे मति:

বিদুর বললেন—কৃষ্ণা (দ্রৌপদী) দাসীত্বে পতিত হওয়ার যোগ্য নন। আমার মতে, যিনি নিজেই কর্তৃত্ব হারিয়েছিলেন, সেই রাজাই তাঁকে পাশার পণে রেখেছিল; অতএব সেই পণই অবৈধ।

Verse 5

द्रौपदी कभी दासी नहीं हो सकती, क्योंकि राजा युधिष्ठिर जब पहले अपनेको हारकर द्रौपदीको दाँवपर लगानेका अधिकार खो चुके थे, उस दशामें उन्होंने इसे दाँवपर रखा है (अतः मेरा विश्वास है कि द्रौपदी हारी नहीं गयी) ।। अयं धत्ते वेणुरिवात्मघाती फल राजा धृतराष्ट्रस्य पुत्र: । द्यूतं हि वैराय महाभयाय मत्तो न बुध्यत्ययमन्तकालम्‌

বিদুর বললেন—দ্রৌপদী কখনও দাসী হতে পারে না; কারণ রাজা যুধিষ্ঠির প্রথমে নিজেকেই হেরে বসেছিলেন, তাই পরে দ্রৌপদীকে পণ রাখার ন্যায়সঙ্গত অধিকার তাঁর ছিল না; অতএব তিনি বিধিসম্মতভাবে জিতেও নেননি। ধৃতরাষ্ট্রের এই পুত্র রাজা বাঁশের মতো আত্মঘাতী ফল ধারণ করছে। পাশা-খেলা বৈর ও মহাভয় জন্মায়; কিন্তু মোহে মত্ত এই ব্যক্তি মাথার উপর নৃত্যরত মৃত্যুকেও চিনতে পারে না।

Verse 6

जैसे बाँस अपने नाशके लिये ही फल धारण करता है, उसी प्रकार धृतराष्ट्रके पुत्र इस राजा दुर्योधनने महान्‌ भयदायक वैरकी सृष्टिके लिये इस जूएके खेलको अपनाया है। यह ऐसा मतवाला हो गया है कि मौत सिरपर नाच रही है; किंतु इसे उसका पता ही नहीं है ।। नारुन्तुदः स्यान्न नृशंसवादी न हीनत: परमभ्याददीत । ययास्य वाचा पर उद्विजेत नतां वदेदुषतीं पापलोक्याम्‌,किसीको मर्मभेदी बात न कहे, किसीसे कठोर वचन न बोले। नीच कर्मके द्वारा शत्रुको वशमें करनेकी चेष्टा न करे। जिस बातसे दूसरेको उद्वेग हो, जो जलन पैदा करनेवाली और नरककी प्राप्ति करानेवाली हो, वैसी बात मुँहले कभी न निकाले

যেমন বাঁশ নিজের ধ্বংসের জন্যই ফল ধারণ করে, তেমনই ধৃতরাষ্ট্র-পুত্র দুর্যোধন এই পাশাখেলা গ্রহণ করেছে মহাভয়ংকর বৈর সৃষ্টির জন্য। সে এমন মোহে মত্ত যে মৃত্যু যেন তার মাথার উপর নৃত্য করছে, তবু সে তা বোঝে না। অতএব কারও হৃদয় বিদ্ধ করে এমন কথা বলা উচিত নয়, নিষ্ঠুর বাক্য উচ্চারণ করা উচিত নয়, নীচ উপায়ে লাভ চাইতে নেই; আর যে বাক্য অন্যকে অস্থির করে—দ্বেষে দগ্ধ এবং নরকগামী—তা কখনও বলা উচিত নয়।

Verse 7

समुच्चरन्त्यतिवादाश्न वक्‍त्राद्‌ यैराहत: शोचति रात्र्यहानि । परस्य नामर्मसु ते पतन्ति तान्‌ पण्डितो नावसूजेत्‌ परेषु,मुँहसे जो कटु वचनरूपी बाण निकलते हैं, उनसे आहत हुआ मनुष्य रात-दिन शोक और चिन्तामें डूबा रहता है। वे दूसरेके मर्मपर ही आघात करते हैं; अतः विद्वान्‌ पुरुषको दूसरोंके प्रति निष्ठुर वचनोंका प्रयोग नहीं करना चाहिये

মুখ থেকে যে তীক্ষ্ণ ও অতিরিক্ত বাক্য তীরের মতো বেরিয়ে আসে, তাতে আহত মানুষ দিনরাত শোকে জর্জরিত থাকে। সে বাক্য অন্যের মর্মস্থানে গিয়ে আঘাত করে; অতএব পণ্ডিত ব্যক্তি কারও প্রতি নিষ্ঠুর ভাষা ব্যবহার করবে না।

Verse 8

द्यूत-क्रीडामें युधिष्ठिरकी पराजय दुःशासनका द्रौपदीके केश पकड़कर खींचना अजो हि शस्त्रमगिलत्‌ किलैक: शस्त्रे विपन्ने शिरसास्य भूमौ | निकृन्तनं स्वस्य कण्ठस्य घोरं तद्वद्‌ वैरं मा कृथा: पाण्डुपुत्रै:,कहते हैं, एक बकरा कोई शस्त्र निगलने लगा; किंतु जब वह निगला न जा सका, तब उसने पृथ्वीपर अपना सिर पटक-पटककर उस शस्त्रको निगल जानेका प्रयत्न किया। जिसका परिणाम यह हुआ कि वह भयानक शस्त्र उस बकरेका ही गला काटनेवाला हो गया। इसी प्रकार तुम पाण्डवोंसे वैर न ठानो

দ্যূতসভায় যুধিষ্ঠিরের পরাজয় ও দুঃশাসনের দ্বারা দ্রৌপদীর কেশ ধরে টানার সেই মুহূর্তে বিদুর বললেন—একবার এক ছাগল ধারালো অস্ত্র গিলতে গিয়েছিল; গিলতে না পেরে তা জোর করে ঢোকাতে মাটিতে মাথা ঠুকতে লাগল; ফলে সেই ভয়ংকর অস্ত্রই তার নিজের গলা কেটে দিল। তেমনি পাণ্ডুপুত্রদের সঙ্গে বৈর করো না।

Verse 9

न किंचिदित्थं प्रवदन्ति पार्था वनेचरं वा गृहमेधिनं वा । तपस्विनं वा परिपूर्णविद्यं भषन्ति हैवं श्वनरा: सदैव,कुन्तीके पुत्र किसी वनवासी, गृहस्थ, तपस्वी अथवा विद्वानसे ऐसी कड़ी बात कभी नहीं बोलते। तुम्हारे-जैसे कुत्तेके-से स्वभाववाले मनुष्य ही सदा इस तरह दूसरोंको भूँका करते हैं

কুন্তীপুত্র পাণ্ডবেরা কোনো বনবাসী, গৃহস্থ, তপস্বী কিংবা পরিপূর্ণ বিদ্যায় সম্পন্ন পণ্ডিতের সঙ্গেও এমন কঠোর কথা বলেন না। তোমাদের মতো কুকুরস্বভাব মানুষই বারবার এভাবে অন্যের উপর ঘেউঘেউ করে।

Verse 10

द्वारं सुघोरं नरकस्य जिह्ां न बुध्यते धृतराष्ट्रस्य पुत्र: । तमन्वेतारो बहव: कुरूणां द्यूतोदये सह दुःशासनेन

ধৃতরাষ্ট্রের পুত্র নরকের সেই অতিভয়ংকর দ্বারকে—যেন তার জিহ্বাই—চিনতে পারে না। পাশাখেলার সূচনালগ্নে দুঃশাসনের সঙ্গে কৌরবদের বহুজন একই উন্মত্ত টানে তার অনুসরণ করে সেই সর্বনাশের পথে এগিয়ে যায়।

Verse 11

धृतराष्ट्रका पुत्र नरकके अत्यन्त भयंकर एवं कुटिल द्वारको नहीं देख रहा है। दुःशासनके साथ कौरवोंमेंसे बहुत-से लोग दुर्योधनकी इस चद्यूतक्रीड़ामें उसके साथी बन गये ।। मज्जन्त्यलाबूनि शिला: प्लवन्ते मुहान्ति नावो5म्भसि शश्वदेव | मूढो राजा धृतराष्ट्रस्य पुत्रो न मे वाच: पथ्यरूपा: शूणोति,चाहे तूँबी जलमें डूब जाय, पत्थर तैरने लग जाय तथा नौकाएँ भी सदा ही जलमें डूब जाया करें; परंतु धृतराष्ट्रका यह मूर्ख पुत्र राजा दुर्योधन मेरी हितकर बातें नहीं सुन सकता

লাউ ডুবে যায়, পাথর ভেসে ওঠে, আর নৌকা জলে চিরকাল পথ হারায়—এ যেন উল্টো নিয়ম। তেমনি ধৃতরাষ্ট্রের মূঢ় পুত্র রাজা দুর্যোধন আমার কল্যাণকর, পাথেয়স্বরূপ বাক্য শোনে না।

Verse 12

अन्तो नूनं भवितायं कुरूणां सुदारुण: सर्वहरो विनाश: । वाच: काव्या: सुहृदां पथ्यरूपा न श्रूयन्ते वर्धते लोभ एव

নিশ্চয়ই কুরুদের অন্ত আসন্ন—অতিশয় নির্মম, সর্বগ্রাসী বিনাশ। সুহৃদদের কাব্যসম সুগঠিত, কল্যাণকর বাক্য আর শোনা হয় না; কেবল লোভই বাড়তে থাকে।

Verse 66

यह दुर्योधन निश्चय ही कुरुकूल॒का नाश करनेवाला होगा। इसके द्वारा अत्यन्त भयंकर सर्वगाशका अवसर उपस्थित होगा। यह अपने सुहृदोंका पाण्डित्यपूर्ण हितकर वचन भी नहीं सुनता; इसका लोभ बढ़ता ही जा रहा है ।। इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि द्यूतपर्वणि विदुरवाक्ये षट्षष्टितमो5ध्याय:

দুর্যোধনের এই সংকল্প নিঃসন্দেহে কুরু-কুলের বিনাশ ডেকে আনবে। এর দ্বারা অতিভয়ংকর সর্বনাশের উপলক্ষ উপস্থিত হচ্ছে। সে নিজের সুহৃদদের পাণ্ডিত্যপূর্ণ, কল্যাণকর বাক্যও শোনে না; তার লোভই কেবল বাড়তে থাকে।

Frequently Asked Questions

Whether a king may authorize coercive strategy (a renewed dyūta designed to constrain rivals) under the logic of security and expediency, even when advisors warn it violates restraint, kin-protection, and the broader dharma of rulership.

Policy arguments framed as “necessary” can still be ethically corrosive when driven by fear and attachment; governance requires the capacity to restrain factional impulses, especially when institutional power can be used to formalize injustice.

No explicit phalaśruti appears; the chapter’s meta-significance is structural—showing how counsel, analogies, and procedural orders can normalize escalation, making later catastrophe intelligible as a chain of sanctioned decisions.