अक्षविजय-प्रसङ्गः
Escalation of Wagers and Shakuni’s Repeated Declarations of Victory
समागम्य भ्रातृभि: पार्थ तस्यां सुहृद्द्यूत॑ क्रियतां रम्यतां च | प्रीयामहे भवतां संगमेन समागता: कुरवश्चापि सर्वे,कुरुराज धृतराष्ट्रने पहले तुमसे कुशल और आरोग्य पूछकर यह संदेश दिया है कि वत्स! मैंने तुम्हारी सभाके समान ही एक सभा तैयार करायी है। तुम अपने भाइयोंके साथ आकर अपने दुर्योधन आदि भाइयोंकी इस सभाको देखो। इसमें सभी इष्ट-मित्र मिलकर द्यूतक्रीड़ा करें और मन बहलावें। हम सभी कौरव तुम सबसे मिलकर बहुत प्रसन्न होंगे
samāgamya bhrātṛbhiḥ pārtha tasyāṃ suhṛd-dyūtaṃ kriyatāṃ ramyatāṃ ca | prīyāmahe bhavatāṃ saṅgamena samāgatāḥ kuravaś cāpi sarve ||
বিদুর বললেন—হে পার্থ, ভ্রাতৃগণের সঙ্গে এখানে এসো এবং সেই মনোরম নবনির্মিত সভাগৃহ দেখো। সেখানে সুহৃদ ও হিতৈষীরা একত্র হয়ে বিনোদনের জন্য পাশাখেলা করুক। তোমার সঙ্গে মিলনে আমরা সকল কুরু, হে কুরুরাজ, পরম আনন্দিত হব।
विदुर उवाच